वर्ष 2025 में वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य प्रमुख ग्रीनहाउस गैसों का स्तर अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। इसका अर्थ साफ है कि इन गैसों के बढ़ने से धरती का तापमान लंबे समय तक बढ़ना जारी रहेगा।
27 अक्टूबर 2026 को विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) की ओर से जारी ग्रीनहाउस गैस बुलेटिन के अनुसार, 2025 में वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की वैश्विक औसत सांद्रता 426.8 पार्ट्स पर मिलियन (पीपीएम) दर्ज की गई। जो 1750 के पूर्व-औद्योगिक स्तर का 153 प्रतिशत है।
इतना ही नहीं, मानव गतिविधियों से जुड़ी दूसरी और तीसरी सबसे महत्वपूर्ण दीर्घकालिक ग्रीनहाउस गैसों (मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड) की सांद्रता भी बढ़कर अब तक के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन की उपमहासचिव को बैरेट ने कहा, “हर साल एक नया रिकॉर्ड बन रहा है। ग्रीनहाउस गैसें वायुमंडल में अभूतपूर्व मात्रा में गर्मी रोक रही हैं। इससे मौसम की चरम घटनाओं को बढ़ावा मिल रहा है, जिससे हमारी अर्थव्यवस्था और समाज के सामने खतरे बढ़ रहे हैं। पिछले 11 साल अब तक के सबसे गर्म साल रहे हैं और यह सिलसिला आगे भी जारी रहने की आशंका है।”
उन्होंने चिंता जताई कि कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल में लंबे समय तक बनी रहती है। इसलिए इसका असर केवल कुछ वर्षों तक ही नहीं, बल्कि दशकों और यहां तक कि सदियों तक धरती की जलवायु पर पड़ता रहेगा।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन यह बुलेटिन संयुक्त राष्ट्र के जलवायु सम्मेलन में बातचीत करने वाले प्रतिनिधियों को वैज्ञानिक और प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध कराने के लिए जारी करता है। यह संगठन के प्रमुख वार्षिक प्रकाशनों में से एक है।
इस साल संयुक्त राष्ट्र का जलवायु सम्मेलन (कॉप31) आगामी नौ से 20 नवंबर तक तुर्किये के अंताल्या शहर में आयोजित होगा। इस सम्मेलन का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए किए गए वादों को ठोस कार्रवाई में बदलना है।
कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ने की रफ्तार तीन गुना हुई
यह बुलेटिन ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता यानी वायुमंडल में जमा होने वाली गैसों की मात्रा के बारे में जानकारी देता है, न कि हर साल होने वाले नए उत्सर्जन के बारे में।
हर साल उत्सर्जित होने वाली कुल कार्बन डाइऑक्साइड का लगभग आधा हिस्सा वायुमंडल में बना रहता है, जबकि बाकी हिस्सा पृथ्वी के स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र और महासागरों द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है।
जब यह बुलेटिन पहली बार 2004 में प्रकाशित हुआ था, तब विश्व मौसम विज्ञान संगठन के ग्लोबल एटमॉस्फियर वॉच नेटवर्क के निगरानी केंद्रों में कार्बन डाइऑक्साइड का वार्षिक औसत स्तर 377.5 पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) दर्ज किया गया था।
नेशनल ओशेनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एओएए) के वार्षिक ग्रीनहाउस गैस सूचकांक के अनुसार, 1990 से 2025 के बीच लंबे समय तक वायुमंडल में बने रहने वाली ग्रीनहाउस गैसों के कारण होने वाला विकिरणीय बल (रेडिएटिव फोर्सिंग) 56 प्रतिशत बढ़ गया। इससे आशय जलवायु पर पड़ने वाले गर्माहट के प्रभाव से है। इस वृद्धि में कार्बन डाइऑक्साइड की हिस्सेदारी लगभग 81 प्रतिशत रही।
1960 के दशक के बाद से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ने की रफ्तार तीन गुना हो गई है। 1960 के दशक में इसकी मात्रा हर साल औसतन 0.8 पीपीएम बढ़ रही थी, जबकि 2011 से 2020 के दशक में यह बढ़कर 2.4 पीपीएम सालाना हो गई।
2024 से 2025 के बीच वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की वैश्विक औसत मात्रा में 2.8 पीपीएम की बढ़ोतरी हुई। यह पिछले दशक के औसत से अधिक है, हालांकि 2023 से 2024 के बीच हुई असाधारण वृद्धि से थोड़ी कम है।
डब्ल्यूएमओ की वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी ओक्साना तारासोवा के मुताबिक, 2024 की तुलना में 2025 में कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ने की रफ्तार कुछ कम रही। इसकी वजह धरती के स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र की कार्बन सोखने की क्षमता में सुधार और 2025 में जंगलों में आग से कार्बन उत्सर्जन का कम होना था।
उन्होंने बताया कि 2023-24 में अल नीनो की मजबूत स्थिति ने सूखे, वनस्पतियों के अधिक शुष्क होने और जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ने के कारण प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की कार्बन सोखने की क्षमता को कमजोर कर दिया था।
हालांकि, तारासोवा ने आगाह किया कि एक साल में 2.8 पीपीएम की वृद्धि भी वायुमंडल में कार्बन की बड़ी मात्रा जुड़ने का संकेत है। जीवाश्म ईंधन जलाने के कारण 2026 में भी कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने की आशंका है।
इसके अलावा यदि शक्तिशाली अल नीनो विकसित होता है, तो वह 2023-24 की तरह धरती के पारिस्थितिकी तंत्र की कार्बन सोखने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। बदलती जलवायु में महासागरों की कार्बन डाइऑक्साइड सोखने की क्षमता घटने का खतरा भी बढ़ रहा है।
मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड
लंबे समय तक वायुमंडल में रहने वाली ग्रीनहाउस गैसों के कारण होने वाली गर्मी में मीथेन का योगदान लगभग 16 प्रतिशत है। हालांकि, यह कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में वायुमंडल में कम समय तक रहती है।
वायुमंडल में पहुंचने वाली मीथेन का करीब 35 प्रतिशत हिस्सा प्राकृतिक स्रोतों, जैसे आर्द्रभूमियों से आता है। ये स्रोत भी जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होते हैं। बाकी लगभग 65 प्रतिशत मीथेन मानव गतिविधियों से निकलती है। इनमें पशुपालन, धान की खेती, जीवाश्म ईंधन का उत्पादन और उपयोग, कचरे के ढेर तथा जैविक पदार्थों को जलाना शामिल हैं।
2025 में वायुमंडल में मीथेन की वैश्विक औसत मात्रा 1,948 पार्ट्स पर बिलियन (पीपीबी) दर्ज की गई। यह 1750 के स्तर से 167 प्रतिशत अधिक है।
नाइट्रस ऑक्साइड तीसरी सबसे महत्वपूर्ण दीर्घकालिक ग्रीनहाउस गैस है। यह प्राकृतिक स्रोतों के साथ-साथ जैविक पदार्थों को जलाने, उर्वरकों के इस्तेमाल और विभिन्न औद्योगिक प्रक्रियाओं से भी निकलती है।
2025 में वायुमंडल में नाइट्रस ऑक्साइड की वैश्विक औसत मात्रा बढ़कर 339.1 पीपीबी हो गई। यह 1750 के स्तर से 26 प्रतिशत अधिक है।
सल्फर हेक्साफ्लोराइड
पिछले तीन दशकों में दुनिया में विद्युतीकरण बढ़ने के साथ वायुमंडल में सल्फर हेक्साफ्लोराइड की मात्रा भी लगातार बढ़ी है। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से बिजली वितरण प्रणालियों में विद्युत आर्क या चिंगारी को नियंत्रित करने वाले इंसुलेटिंग माध्यम के रूप में किया जाता है।
यह गैस वायुमंडल में 1,000 साल से अधिक समय तक बनी रह सकती है। 100 साल की अवधि के आधार पर इसकी ग्लोबल वार्मिंग क्षमता कार्बन डाइऑक्साइड से लगभग 24,300 गुना अधिक है। 2025 में वायुमंडल में इसकी मात्रा में अब तक की सबसे बड़ी वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई।
हाइड्रोजन
2010 से 2024 के बीच वायुमंडल में हाइड्रोजन की मात्रा 5.3 प्रतिशत बढ़ी। हाइड्रोजन का इस्तेमाल इस्पात निर्माण, जहाजरानी और लंबे समय तक ऊर्जा भंडारण जैसे उन क्षेत्रों में किया जा रहा है, जहां कार्बन उत्सर्जन कम करना मुश्किल है। इसका उपयोग नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों और परिवहन में भी हो रहा है।
लेकिन उत्पादन केंद्रों, पाइपलाइनों, भंडारण टैंकों और ईंधन सेल से हाइड्रोजन का रिसाव चिंता का विषय बन रहा है। हाइड्रोजन स्वयं ग्रीनहाउस गैस नहीं है, लेकिन यह वायुमंडल की रासायनिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करती है और इस तरह अप्रत्यक्ष रूप से तापमान बढ़ाने में योगदान दे सकती है।