इलेस्ट्रेशन : योगेंद्र आनंद 
आपदा

छोड़नी होगी हिमालय को जीतने की जिद

नेपाल की बाढ़ महज प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह जलवायु परिवर्तन, बेलगाम विकास और प्रकृति को नियंत्रित करने की हमारी सोच के प्रति एक चेतावनी है

Sunita Narain

नेपाल में आई बाढ़ में 1,300 से अधिक लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है और कई हजार लोग अब भी लापता हैं। शक्तिशाली हिमालय मानो मलबे के रूप में नीचे आ गिरा है। यह एक बहुत बड़ी और पीड़ादायक मानवीय त्रासदी है, लेकिन यह मनुष्यों के द्वारा जानबूझकर किए गए कार्यों और उनकी निष्क्रियता का भी परिणाम है। यह त्रासदी वास्तव में हमारी सोच से जुड़ी है कि हम मनुष्य हर चीज को अपनी जरूरत के मुताबिक फिर से गढ़ सकते हैं।

ब्रह्मांड और उसमें मौजूद हर चीज पर हमारा नियंत्रण है। हम खुद को सर्वोच्च प्राणी मानते हैं, जो जलवायु परिवर्तन का सामना कर सकते हैं, क्योंकि आखिरकार यह तो केवल मौसम से जुड़ा एक छोटा और मामूली मामला ही है। इसके लिए जिम्मेदार हम खुद हैं।

आइए इसे थोड़ा विस्तार से समझते हैं। सबसे पहला सवाल यह है कि 26 अगस्त को नेपाल में आखिर हुआ क्या था। हम सभी ने जो तस्वीरें देखी होंगी, उनमें पहाड़ को नीचे आते हुए मानो पूरा का पूरा ढहते हुए देखा जा सकता है। अचानक आई बाढ़ और भारी मात्रा में मलबे ने अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को दफन कर दिया।

इस मलबे की चपेट में चीनी आव्रजन कार्यालय की विशाल इमारत भी आ गई। यह भयावह दृश्य किसी साइंस फिक्शन फिल्म के दृश्य जैसा था। अब हम जानते हैं कि यह अचानक आई बाढ़ किसी बादल फटने की घटना के कारण नहीं आई थी।

इसके पीछे लांगटांग लिरुंग चोटी के पास ऊंचाई वाले क्षेत्र में एक ग्लेशियर का ढहना था। अनुमान है कि करीब 14.2 करोड़ घन मीटर बर्फ और चट्टानें खिसक गईं, जिससे 5.2 तीव्रता की भूकंपीय घटना हुई। इसके बाद प्राकृतिक बांध बन गए, जिनके पीछे पानी और हिमनदीय मलबा (मोरेन) जमा होता गया। जब ये बांध टूटे तो निचले इलाकों में बहुत तेज विनाशकारी बाढ़ आ गई।

दूसरा सवाल है कि ऐसा क्यों हुआ? इसका कोई एक प्रमुख कारण नहीं है, लेकिन दो घटनाक्रमों ने इस क्षेत्र में हुई इस तरह की त्रासदियों में बड़ी भूमिका निभाई। पहला है जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाला वह तापमान वृद्धि, जिसे अब अच्छी तरह रिकॉर्ड किया जा चुका है। जो वास्तव में हिमालय को कमजोर कर रहा है।

तापमान बढ़ने से ग्लेशियर पिघल रहे हैं और इसके चलते मोरेन की ढलान कमजोर व क्षरित हो रही है। यह एक टिक-टिक करता बम है, जो नेपाल की तरह अचानक फट पड़ता है। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन चरम मौसम की घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ा रहा है।

इसकी वजह से बाढ़ और भूस्खलन जैसी विनाशकारी घटनाएं हो रही हैं, जैसी 2025 में हिमाचल प्रदेश, 2024 में सिक्किम और 2021 में चमोली में देखी गईं। लेकिन आपको यह भी जानना चाहिए कि जब मैं यह लिख रही हूं और हम अपनी स्क्रीन पर नेपाल की तस्वीरें देख रहे हैं, उसी समय हिमालय के अलग-अलग हिस्सों में भी ऐसी ही बाढ़ आ रही है।

हम भी इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार हैं। हम सभी, लेकिन खास तौर पर वे देश अधिक दोषी हैं, जिन्होंने वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों के उस भंडार में सबसे अधिक योगदान दिया है, जो तापमान बढ़ा रहा है और बेकाबू विनाश का कारण बन रहा है।

यह अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों से जुड़ा सवाल है। इस जनहानि के लिए दुनिया के सबसे अमीर और विकसित देश अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं  सकते और जिस समय नेपाल में मृतकों की संख्या बढ़ रही थी, उसी दौरान हमें यह खबर मिली कि औद्योगिक काल, यानी 1870 के बाद से तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा के भीतर रखने की दुनिया की कोशिश अब महज एक भ्रमात्मक संभावना तक भी नहीं रह गई है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) का अनुमान है कि दुनिया कुछ ही वर्षों में इस सीमा को पार कर जाएगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक की बढ़ोतरी के बाद इसके असर तेजी से बढ़ेंगे और ज्यादा विनाशकारी होंगे। बर्फ की विशाल चादरें पिघल सकती हैं। समुद्र की धाराओं में बदलाव आ सकता है, जिसमें अटलांटिक मेरिडियोनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (एएमओसी) भी शामिल है। इसके अलावा भी कई गंभीर बदलाव हो सकते हैं।

गर्मी के चालू सीजन में हमने जिस भीषण गर्मी, जंगल की आग और मौसम में आए असामान्य बदलावों को देखा, वे आने वाले खतरे की सिर्फ एक झलक हैं। इसके बावजूद, पृथ्वी की व्यवस्था में हो रहे इस बड़े बदलाव को लेकर हम अब भी गंभीर नहीं दिखते।

आज हम जानबूझकर की गई इंसानी गलतियों, जैसे निरर्थक युद्धों से पैदा हुए आर्थिक और आजीविका संबंधी संकटों में इतने उलझे हुए हैं कि यह विशाल और हमारे अस्तित्व से जुड़ा संकट हमें दूर और महत्वहीन लगता है। हम उत्सर्जन में केवल मामूली बदलाव करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि जरूरत इस बात की है कि हम अपनी जीवनशैली और विकास के तौर-तरीकों को बदलें, ताकि प्रकृति की सीमाओं के भीतर रहकर जीवन जी सकें।

आइए फिर हिमालय की ओर लौटते हैं। हम जानते हैं कि जलवायु परिवर्तन का यह टिक-टिक करता बम इन पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में विकास के तरीकों से और भी खतरनाक हो गया है। हम लगातार अनुकूलन की बातें करते हैं और कहते हैं कि बदलती जलवायु को ध्यान में रखकर काम करना जरूरी है, लेकिन वास्तव में ऐसा करते नहीं हैं।

हमें सचमुच लगता है कि हम जो कर रहे हैं, उसे बिना किसी परिणाम की चिंता किए जारी रख सकते हैं। मसलन, संकरी नदियों पर बांध बनाकर तैयार की जा रही जलविद्युत परियोजनाओं को ही लें।

जैसा कि मैंने पहले भी कहा है और दोहराती रहूंगी, सवाल बांध आधारित विकास का नहीं, बल्कि जिस लापरवाही के साथ इन्हें बनाया जा रहा है, उसका है। भारतीय हिमालय में एक के बाद एक परियोजनाएं वास्तव में बिल्कुल सटाकर आ रही हैं, ताकि गंगा के प्राकृतिक प्रवाह को ही नए सिरे से बदला जा सके।

इन परियोजनाओं के जरिए उसके पानी को नियंत्रित किया जाएगा, बिजली पैदा करने के लिए उसका इस्तेमाल किया जाएगा और फिर उसे वापस नदी में छोड़ दिया जाएगा। इसके बाद हम पहाड़ों के भीतर सुरंगें खोद रहे हैं और सड़कें बना रहे हैं, वह भी अक्सर ढलानों को संभालने और स्थिर रखने की कोई समुचित व्यवस्था किए बिना ऐसा कर रहे हैं। ऐसी मिसालें मैं लगातार गिना सकती हूं।

लेकिन सच यह है कि प्रकृति हमें जो संदेश बिल्कुल स्पष्ट और जोरदार ढंग से दे रही है, हम उसे सुन ही नहीं रहे हैं: अपनी सोच बदलो। यह धारणा कि तुम मुझ पर हावी हो सकते हो, मुझे घुटनों पर ला सकते हो काम नहीं करेगी। संदेश साफ है बदलो या नष्ट हो जाओ।

अब बड़ाबड़ा सवाल यह है कि क्या हम अपने ध्यान को भटकाने वाले इस शोर-शराबे के बीच उस संदेश को सुन पा रहे हैं?