प्रदूषण

कोयले से होने वाले प्रदूषण से हर साल मरते हैं 8 लाख लोग

शोध के मुताबिक हर साल कोयला संयंत्र से होने वाले प्रदूषण की वजह से 8 लाख से अधिक लोग समय से पहले मर जाते हैं

Dayanidhi

जीवाश्म ईंधन और बायोमास से चलने वाले बिजली संयंत्रों से कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) उत्सर्जन को कम करने से अक्सर वायु प्रदूषण भी कम होता है। जिससे जलवायु और सार्वजनिक स्वास्थ्य दोनों को फायदा होता है। शोधकर्ताओं ने जलवायु-ऊर्जा नीति परिदृश्यों को देखते हुए दुनिया भर में अलग-अलग तरीके से बिजली पैदा करने वाली इकाइयों की मॉडलिंग करके जलवायु और स्वास्थ्य के संबंधों की गहन पड़ताल की है।

शोध में पाया गया कि आने वाले दशकों में वायु प्रदूषण के कारण होने वाली मौतों को कम किया जा सकता है, बशर्ते जलवायु में हो रहे बदलावों को कम किया जाए। जलवायु परिवर्तन को कम करने की रणनीतियों को स्वास्थ्य सुधारों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया हो। अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं ने अध्ययन में दुनिया भर के देशों में सबसे खतरनाक बिजली संयंत्रों का वर्णन किया है।

जैसा कि देश कार्बन उत्सर्जन को कम करना चाहते हैं, इनमें मुख्य रूप से कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्र हैं। इस नए प्रयास में, शोधकर्ताओं ने गौर किया कि ऐसे संयंत्र जो सीओ2 के साथ-साथ अन्य प्रदूषकों का भी उत्सर्जन करते हैं। विशेष रूप से ध्यान देने योग्य छोटे, वायुजनित कण हैं जो आसपास के क्षेत्र में रहने वाले लोगों के फेफड़ों में चले जाते हैं।

शोधकर्ताओं ने कहा, जैसे-जैसे देश कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों को बंद करने या फिर से तैयार करने की योजना बनाते हैं, उन्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि कौन से संयंत्र सबसे अधिक असर डाल रहे हैं। आबादी से दूर स्थित बहुत सारे संयंत्रों को बंद करने से कार्बन उत्सर्जन तो कम होगा, लेकिन यह बिजली संयंत्रों से अन्य प्रदूषकों के कारण होने वाली मौतों की संख्या को कम करने के लिए कुछ खास काम नहीं करेगा।

इसलिए उनका सुझाव है कि प्रभावित देशों के अधिकारी उन बिजली संयंत्रों को बंद या नियमित करने का प्रयास करें जो सबसे अधिक नुकसान पहुंचा रहे हैं। उनका सुझाव है कि ऐसा करने से आने वाले दशकों में 1.2 करोड़ लोगों की जान बचाई जा सकती है।

टीम द्वारा किए गए कार्य में साल 2010 से 2018 तक कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों के बारे में आंकड़े एकत्र करना और उनका विश्लेषण करना शामिल था। जिसमें विशेष रूप से यह देखते हुए कि वे संयंत्र कितना प्रदूषण उत्सर्जित करते हैं और वे आबादी वाले इलाकों के कितने करीब हैं।

उन्होंने पाया कि हर साल कोयला संयंत्र से होने वाले प्रदूषण की वजह से 8 लाख से अधिक लोग समय से पहले मर जाते हैं। उन मौतों में से लगभग 92 प्रतिशत कम आय वाले देशों में हैं, विशेष रूप से भारत और चीन में, हालांकि दक्षिण पूर्व एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका में भी ऐसा देखा गया है। यह शोध नेचर क्लाइमेट चेंज जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

शोधकर्ताओं का सुझाव है कि सबसे अधिक कसूरवार को लक्षित करने से 2050 तक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करने वाले लोगों की संख्या में काफी कमी आ सकती है, बशर्ते ग्लोबल वार्मिंग के लक्ष्य जो की 1.5 डिग्री सेल्सियस को एक निश्चित समय में हासिल किया जाए। उन्होंने यह भी पाया कि भले ही ऐसे बिजली संयंत्र बंद न हों, फिर भी उन्हें जनता के लिए अधिक सुरक्षित बनाया जा सकता है। यह संभव है कि 2050 तक 60 लाख लोगों को बचाया जा सकता है।