आदिवासी समुदाय की युवतियां नर्सिंग और पैरामेडिकल कोर्स में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं
कविता और रविता जैसी लड़कियां अपने परिवार और समुदाय की मदद के लिए इस क्षेत्र में कदम रख रही हैं
हालांकि यह राह उनके लिए आसान नहीं हैं और उन्हें कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है
सरकारी स्कॉलरशिप और परिवार के समर्थन से ये लड़कियां अपने सपनों को साकार करने की दिशा में अग्रसर हैं
इस कहानी की शुरुआत करीब डेढ़ साल पहले हुई थी जब कॉलोनी में चल रहे एक निर्माण कार्य में मेरी मुलाकात मलबा (ईंट, चूरी और सीमेंट का मिक्स जो मकान तोड़ने पर निकलता है) उठा रहे भैरव सिंह से हुई।
मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले में स्थित जोबट के रहने वाले भैरव सिंह अपने साथ अपनी छोटी सी बेटी को लेकर आए थे। जब मैंने उनसे पूछा कि बच्ची स्कूल नहीं जाती? तो उन्होंने कहा, बिल्कुल जाती है। अभी स्कूल की छुट्टियां हैं इसलिए उसे गांव से साथ ले आए हैं। उन्होंने आगे बताया कि उनके चार बच्चे हैं। यह सबसे छोटी है।
बाकी तीन बच्चों में से एक लड़का शहर में कॉलेज में पढ़ रहा है। बड़ी बेटी भी बीएससी कर रही है और छोटी बेटी नर्सिंग का कोर्स करना चाहती है। वह चाहते हैं कि उनके बच्चे उनकी तरह मलबा बटोरने की जगह कोई अच्छा काम करें।
आदिवासी समुदाय से आने वाले भैरव सिंह की अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर इस जागरूकता ने मुझे प्रभावित किया था और फिर मैंने जब इस बारे में और रिसर्च की तो पता चला कि आदिवासी समुदाय से युवतियों का एक बड़ा प्रतिशत पिछले कुछ ही सालों में नर्सिंग या पैरामेडिक फील्ड से जुड़ने लगा है।
इसमें धार, बड़वानी, अलीराजपुर, झाबुआ, खरगोन आदि में मौजूद गांवों की लड़कियां बड़ी संख्या में शामिल हैं। कविता और रविता का लक्ष्य: इंदौर की एक छोटी सी बस्ती चद्दर फैक्ट्री में करीब 40-50 परिवार रहते हैं। इनमें सबसे ज्यादा संख्या आदिवासी समुदाय की है। यहीं एक कमरे में रहती हैं बड़वानी जिले के धनोरा गांव के बारेला आदिवासी समुदाय की कविता और रविता सोलंकी।
दोनों ही 2 साल पहले अपने गांव से शहर नीट की तैयारी के लिए आई थीं। मेहनत करने के बावजूद नीट में अच्छा स्कोर नहीं कर पाईं। इस वर्ष दोनों बहनों ने बीएससी में एडमिशन ले लिया।
अब साथ में नर्सिंग की प्रवेश परीक्षा (एम पी, पीएनएसटी) के लिए तैयारी कर रही हैं। उनके पिता ने शहर की एक फैक्ट्री में नौकरी ले ली है ताकि बच्चियों के साथ रहकर उन्हें मदद कर सकें और मां गांव में ही रहकर खेती संभालती हैं ताकि खाने और पढ़ने दोनों के लिए पैसे आ सकें।
फसल पकने पर पूरा परिवार इकट्ठा होकर फसल कटाई का काम भी करता है। कविता रविता भी इस समय परिवार की मदद करती हैं क्योंकि मजदूर आसानी से उपलब्ध भी नहीं हैं और महंगे भी पड़ते हैं।
कविता कहती हैं- नर्सिंग का कोर्स डिग्री के साथ ही उपचार करना भी सिखाता है। यह आमदनी का जरिया तो हो ही सकता है। साथ ही जरूरत पड़ने पर हम परिवार और समुदाय की मदद भी कर सकते हैं, आपातकाल में किसी के काम आ सकते हैं। यह एक सम्माननीय जॉब भी है। इसलिए इस फील्ड से जुड़ने की प्रेरणा मिली।
पिछली बार पीएनएसटी में परीक्षा तो पास कर ली थी लेकिन अच्छा कॉलेज नहीं मिल पा रहा था। इसलिए इस बार और अच्छे से तैयारी कर रहे हैं। उनके गांव से उनकी एक सीनियर का कॉलेज पिछले साल कंप्लीट हो गया है और अब वह सरकारी नौकरी भी पा चुकी हैं।
उनकी ही बस्ती की एक और युवती किरमा भी कोर्स पूरा कर नर्स बन चुकी है। यही कविता, रविता के लिए भी प्रेरणा है। कविता कहती हैं कि उनकी मम्मी की पीढ़ी तक लड़कियों के लिए इतनी छूट नहीं थी लेकिन अब घर में उनको पढ़ने लिखने की पूरी आजादी है।
उनकी बुआ ने भी नर्सिंग की डिग्री पूरी की है। शादी की बात पर कविता शर्माते हुए कहती हैं, कि उन्हें पढ़ा लिखा ही जीवन साथी चाहिए। भले ही गांव में रहे लेकिन पढ़ा लिखा और समझदार हो। तपते तीन शेड की छत के एक छोटे से कमरे में जहां एक पलंग और एक छोटी टेबल और कुर्सी के साथ दोनों बहनों के बैग रखे हैं, पिता ने जैसे तैसे एक कूलर की भी व्यवस्था कर दी ताकि बच्चियों को तकलीफ न हो।
यहीं कविता, रविता अपने सपनों की नई इबारत लिखने के लिए मेहनत कर रही हैं। शहर के ही दूसरे छोर पर है नर्सिंग और पैरामेडिकल के साथ अन्य कोर्सेज संचालित करने वाला एक कॉलेज, एडु सीरम जहां नर्सिंग और पैरामेडिकल दोनों ही कोर्सेज में बड़ी संख्या में आदिवासी युवतियां शामिल हैं।
इस संस्थान की डायरेक्टर व वरिष्ठ नर्स डॉ. उषा मलिक उकांडे कहती हैं- जब मैने 1979 में काम शुरू किया था तो ज्यादातर नर्सेस दक्षिण भारत, खासकर केरल से आती थीं। फिर धीरे धीरे बाकी जगहों और वर्गो से भी नर्सिंग फील्ड में युवतियां आने लगीं।
पिछले 5-7 सालों में आदिवासी इलाकों से नर्सिंग और पैरा मेडिक कोर्सेस में युवाओं और विशेषकर युवतियों की संख्या बढ़ी है। एक नियमित नौकरी और आमदनी तो इसके पीछे कारण है ही, साथ ही वे अपनी कम्युनिटी की मदद के लिए भी इस फील्ड से जुड़ रही हैं।
उकांडे का पीएचडी का कार्यक्षेत्र धार जिला और रिसर्च क्षेत्र झाबुआ के गांव ही रहे हैं। इस नाते मैं आदिवासी समुदाय को बहुत गहराई से समझती हैं। उनका मानना है कि आदिवासी महिलाओं का जुझारूपन, जमीन और प्रकृति से जुड़े रहने का उनका गुण, उनके पारंपरिक और प्राकृतिक खान पान और तौर तरीके कई स्तर पर हमारे लिए मददगार साबित हो सकते हैं।
चुनौतियां भी अपार
उनके कॉलेज में अभी करीब 70 प्रतिशत बच्चियां आदिवासी समुदाय से हैं। हालांकि चुनौती फीस की है। चार साल के इस कोर्स के लिए करीब 80 हजार सालाना फीस है। सरकार द्वारा इन बच्चों को एक स्कॉलरशिप भी दी जाती है लेकिन कई बार लंबे समय तक वह स्कॉलरशिप पेंडिंग रहती है। ऐसे में बच्चों के लिए फीस भरना भी मुश्किल होता है। फिर भी वह (ऊषा) पूरा सहयोग करती हैं।
इसके अलावा ज्यादातर बच्चे छोटी जगहों से स्कूली शिक्षा पूरी करके यहां आते हैं। लिहाजा उनके लिए अंग्रेजी माध्यम एक चुनौती बनता है।
इसी कॉलेज में पढ़ने वाली गेंदा जमरे बताती हैं कि उनके समुदाय में लड़कियों को पढ़ाना ही बड़ी बात रही है और पढ़ने के लिए गांव से बाहर भेजना तो आज भी आसान नहीं है। लेकिन उनके माता पिता ने उनपर विश्वास दिखाया और उन्हें नर्सिंग का कोर्स करने भेजा है।
वह यह कोर्स करके अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हैं और अपने माता पिता की मदद करना चाहती हैं। गेंदा की ही तरह उनकी कक्षा के अन्य विद्यार्थी रंगीता परमार, अनिल राजपूत और रोहित बामनिया भी कोर्स पूरा करने पर कम्यूनिटी सर्विसेज से जुड़ना चाहते हैं। उनकी इच्छा है कि गांव और छोटी जगहों पर वह चिकित्सा सेवाओं को और सुलभ बना सकें और साथ में अपने जीवन स्तर को भी और ऊंचा उठा सकें।