‘क्या आप मेरे बच्चों को वहां से निकाल सकते हैं. वो 5 दिन से जंगलचट्टी में फंसे हैं. मेरे बेटे और बहू के साथ दो छोटे छोटे बच्चे हैं. प्लीज़ हमारी मदद कीजिए. आपको जितना भी पैसा चाहिए हमसे ले सकते हैं. अगर आप कहें तो हम दिल्ली में पैसा अभी पहुंचा सकते हैं. हर पायलट से बात कीजिए. जितना भी खर्च होगा हम करेंगे लेकिन हमारे बच्चों को निकालिए प्लीज़.’
मुझे अच्छी तरह से याद है. 21 जून की रात करीब साढ़े नौ बजे ये फोन कॉल मुझे आई थी. कॉल करने वाला परिवार उत्तरप्रदेश का था. इस आदमी की आवाज़ भर्राई हुई थी और हमारी बातचीत खत्म होते होते वो गिड़गिड़ाने लगा था. उस दिन हम केदारनाथ, रामबाड़ा और गौरीकुंड के हाल पर सुबह से रिपोर्टिंग कर रहे थे और उन रिपोर्ट्स के टेलीकास्ट होने के साथ साथ हमें फोन करने वालों की बाढ़ सी आ गई थी. सिद्धार्थ पांडे और मैं ऊपरी इलाकों में शूट खत्म करके लाइव कवरेज के लिए गुप्तकाशी पहुंचे हमारे फोन लगातार बज रहे थे. जिस वक्त सरकार राहत कार्य का बड़ा हिस्सा पूरा होने का दावा कर रही थी उस वक्त केदारनाथ, रामबाड़ा और गौरीकुंड में हज़ारों लोग जीवन-मरण के सवाल से जूझ रहे थे.
केदारनाथ में आई आपदा के करीब 3 हफ्ते बाद मैं उखीमठ पहुंचा. हर ओर शोक, निराशा औऱ अवसाद का वातावरण था. ये साल का वो वक्त था जब उखीमठ के बाज़ार में रौनक छाई रहती और यहां पर पर्यटकों का चहलपहल भरा जमावड़ा होता लेकिन अभी उखीमठ का हर गांव खुद में एक दुख भरी कहानी समेटे था. ये कहानी किसी अपने की मौत की थी या फिर उसके गायब हो जाने की. जो खुशकिस्मत थे उनके अपने किसी तरह बच कर आ गए थे.
उखीमठ भगवान केदारनाथ का विंटर होम है. जाड़ों में जब 11,800 फीट पर बसा केदारनाथ बर्फ से ढक जाता है तो भगवान की मूर्ति को उखीमठ के केदार मंदिर में स्थापित कर दिया जाता है. इसीलिए इसे भगवान की गद्दी पीठ भी कहा जाता है. जब तक अगले साल अप्रैल-मई में केदारनाथ में बर्फ नहीं पिघलती और वहां के कपाट (द्वार) नहीं खुलते तब तक उखीमठ में ही भगवान की पूजा अर्चना होती है. गुप्तकाशी की तरह उखीमठ के तमाम परिवार अपनी रोज़ी रोटी के लिए केदारनाथ यात्रा पर निर्भर थे. बहुत सारे परिवारों के लोग पुजारी का काम करने वहां जाते और बाकी छोटे मोटे होटल, ढाबे और दुकानें चलाते. इनमें से कई पालकी में या फिर घोड़े-खच्चर की मदद से यात्रियों को केदारनाथ ले जाने का काम करते. लेकिन इस साल कहानी कुछ अलग ही थी. लोगों को भरोसा ही नहीं हो रहा कि इतना बड़ा मुसीबतों का पहाड़ उन पर टूट सकता है. लोगों को भरोसा ही नहीं था कि जो भगवान उन्हें रोज़ी रोटी देता है उसके सामने इतने लोग मर जाएं ओर वो देखता रहे. केदारनाथ के दिल में इतनी निष्ठुरता कैसे हो सकती है? क्या भगवान ने सबको किसी ग़लती का दंड दिया है? अगर दंड दिया तो उन छोटे छोटे बच्चों और पहली बार केदार के द्वार पर आए लोगों की क्या ग़लती थी? उत्तराखंड की पहाड़ियों में बिखरे विलाप करते लोगों के दिमाग में ये सवाल ज़रूर थे.
16 तारीख को लोग बहुत डरे हुए थे. ऐसा लगता था कि पूरा उत्तरकाशी ही भागीरथी में समा जाएगा. लोग अपने घरों को छोड़कर भागने लगे. मूसलाधार बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी. दोपहर तक भागीरथी के किनारे बसे तिलोथ गांव के आधा दर्जन गांव नदी में जा चुके थे. कई घर हिल रहे थे. नदी तट को काट रही थी और प्रवाह क्षेत्र बढ़ा रही थी. शाम होने से पहले ही उजेली गांव में कैलाश आश्रम और दो मंदिर नदी में समा गए.
लोग रात भर पलक झपकाए बगैर जागते रहे. लगता था आसमान गिर रहा है. हालात खराब होते गए और आधी रात के वक्त पास के एक गांव में बादल फटने की घटना हुई. सुबह 2 बजे जब हमें इस बात का पता चला तो पूरे उत्तरकाशी में हड़कंप मच गया. लोग रो रहे थे और उन्हें कुछ पता नहीं था कि क्या करें. प्रशासन नदारद था या फिर उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें.
17 तारीख को उत्तरकाशी में जैसे आसमान ही टूट पड़ा. ये वो दिन था जब केदारनाथ में मंदाकिनी ने आखिरी चोट की थी. इसी दिन उत्तरकाशी में भागीरथी अपना प्रवाह क्षेत्र फैलाती चली गई. कई बसावटों और गांवों को भारी नुकसान हुआ. कुछ ही घंटों के भीतर 10 से अधिक बिल्डिंग एक के बाद एक नदी में गिरती चली गईं. जोशियाड़ा गांव के मोहन डबराल ने मुझे बताया -
17 तारीख की सुबह 5.35 बजे जोशियाड़ा गांव का झूला पुल उफनती नदी बहा ले गई. इसके बाद कुछ दुकानें और 5-6 घर नदी में समा गए. नदी तटबंध तोड़ चुकी थी और विकराल रूप में थी. भागीरथी अपने सामान्य प्रवाह से कई गुना बड़ी और कई फुट ऊपर बह रही थी. जोशियाड़ा के लोग अपने घर छोड़कर भागने लगे. कुछ देर बाद एक बहुत बड़ी बिल्डिंग नदी में जा गिरी और उसके साथ कई ओर घर बह गए. ये बड़ा घिचपिच इलाका था जहां कई दुकानें, घर, होटल और दूसरी इमारतें थीं. ज़्यादातर इमारतें बहुमंज़िला थीं. कुछ देर बाद मैं अपनी स्टेशनरी की दुकान को हिलता और फिर नदी में जाता देख रहा था. मैं असहाय था और मेरी आंखों में आंसू आ गए. मेरी रोज़ी रोटी एक पल में छिन गई थी और मुझे अपना भविष्य अंधेरे में डूबता दिखा. धीरे धीरे कई घर और दुकानें बह गईं और 2000 की आबादी वाला जोशियाड़ा गांव खाली हो गया.
ये हैरान करने वाली बात है कि इतनी संवेदनशील और नाज़ुक पहाड़ी जगह में पर्यावरण के सारे नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हैं. यहां आकर ऐसा लगता ही नहीं हैं कि उत्तरकाशी को बचाने और महफूज़ रखने के लिए किसी को कोई फिक्र है. नदी के किनारे जमकर गैरकानूनी निर्माण हुआ है और नहीं ऐसा नहीं लगता कि जानमाल या पर्यावरण के बचाव या रखरखाव के लिए कोई सख़्त कदम उठाया गया हो. 2013 में अगर केदारनाथ में हज़ारों लोगों की जान गई तो उत्तरकाशी में सबसे अधिक संपत्ति का नुकसान हुआ.
जून और जुलाई का वक्त उच्च हिमालय क्षेत्र में जड़ीबूटियों को चुनने का वक्त होता है. हिमालयी क्षेत्र में 100 से अधिक गांवों के लोग उच्च हिमालय यानी 14000 फीट से ऊंची पहाड़ियों पर वनस्पति जड़ीबूटियों के साथ साथ एक खास कीड़ाजड़ी के चुगान के लिए भी जाते हैं. कीड़ाजड़ी को ढूंढने का चलन पिछले कुछ सालों में बढ़ा है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में वियाग्रा जैसे यौनशक्तिवर्धक दवाइयों की मांग बढ़ी है और इनमें हिमालय में पाई जाने वाली कीड़ाजड़ी का इस्तेमाल हो रहा है. 15 तारीख के बाद जब मौसम खराब बोना शुरु हुआ तो कई गांवों इन ऊंचाइयों में फंस गए कई दिनों तक इन पहाड़ियों पर संघर्ष करते रहे.
गांव में लोगों ने मुख्यमंत्री को घेर लिया और वो लोगों की भीड़ में पसीना पोछते ही दिख रहे थे. सबको चिल्लाता देख अधिकारियों ने सीएम साहब को एक ऊंची जगह पर चढ़ाया ताकि वो सबके सवाल सुन सकें. जैसे ही बहुगुणा ने लोगों को बताना शुरू किया कि सरकार ने राहत कार्य के लिए कितना पैसा दिया है सबने चिल्ला कर उन्हें चुप करा दिया
‘आपके वादे सिर्फ क़ाग़ज़ों पर ही हैं. अधिकारियों ने अब तक प्रभावित लोगों की सूची तक नहीं बनाई. वो अब तक हमसे मिलने नहीं आए तो मुआवज़ा कैसे बाटेंगे.’