हिमालय में बड़े पैमाने पर होने वाले भूस्खलन और बर्फीले पहाड़ों के ढहने जैसी आपदाओं के शुरुआती संकेत अब अंतरिक्ष से भी पहचाने जा सकते हैं।
द इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) की 13 अक्टूबर को जारी एक वैज्ञानिक रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल-चीन सीमा पर 26 अगस्त 2026 को हुई भीषण चट्टान और ग्लेशियर ढहने की घटना से पहले संबंधित पहाड़ी ढलान में जमीन की सतह पर उल्लेखनीय हलचल दर्ज की गई थी।
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के सेंटिनल-1 रडार उपग्रहों से मिले आंकड़ों के विश्लेषण में 7 जुलाई से 24 अगस्त 2026 के बीच अधिकतम 40 सेंटीमीटर तक का बदलाव सामने आया। यह अवधि पहाड़ ढहने की घटना से पहले के 48 दिनों की थी।
रिपोर्ट के अनुसार, लांगटांग लिरुंग पर्वत के उत्तरी हिस्से से अनुमानित 13.2 करोड़ घन मीटर चट्टान और ग्लेशियर की बर्फ टूटकर नीचे ल्हेंदे खोला नदी घाटी में जा गिरी। इससे चट्टान, बर्फ, पानी और तलछट का तेज बहाव पैदा हुआ, जिसने कुछ ही मिनटों में नेपाल-चीन सीमा के आसपास के इलाके को अपनी चपेट में ले लिया।
नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण तथा प्रबंधन प्राधिकरण के आंकड़ों के मुताबिक, इस आपदा में नेपाल में कम से कम 1,451 लोगों की मौत हुई, जबकि 5,745 लोग अब भी लापता हैं। चीन के अधिकारियों ने 43 लोगों की मौत और 519 लोगों के लापता होने की जानकारी दी है।
झील फटने की नहीं, पहाड़ ढहने की आपदा थी
आईसीआईएमओडी की रिपोर्ट अंडरस्टैंडिंग द ग्यिरोंग–रसुवा डिज़ास्टर ऑफ़ 26 अगस्त 2026: अ प्रिलिमिनरी सिंथेसिस में स्पष्ट किया गया है कि शुरुआत में इस घटना को हिमनदीय झील के फटने से आई बाढ़ यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) माना गया था। लेकिन वैज्ञानिक जांच से सामने आया कि यह सामान्य झील-विस्फोट बाढ़ नहीं थी।
इसके बजाय, पहाड़ की आधारभूत चट्टान का एक विशाल हिस्सा टूटकर नीचे गिरा और इस प्रक्रिया में उसके ऊपर मौजूद ग्लेशियर का हिस्सा भी उखड़ गया। चट्टान, बर्फ, पानी और मलबे के एक साथ नीचे आने से विनाशकारी बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हुई।
रिपोर्ट तैयार करने के लिए वैज्ञानिकों ने उपग्रह से मिले आंकड़ों, भूकंपीय रिकॉर्ड, ड्रोन सर्वेक्षण, जल विज्ञान संबंधी विश्लेषण और क्षेत्रीय आकलनों का इस्तेमाल किया। इसका उद्देश्य यह समझना था कि पहाड़ के एक हिस्से के ढहने से किस तरह कई तरह के खतरे पैदा हुए और उनका असर अंतरराष्ट्रीय सीमा के दोनों ओर पड़ा।
48 दिन पहले दर्ज हुई थी हलचल
सेंटिनल-1 के इंटरफेरोमेट्रिक सिंथेटिक अपर्चर रडार (इनसार) आंकड़ों से पहाड़ी ढलान में अधिकतम 40 सेंटीमीटर तक की लाइन-ऑफ-साइट विकृति का पता चला। यह तकनीक अलग-अलग समय पर लिए गए रडार उपग्रह चित्रों की तुलना करके जमीन की सतह में हुए बदलावों का आकलन करती है। दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों में, जहां लगातार जमीनी निगरानी करना कठिन है, यह तकनीक विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है।
हालांकि, वैज्ञानिकों ने चेताया है कि जमीन में हलचल दर्ज होने का अर्थ यह नहीं है कि किसी पहाड़ के ढहने का सटीक दिन और समय बताया जा सकता है। फिर भी, इस तरह के संकेत संभावित रूप से अस्थिर ढलानों की पहचान करने और उन पर निगरानी बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।
आईसीआईएमओडी के महानिदेशक पेमा ग्याम्त्शो के मुताबिक, यह घटना बताती है कि कुछ खतरनाक पर्वतीय ढलानों में विनाशकारी ढहाव से पहले मापने योग्य अस्थिरता के संकेत मिल सकते हैं। अब चुनौती वैज्ञानिक जानकारी को व्यावहारिक आपदा जोखिम न्यूनीकरण और बेहतर निगरानी व्यवस्था में बदलने की है।
रिपोर्ट में चट्टानों की भूगर्भीय कमजोरियों, 2015 के नेपाल भूकंप से जुड़ी क्षति, पर्माफ्रॉस्ट यानी स्थायी रूप से जमी जमीन के पिघलने, ग्लेशियरों में बदलाव और बर्फ के धीरे-धीरे जमा होने जैसे संभावित कारकों का उल्लेख किया गया है। हालांकि, अभी तक किसी एक कारण को इस आपदा का निर्णायक ट्रिगर नहीं माना गया है।
देर से मिली चेतावनी
इस आपदा ने मौजूदा पूर्व चेतावनी प्रणालियों की सीमाओं को भी उजागर किया है। रिपोर्ट के अनुसार, पहाड़ का ढहाव नेपाल के समयानुसार सुबह 8 बजकर 37 मिनट पर हुआ और मलबे का तेज बहाव करीब सात मिनट के भीतर सीमा क्षेत्र तक पहुंच गया।
इसके विपरीत, मोबाइल संदेशों के जरिये चेतावनी लगभग सुबह 9 बजकर 15 से 9 बजकर 16 मिनट के बीच जारी की गई। यानी सीमा क्षेत्र प्रभावित हो जाने के करीब 25 से 30 मिनट बाद।
वैज्ञानिकों का कहना है कि वर्षा और नदी के जलस्तर पर आधारित मौजूदा चेतावनी प्रणालियां अचानक चट्टान और ग्लेशियर ढहने से पैदा होने वाले खतरों का समय रहते पता लगाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। ऐसे हादसों में खतरा पैदा होने और उसका असर आबादी तक पहुंचने के बीच बहुत कम समय मिल सकता है।
इसलिए केवल नदी के जलस्तर या बारिश पर निर्भर रहने के बजाय उपग्रह निगरानी, भूकंपीय आंकड़ों, जल विज्ञान संबंधी सूचनाओं और प्रभाव-आधारित पूर्वानुमान को एकीकृत करना जरूरी है। नेपाल और चीन के बीच समय पर सूचना साझा करना भी जोखिम कम करने का अहम हिस्सा हो सकता है।
अब बूढ़ी गंडकी में भी खतरे के संकेत
ग्यिरोंग-रसुवा गलियारे में पिछले 13 महीनों के भीतर दो विनाशकारी सीमा-पार आपदाएं हो चुकी हैं। जुलाई 2025 में प्योरपु की एक हिमनदीय झील से अचानक पानी निकलने के कारण बाढ़ आई थी। इसके बाद अगस्त 2026 में लांगटांग लिरुंग पर्वत से चट्टान और बर्फ ढहने की घटना ने इसी गलियारे को तबाह कर दिया। दोनों घटनाओं में आपदा पैदा होने का तरीका अलग-अलग था।
इस बीच, नेपाल के बूढी गंडकी नदी बेसिन में एक अन्य चट्टानी हिमस्खलन और ग्लेशियर ढहने की घटना की भी पुष्टि हुई है। उपग्रह चित्रों से इस घटना के संकेत मिले हैं, लेकिन इसके घटनाक्रम, नुकसान और भविष्य के जोखिमों को लेकर आकलन जारी है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इन घटनाओं की तुलना करने से हिमालय में तेजी से सामने आने वाले खतरों को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों में बदलाव और भूगर्भीय अस्थिरता के आपसी संबंध इस क्षेत्र में आपदा जोखिम को नया रूप दे सकते हैं। हालांकि, इन घटनाओं के बीच संबंधों और किसी खास घटना में जलवायु परिवर्तन की भूमिका को लेकर ठोस निष्कर्ष के लिए और अध्ययन जरूरी हैं।
आईसीआईएमओडी में जलवायु एवं पर्यावरणीय जोखिम प्रमुख क्यूआंगगोंग झांग के मुताबिक, आपदा के पुनर्निर्माण में इस्तेमाल की गई वैज्ञानिक विधियां अन्य संभावित अस्थिर पर्वतीय ढलानों की पहचान करने में भी मदद कर सकती हैं। इससे उन स्थानों को चिह्नित किया जा सकेगा, जहां विस्तृत जांच और नियमित निगरानी की जरूरत है।
पहचान पर जोर
आईसीआईएमओडी और उसके सहयोगी संस्थान इस सप्ताह आपदा प्रभावित क्षेत्र में एक संयुक्त मैदानी अभियान शुरू कर रहे हैं। इसका उद्देश्य अतिरिक्त साक्ष्य जुटाना, प्रारंभिक रिपोर्ट के निष्कर्षों की पुष्टि करना और क्षेत्र के अन्य संभावित जोखिम वाले स्थानों की पहचान में मदद करना है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, हिमालय के दूरदराज के इलाकों में रडार उपग्रहों से जमीन की हलचल का पता लगाना भविष्य की निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है। लेकिन उपग्रह आंकड़ों को जमीनी सर्वेक्षण, भूकंपीय निगरानी और स्थानीय समुदायों की तैयारियों के साथ जोड़ना होगा।
26 अगस्त की आपदा से यह भी स्पष्ट हुआ है कि केवल खतरे की पहचान पर्याप्त नहीं है। चेतावनी को सही समय पर लोगों तक पहुंचाना, सीमापार सूचनाओं का आदान-प्रदान और तेजी से प्रतिक्रिया देने की स्थानीय क्षमता विकसित करना भी उतना ही जरूरी है। हिमालय में बदलते खतरों के बीच वैज्ञानिक निगरानी और प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणालियों को जोड़ना अब आपदा जोखिम कम करने की बड़ी चुनौती है।