हिमाचल प्रदेश में मानसून की शुरुआत के साथ ही बाढ़, बादल फटने और भूस्खलन की घटनाओं का सिलसिला तेज हो गया है। शुक्रवार को लाहौल-स्पीति जिले के उदयपुर उपमंडल में कढू नाला के पास संसारी–किलाड़–थिरोट–तांदी मार्ग पर पहाड़ी से चट्टानें गिरने के कारण कुल्लू से पांगी जा रही एक सूमो वाहन उसकी चपेट में आ गया। हादसे में वाहन में सवार 13 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि दो लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। मृतकों में आठ पुरुष, पांच महिलाएं और छह माह का एक शिशु भी शामिल है।
पांगी-भरमौर के विधायक डॉ. जनक राज ने बताया कि मृतकों में 11 लोग उनके विधानसभा क्षेत्र के थे, जबकि दो लोग लाहौल-स्पीति जिले के निवासी थे। उन्होंने कहा कि घायलों का उपचार जारी है और जिला प्रशासन, सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) तथा अन्य एजेंसियां मार्ग को बहाल करने में जुटी हुई हैं। उनका कहना है कि हिमाचल में मानसून के दौरान बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं के कारणों का वैज्ञानिक अध्ययन कर भविष्य के लिए प्रभावी रणनीति तैयार करने की आवश्यकता है।
लगातार हो रही बारिश का असर केवल सड़कों तक सीमित नहीं है। प्रदेश में फिलहाल 121 सड़कें बंद हैं, जबकि कई क्षेत्रों में पेयजल, बिजली और संचार सेवाएं भी बाधित हैं। इससे लोगों को आवागमन के साथ-साथ रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार मानसून की शुरुआत के साथ ही प्रदेश में आपदाओं का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। अब तक भूस्खलन की 19 बड़ी घटनाएं, फ्लैश फ्लड की 11 और बादल फटने की छह घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं।
मानसून का सबसे अधिक असर लाहौल-स्पीति के किसानों पर दिखाई दे रहा है। जहालमा नाले में बार-बार आने वाले उफान से पुल बह जाने के कारण किसान अपनी तैयार गोभी और मटर की फसल मंडियों तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं। कई किसानों को मजबूरी में खेतों में ही फसल नष्ट करनी पड़ रही है। लाहौल के युवा किसान राहुल दुशी बताते हैं कि जहालमा नाले की समस्या वर्ष 2023 से लगातार बनी हुई है। उनका कहना है कि हर मानसून में यही स्थिति बन जाती है और तैयार फसल बाजार तक नहीं पहुंच पाती। इससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है, लेकिन अब तक इसका कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला गया है।
हिमाचल प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों के दौरान मानसूनी आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ी हैं। राज्य सरकार की आपदा आकलन रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022 में मानसूनी आपदाओं में 276 लोगों की जान गई थी। वर्ष 2023 में यह संख्या बढ़कर 428 और वर्ष 2025 में 468 तक पहुंच गई। इन्हीं वर्षों में प्रदेश को लगभग 20,000 करोड़ रुपये से अधिक का आर्थिक नुकसान भी हुआ है।
लगातार बढ़ रही ये घटनाएं केवल प्राकृतिक आपदाओं का मामला नहीं रह गई हैं, बल्कि हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन, संवेदनशील भूगोल, अवसंरचना विकास और आपदा जोखिम प्रबंधन की तैयारियों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पर्वतीय क्षेत्रों में विकास योजनाओं और आपदा जोखिम न्यूनीकरण को साथ लेकर नहीं चला गया, तो आने वाले वर्षों में मानसून का प्रभाव और अधिक गंभीर हो सकता है।