प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
प्रदूषण

बिना पर्यावरण मंजूरी चल रही डेनिम डाईंग यूनिट पर 10 लाख रुपए का मुआवजा

निरीक्षण टीम ने यह पाया था कि धुलाई की प्रक्रिया से निकलने वाले औद्योगिक अपशिष्ट जल को बिना किसी उपचार के सीधे सीवर में छोड़ा जा रहा था

Vivek Mishra

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की प्रधान पीठ ने दिल्ली में बिना जरूरी पर्यावरणीय मंजूरी के डेनिम कपड़े की प्रोसेसिंग, धुलाई और रंगाई करने वाली औद्योगिक इकाई पर दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) द्वारा लगाए गए 10 लाख रुपए के पर्यावरणीय क्षति मुआवजे को बरकरार रखा है।

एनजीटी ने इस मामले में दायर अपील को खारिज करते हुए कहा कि डीपीसीसी के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है। मामले की सुनवाई एनजीटी के चेयरपर्सन न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद की पीठ ने की।

यह मामला अपील संख्या अजीज खां बनाम दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति एवं अन्य से संबंधित है। डीपीसीसी ने 17 जुलाई 2025 को संबंधित औद्योगिक इकाई पर 10 लाख रुपए का पर्यावरणीय क्षति मुआवजा लगाया था। इससे पहले इकाई संचालक ने डीपीसीसी की ओर से जारी कारण बताओ नोटिस को भी चुनौती दी थी, लेकिन एनजीटी ने 11 फरवरी 2026 को उस चुनौती को खारिज कर दिया था।

बिना उपचार के सीवर में छोड़ा जा रहा औद्योगिक अपशिष्ट

मामले की जांच के लिए डीपीसीसी ने 3 मई 2023 को एमसीडी, डीपीसीसी, बीएसईएस, दिल्ली जल बोर्ड और दिल्ली पुलिस के अधिकारियों की संयुक्त टीम गठित की थी।

संयुक्त निरीक्षण रिपोर्ट में परिसर में “डेनिम कपड़े की प्रोसेसिंग, धुलाई और रंगाई” की गतिविधि दर्ज की गई। रिपोर्ट के मुताबिक, इकाई आवश्यक सहमति के बिना संचालित हो रही थी।

निरीक्षण टीम ने यह भी पाया कि धुलाई की प्रक्रिया से निकलने वाले ट्रेड एफ्लुएंट यानी औद्योगिक अपशिष्ट जल को बिना किसी उपचार के सीधे सीवर में छोड़ा जा रहा था।

टीम के मुताबिक, पहली मंजिल पर धूप में सुखाए गए प्रोसेस्ड कपड़े भी रखे मिले थे।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि सीलिंग की कार्रवाई के बावजूद कथित तौर पर एक बाईपास दरवाजे के जरिए वॉशिंग और डाईंग यूनिट तक पहुंच बनाई गई थी। इसके बाद एमसीडी ने परिसर के कुछ हिस्सों को सील किया, जबकि दिल्ली जल बोर्ड और बीएसईएस ने संबंधित मंजिलों के पानी और बिजली के कनेक्शन काट दिए।

इकाई ने दी अलग तरह की गतिविधि की दलील

अपीलकर्ता ने एनजीटी के समक्ष दलील दी कि परिसर की पहली मंजिल सील कर दी गई थी और इसलिए बाकी मंजिलों का इस्तेमाल किया जा सकता था। उसने यह भी कहा कि निरीक्षण के दौरान जब्त की गई वॉशिंग मशीन आम तौर पर इस्तेमाल होने वाला उपकरण है और केवल इसके आधार पर डाईंग गतिविधि किए जाने की पुष्टि नहीं होती।

अपीलकर्ता ने यह दावा भी किया कि वहां जींस की रंगाई नहीं, बल्कि पगड़ी और दुपट्टों की रंगाई की जाती थी। उसने खुद को पेशे से रंगरेज बताया।

हालांकि, एनजीटी ने संयुक्त निरीक्षण रिपोर्ट को महत्वपूर्ण माना। अधिकरण ने कहा कि मामले का संबंध केवल परिसर को सील किए जाने से नहीं, बल्कि पर्यावरणीय क्षति के लिए मुआवजा लगाए जाने से है।

रेड कैटेगरी की गतिविधि, गैर-अनुरूप क्षेत्र में संचालन

एनजीटी ने कहा कि डीपीसीसी की ओर से जारी कारण बताओ नोटिस में संबंधित गतिविधि को रेड कैटेगरी में रखा गया था। अधिकरण के मुताबिक, इस श्रेणी की गतिविधियों में जल प्रदूषण की संभावना अधिक होती है और संबंधित इकाई गैर-अनुरूप क्षेत्र में आवश्यक पर्यावरणीय मंजूरियों के बिना संचालित की जा रही थी।

अधिकरण ने यह भी नोट किया कि अपीलकर्ता ने कारण बताओ नोटिस का कोई जवाब दाखिल नहीं किया था। एनजीटी ने माना कि डीपीसीसी ने पर्यावरणीय क्षति मुआवजा लगाने से पहले प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किया था।

पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का रंगरेज के रूप में पेशा होना उसे गैर-अनुरूप क्षेत्र में रेड कैटेगरी की औद्योगिक गतिविधि संचालित करने और आवश्यक पर्यावरणीय मंजूरियों से छूट नहीं देता।

एनजीटी ने निष्कर्ष निकाला कि डीपीसीसी के आदेश में कोई त्रुटि नहीं है और उसमें हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता।

इसके साथ ही अधिकरण ने अपील को आधारहीन  बताते हुए खारिज कर दिया।

हालांकि, अपीलकर्ता के अनुरोध पर एनजीटी ने 10 लाख रूपये का पर्यावरणीय क्षति मुआवजा जमा करने के लिए चार महीने का समय दिया है।