रेत खनन का नदी की भौतिक विशेषताओं, प्रवाह, तलछट और पारिस्थितिकी पर असर पड़ सकता है, इसलिए खनन शुरू करने से पहले रेत की पुनः पूर्ति क्षमता का मूल्यांकन आवश्यक है (फोटो: विकास चौधरी / सीएसई)
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यमुना नदी में अवैध खनन के आरोप पर एनजीटी का नोटिस, संयुक्त समिति गठित

एनजीटी ने गठित संयुक्त समिति को निर्देश दिए गए हैं कि वे यमुना नदी के प्रभावित इलाके का शीघ्र निरीक्षण खनन की सीमा का आकलन करें

Vivek Mishra

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की प्रधान पीठ, नई दिल्ली ने उत्तर प्रदेश के शामली जिले में यमुना नदी के तल में कथित अवैध खनन के मामले का संज्ञान लिया है। पीठ ने खनन आरोपों की जांच के लिए एक संयुक्त समिति गठित कर रिपोर्ट तलब की है।

यह मामले के याची डॉ. अमित कुमार का आरोप है कि मैसर्स यमुना माइंस कंपनी बिना आवश्यक पर्यावरणीय स्वीकृति और संचालन अनुमति के नै नंगला और मंगलाुरा गांवों में खनन कर रही है।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि उन्होंने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, जिला प्रशासन और स्थानीय पुलिस को शिकायत देने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई। खनन कार्य भारी मशीनों के माध्यम से चल रहा है, और यह पुलिस चौकी के पास होने के बावजूद भी जारी है। इसने एनजीटी की चिंता और बढ़ा दी।

एनजीटी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। कुछ प्रतिवादियों ने जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय मांगा है।

एनजीटी ने इस मुद्दे की सही जानकारी और निष्पक्ष निरीक्षण सुनिश्चित करने के लिए एक संयुक्त समिति का गठन किया है। इसमें केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का लखनऊ क्षेत्रीय कार्यालय और जिला मजिस्ट्रेट, शामली के प्रतिनिधि शामिल हैं। समिति का नोडल एजेंट जिला मजिस्ट्रेट को बनाया गया है।

संयुक्त समिति को निर्देश दिए गए हैं कि वे यमुना नदी के प्रभावित इलाके का शीघ्र निरीक्षण करें, अवैध खनन की सीमा का आकलन करें, संबंधित पर्यावरणीय स्वीकृतियों और अनुमतियों की जांच करें और किसी भी संभावित पर्यावरणीय क्षति का मूल्यांकन करें। इसके साथ ही समिति को सुधारात्मक और दंडात्मक उपाय सुझाने का भी कार्य सौंपा गया है।

समिति को तीन सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट एनजीटी के समक्ष प्रस्तुत करनी है। एनजीटी ने स्पष्ट किया कि इस दौरान किसी भी प्रकार का अवैध खनन नहीं होना चाहिए। इसके अलावा, अधिकरण ने संबंधित अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने के लिए भी निर्देश दिए हैं कि नदी और आसपास के पर्यावरण को कोई नुकसान न पहुंचे।

मामले की अगली सुनवाई 3 जुलाई 2026 को निर्धारित की गई है। एनजीटी ने यह स्पष्ट किया है कि नदी के संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। है।