वरिष्ठ मनोचिकित्सक जिमी अंगद सिंह  
स्वास्थ्य

“व्यवस्था की गहरी विफलता का नतीजा है मानसिक रोगियों की आत्महत्याएं”

पंजाब में बीमारियों की वजह से सर्वाधिक आत्महत्याओं के कारणों पर वरिष्ठ मनोचिकित्सक जिमी अंगद सिंह ने भागीरथ से बात की

Bhagirath

पिछले कुछ सालों में पंजाब में बीमारी से जुड़ी आत्महत्याओं की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा रही है। राज्य में हर दूसरी आत्महत्या की वजह सेहत से जुड़ी समस्याएं हैं। यह स्थिति क्या बताती है?

यह स्थिति व्यवस्था की गंभीर खामियों की तरफ इशारा करती है। आत्महत्या को अक्सर परिवार को और ज्यादा बर्बादी से बचाने के लिए आर्थिक रूप से खुद को खत्म करने का कदम समझा जाता है, लेकिन ज्यादातर लोग इसके पीछे के गहरे मनोवैज्ञानिक पहलू को नहीं समझ पाते। यह स्थिति बताती है कि हम सिर्फ बीमारी से नहीं जूझ रहे हैं, बल्कि बीमारी के मनोवैज्ञानिक नतीजों को भी देख रहे हैं।

आत्महत्याओं की बढ़ती हिस्सेदारी हमें पंजाब में दुख और तकलीफ के बदलते स्वरूप के बारे में बताती है। हम अक्सर बीमारी को सिर्फ एक मेडिकल समस्या और आत्महत्या को एक मनोवैज्ञानिक समस्या मानते हैं। असल में ये दोनों आपस में जुड़े हुए हैं।

एनसीआरबी के आंकड़ों से पता चलता है कि पंजाब में बीमारी की वजह से होने वाली आत्महत्याओं का अनुपात लगातार सबसे ज्यादा रहा है। 2021 में राज्य में लगभग 45 प्रतिशत आत्महत्याएं बीमारी से जुड़ी थीं, जो उस समय राष्ट्रीय औसत से लगभग 2.5 गुना अधिक थीं।

इसका मतलब यह भी है कि पंजाब में बीमारी से जुड़ी आत्महत्याओं में मानसिक बीमारी का हिस्सा सबसे ज्यादा था।

जब किसी को कैंसर, किडनी की पुरानी बीमारी, लकवा, गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी या कोई और लंबी चलने वाली बीमारी हो जाती है तो उसका असर केवल शरीर पर ही नहीं पड़ता। यह सबसे पहले इंसान की पहचान बदलती है, फिर रोजगार की स्थिति, परिवार में भूमिका, आर्थिक हालात और भविष्य की उम्मीदों पर असर डालती है। इसीलिए कहा जाता है, “जहां उम्मीद नहीं, वहां जिंदगी नहीं।” बीमारी चाहे जानलेवा हो या न हो, अक्सर यह एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक बोझ बन जाती है। जब किसी ग्रामीण परिवार का कोई सदस्य पुरानी बीमारी का शिकार होता है तो सामाजिक-आर्थिक प्रभाव तेजी से पड़ता है।

पंजाब में लंबे समय तक रहने वाली गैर-संक्रामक बीमारियों का बोझ भी काफी ज्यादा है और कुछ इलाकों में पर्यावरण और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों को लेकर लंबे समय से चिंताएं रही हैं। जब लंबे समय तक चलने वाली बीमारी के साथ इलाज का भारी खर्च, रोजगार का नुकसान और भविष्य की चिंता जुड़ जाती है तो मरीज और उसके परिवार के लिए भावनात्मक तनाव बहुत ज्यादा हो सकता है।

मुझे सबसे ज्यादा चिंता इस बात की है कि हेल्थकेयर सिस्टम अक्सर बीमारी का इलाज तो करता है, लेकिन मरीज की मानसिक परेशानी या तनाव का नहीं। मरीज को कीमोथेरेपी, डायलिसिस या दिल की बीमारी का इलाज तो मिल सकता है, लेकिन शायद ही कोई यह पूछता है कि “आप भावनात्मक रूप से कैसा महसूस कर रहे हैं?” डिप्रेशन और एंग्जायटी (चिंता) अक्सर अनदेखे रह जाते हैं। इसलिए, मैं इन आंकड़ों को इस संकेत के तौर पर देखता हूं कि पंजाब को सिर्फ बायोमेडिकल मॉडल से आगे बढ़ने की जरूरत है। गंभीर बीमारी वाले हर मरीज को ऐसे व्यक्ति के तौर पर देखा जाना चाहिए जिसे मनोवैज्ञानिक सहारे की भी जरूरत हो सकती है। मानसिक स्वास्थ्य को हेल्थकेयर में कोई वैकल्पिक या अतिरिक्त चीज नहीं माना जा सकता। जान बचाने के लिए इसे रुटीन क्लिनिकल केयर का हिस्सा बनाना ही होगा!

पंजाब में स्वास्थ्य समस्याओं के कारण होने वाली आत्महत्याओं में मानसिक बीमारियों की बड़ी भूमिका है। अपने अनुभव के आधार पर बताएं कि मानसिक बीमारी के कारण आत्महत्याओं में बढ़ोतरी के क्या कारण हैं?

पंजाबी संस्कृति पुरुषों पर एक बड़ा ढांचागत बोझ डालती है कि वे ऐसे “प्रोवाइडर” (घर चलाने वाले मुखिया) के रूप में दिखें जो शारीरिक और आर्थिक दृष्टि से मजबूत हों। मानसिक बीमारी या किसी गंभीर शारीरिक स्थिति को स्वीकार करना उन्हें अपनी पहचान खोने जैसा लगता है। ड्रग्स और शराब की लत अचानक या बिना किसी कारण के नहीं लगती। ये अक्सर बिना इलाज वाले ट्रॉमा (मानसिक आघात), बेरोजगारी की निराशा और डिप्रेशन के लिए एक तरह का गलत “सेल्फ-मेडिकेशन” होते हैं। जब नशीले पदार्थों का सेवन पुरानी स्वास्थ्य समस्याओं के साथ जुड़ता है तो आवेग पर नियंत्रण तेजी से कम हो जाता है, जिससे जानलेवा तनाव पैदा होता है।

इसके अलावा लंबे समय तक कम मात्रा में ऑर्गेनोफॉस्फेट्स (कीटनाशकों) के संपर्क में रहने को लेकर न्यूरोसाइकोलॉजिकल चिंताएं सामने आ रही हैं। बढ़ती रिसर्च से पता चलता है कि ये केमिकल न्यूरोटॉक्सिन के रूप में काम करते हैं और एसिटाइलकोलिनेस्टरेज के स्तर को बदलते हैं। इसका सीधा संबंध खेती वाले इलाकों में गंभीर क्लिनिकल डिप्रेशन और आत्महत्या की प्रवृत्ति की अधिक हिस्सेदारी से है।

साथ ही, सोशल मीडिया के इस दौर में यह भी समझना चाहिए कि पंजाब तेजी से सामाजिक बदलाव से गुजर रहा है। पारंपरिक संयुक्त परिवार छोटे होते जा रहे हैं। बहुत से युवाओं के लिए दूसरे देश जाकर बसना (जिसे कनाडा फैक्टर भी कहा जाता है) एक मुख्य सपना बन गया है। शिक्षा, नौकरी और आर्थिक सफलता को लेकर उम्मीदें बहुत बढ़ गई हैं। साथ ही, सामाजिक सपोर्ट सिस्टम कमजोर हो गए हैं। एक और बात है जिस पर ध्यान देना जरूरी है। लगातार तनाव (क्रोनिक स्ट्रेस) अब आम बात हो गई है। हम मुश्किल हालात का सामना करने की हिम्मत की तो तारीफ करते हैं, लेकिन अक्सर भावनात्मक थकान को नजरअंदाज कर देते हैं।

जैसा कि पहले भी बात हुई है, नशीले पदार्थों का इस्तेमाल और उनकी लत स्थिति को और मुश्किल बना देती है, क्योंकि पंजाब भौगोलिक रूप से ड्रग तस्करी के रास्ते पर पड़ता है। लत मानसिक बीमारी का कारण भी है और उसका नतीजा भी। पंजाब सरकार के हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि राज्य के नशा-विरोधी अभियान के दौरान 90,000 से ज्यादा लोगों ने नशा-मुक्ति और ओपिओइड-आधारित इलाज के कार्यक्रमों के जरिए इलाज कराया। इससे चुनौती के बड़े दायरे और इलाज की सुविधाओं को बढ़ाने की अहमियत का पता चलता है।

युवाओं में मुझे एंग्जायटी डिसऑर्डर, पैनिक के लक्षण, दूसरों से तुलना करने की आदत, डिजिटल लत और अकेलापन तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है। अधेड़ उम्र के लोगों में लंबे समय तक दूसरों की देखभाल की जिम्मेदारी, आर्थिक दबाव, पुरानी बीमारी और काम से जुड़ा तनाव मुख्य कारण हैं।

एक बड़ी गलतफहमी यह है कि आत्महत्या इसलिए होती है क्योंकि कोई व्यक्ति “मरना चाहता है।” अधिकांश मामलों में लोग मौत नहीं चाहते। वे असहनीय मानसिक दर्द से राहत चाहते हैं। यह फर्क समझना बहुत जरूरी है क्योंकि मानसिक रोगों का इलाज किया जा सकता है।

पंजाब और पूरे भारत में मानसिक स्वास्थ्य की पहचान और इलाज के लिए मौजूदा संस्थागत व्यवस्था में संसाधनों की भारी कमी है

एक मनोचिकित्सक के तौर पर आप मानसिक बीमारियों के मामले में क्या ट्रेंड देख रहे हैं? कृपया मानसिक बीमारी के कारणों पर प्रकाश डालें।

एक मनोवैज्ञानिक के तौर पर मैं पिछले दशक में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कई नए ट्रेंड और बदलाव देख रहा हूं। भारत में और खासकर पंजाब में मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं ज्यादा जटिल होती जा रही हैं और कम उम्र के लोगों में भी दिखाई दे रही हैं।

पिछले दशक में बीमारियों के स्वरूप में काफी बदलाव आया है। उदाहरण के लिए “एनोमिक डिप्रेशन” (सामाजिक-आर्थिक बदलावों से उपजा अवसाद) और निराशा की स्थिति खेती पर आधारित अर्थव्यवस्था के ठप्प होने, युवाओं में कम रोजगार और पारंपरिक संयुक्त परिवार के सुरक्षा-तंत्र के टूटने से पैदा हो रही है। इसका असर उन युवा वयस्कों (18-35 साल) पर पड़ रहा है जो डंकी (अवैध प्रवास) के जरिए विदेश जाने की कोशिश करते हैं, जिससे उन्हें एंग्जायटी और माइग्रेशन ट्रॉमा (प्रवास से जुड़ा मानसिक आघात) का सामना करना पड़ता है।

विदेश जाने का भारी सिस्टमैटिक दबाव है, जिसके कारण यात्रा के लिए भारी कर्ज लेना पड़ता है और पीछे छूट जाने वालों को गहरा दुख होता है। इससे ज्यादातर उप-शहरी और ग्रामीण युवा प्रभावित होते हैं।

बुजुर्गों में अकेलापन और साइकोसिस (मानसिक असंतुलन) की समस्या “एम्प्टी-नेस्ट सिंड्रोम” (बच्चों के घर से चले जाने के बाद अकेलापन) के कारण होती है, जो युवाओं के बड़े पैमाने पर विदेश चले जाने से पैदा होता है। इससे बुजुर्ग माता-पिता अकेले ही खेती और पुरानी बीमारियों का सामना करने को मजबूर हो जाते हैं। इससे बुजुर्ग आबादी (60 साल से अधिक) प्रभावित होती है। इन मानसिक बीमारियों के मूल कारणों को गहराई से समझने का समय है। मानसिक बीमारी के मूल कारण कई स्तरों पर हैं। संरचनात्मक रूप से राज्य पहचान के संकट (आइडेंटिटी वैक्यूम) से जूझ रहा है। देश का “अन्न भंडार” होने का गर्व अब पर्यावरणीय और वित्तीय संकट में बदल गया है।

मशीनीकरण के कारण खेती में शारीरिक श्रम की जरूरत कम हो गई है, जिससे युवाओं की एक ऐसी पीढ़ी तैयार हुई है जिनकी उम्मीदें तो बहुत ज्यादा हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर रोजगार के अच्छे मौके बहुत कम हैं। यह संरचनात्मक ठहराव लोगों में बेकार होने की भावना और निराशा को जन्म देता है।

पहले हम अक्सर डिप्रेशन या एंग्जायटी को अलग-अलग देखते थे। आज कई लोगों में समस्याओं का मिला-जुला रूप देखने को मिलता है, जैसे एंग्जायटी के साथ नींद न आना (इंसोम्निया), डिप्रेशन के साथ नशीले पदार्थों का सेवन, बर्नआउट के साथ पैनिक अटैक या सोशल मीडिया की लत के साथ कम आत्म-सम्मान (लो सेल्फ-एस्टीम)।

किशोरों और युवा वयस्कों में मैं कई उभरते हुए ट्रेंड देख रहा हूं। पहला है, परफेक्शनिज्म (हर चीज में पूर्णता की चाहत)। युवाओं को तेजी से यह महसूस हो रहा है कि उन्हें पढ़ाई, काम और सामाजिक जीवन में बेहतरीन प्रदर्शन करना चाहिए और साथ ही अपनी एक आदर्श ऑनलाइन छवि भी बनाए रखनी चाहिए।

दूसरा है हाइपर-कनेक्टिविटी के बावजूद अकेलापन। हमारे पास पहले से कहीं अधिक डिजिटल संचार के साधन हैं, फिर भी बहुत से लोग कहते हैं कि उनके भावनात्मक रूप से गहरे रिश्ते कम हैं। तीसरा है अनिश्चितता। चाहे करियर के मौके हों, माइग्रेशन, रोजगार या आर्थिक स्थिरता हो, अनिश्चितता एक लंबे समय तक रहने वाला मानसिक तनाव बन गई है।

इसे आसान भाषा में समझें तो मानसिक बीमारी कई वजहों के आपस में मिलने से होती है, जैसे जेनेटिक वजहें, बचपन के बुरे अनुभव, लंबे समय का तनाव, लंबी शारीरिक बीमारी, नशीली चीजों का गलत इस्तेमाल, नींद की कमी, आर्थिक असुरक्षा, अकेलेपन का एहसास, घरेलू झगड़े और आजकल तेजी से बढ़ता डिजिटल इस्तेमाल और आमने-सामने की बातचीत में कमी।

पंजाब में मानसिक-सामाजिक तनाव को व्यापक सामाजिक सच्चाइयों से अलग नहीं किया जा सकता। माइग्रेशन, बदलते पारिवारिक ढांचे, कुछ इलाकों में खेती से जुड़ी अनिश्चितता, ड्रग्स का इस्तेमाल और पुरानी बीमारियां, ये सभी मानसिक सेहत पर असर डालते हैं।

जरूरी बात यह है कि मानसिक बीमारी न तो चरित्र की कोई कमी है और न ही केवल कोई बायोकेमिकल (शरीर के रसायनों से जुड़ी) गड़बड़ी। यह बायोलॉजी, जिंदगी के अनुभवों और सामाजिक माहौल के आपसी मेल से पैदा होती है। इसलिए, इसे रोकने के लिए सिर्फ अस्पतालों में ही नहीं, बल्कि स्कूलों, काम की जगहों, परिवारों और समुदायों में भी कदम उठाने की जरूरत है।

मानसिक बीमारियों की पहचान और इलाज में क्या कमियां हैं और किन सुधारों से इन कमियों को दूर किया जा सकता है?

पंजाब और पूरे भारत में मानसिक स्वास्थ्य की पहचान और इलाज के लिए मौजूदा संस्थागत व्यवस्था में संसाधनों की भारी कमी है। स्थिति को बदलने के लिए हमें ढांचागत कमियों की पहचान करनी होगी और खास उपाय करने होंगे।

इसमें कोई शक नहीं कि भारत ने डिस्ट्रिक्ट मेंटल हेल्थ प्रोग्राम और नेशनल टेली मेंटल हेल्थ प्रोग्राम (टेली मानस) जैसी पहलों के जरिए महत्वपूर्ण प्रगति की है। हालांकि, इलाज के मामले में अभी भी बड़ी कमी है, खासकर आम मानसिक विकारों के लिए। (देखें, पंजाब में अहम कमियां,)।

इन स्थितियों को सुधारने के लिए जरूरी है कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को सामान्य प्राइमरी केयर में पूरी तरह से शामिल किया जाना चाहिए। मदद पाने के लिए किसी किसान को मनोरोग विशेषज्ञ के पास जाने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। उनके लोकल कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर या आम आदमी क्लिनिक के जनरल फिजिशियन को डिप्रेशन की जांच करने और रुटीन चेकअप के दौरान बेसिक दवाएं देने के लिए पूरी तरह से ट्रेंड होना चाहिए। हमें साइकोलॉजिकल फर्स्ट एड (मानसिक प्राथमिक चिकित्सा) में आशा वर्कर, ऑक्सिलरी नर्स मिडवाइफ और लोकल ग्रंथियों (पुजारियों) जैसे स्ट्रक्चरल इंटरमीडियरीज को ट्रेंड करने की जरूरत है। वे गांव के लेवल पर ही विड्रॉल, नशीले पदार्थों के सेवन या गंभीर डिप्रेशन के शुरुआती व्यवहार संबंधी संकेतों को पहचान सकते हैं।

मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि प्राइमरी केयर और स्पेशलिटी क्लीनिक, खासकर ऑन्कोलॉजी, नेफ्रोलॉजी, कार्डियोलॉजी और डायबिटीज सेवाओं में रुटीन मेंटल हेल्थ स्क्रीनिंग को शामिल करने से समस्या काफी हद तक नियंत्रित हो सकती है। आत्महत्या की रोकथाम सिर्फ मेंटल हेल्थ का मुद्दा नहीं है, यह पब्लिक हेल्थ, सामाजिक और विकासात्मक मुद्दा भी है। अगर पंजाब बीमारी से जुड़ी आत्महत्याओं को कम करना चाहता है, तो हमें सिर्फ बीमारी का नहीं, बल्कि व्यक्ति का इलाज करना होगा। इसका मतलब है मेडिकल देखभाल के साथ-साथ साइकोलॉजिकल सपोर्ट, सामाजिक सुरक्षा और सहानुभूतिपूर्ण सामुदायिक जुड़ाव को मिलाना।

पंजाब में अहम कमियां

पिरामिड जैसा असंतुलन: विशेषज्ञ कर्मचारी मुख्य रूप से शहरी मनोरोग केंद्रों (जैसे पीजीआई चंडीगढ़ या सरकारी मेडिकल कॉलेज) में केंद्रित है। ग्रामीण इलाके, जहां संकट सबसे गंभीर है, पूरी तरह से प्राइमरी हेल्थकेयर नेटवर्क पर निर्भर हैं, जिसमें मनोरोग से जुड़ी बुनियादी जानकारी की कमी है। भारत में आबादी के अनुपात में मनोरोग विशेषज्ञों, मनोवैज्ञानिकों, मनोरोग सामाजिक कार्यकर्ताओं और मनोरोग नर्सों की कमी बनी हुई है। यह कमी ग्रामीण और कम सुविधा वाले जिलों में और भी अधिक है।

पागलखाने का कलंक: मनोरोग इलाज से अभी भी बहुत ज्यादा सामाजिक कलंक जुड़ा है। मानसिक स्वास्थ्य केंद्र में जाने वाले मरीज को तुरंत सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। कई परिवार डिप्रेशन की तुलना में डायबिटीज के बारे में बात करने में ज्यादा सहज महसूस करते हैं। नतीजतन, लोग पेशेवर मदद लेने में तब तक देरी करते हैं जब तक लक्षण गंभीर न हो जाएं।

फंड की भारी कमी: मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को कुल स्वास्थ्य बजट का बहुत छोटा हिस्सा मिलता है, जिससे सरकारी डिस्पेंसरी में जरूरी मनोरोग दवाओं की अक्सर कमी हो जाती है।

पहचान में देरी: कई लोग सिरदर्द, शरीर में दर्द, थकान या नींद की गड़बड़ी के साथ बार-बार डॉक्टरों के पास जाते हैं, लेकिन कोई यह नहीं देखता कि क्या ये लक्षण डिप्रेशन या एंग्जायटी (चिंता) के संकेत हैं। मानसिक स्वास्थ्य स्क्रीनिंग को अभी भी प्राइमरी हेल्थकेयर या पुरानी बीमारियों के इलाज में नियमित रूप से शामिल नहीं किया गया है। इसलिए, हमारा हेल्थकेयर सिस्टम शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को अलग-अलग मानता है। कैंसर, स्ट्रोक या किडनी की बीमारी का इलाज करा रहे मरीज का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन भी अपने आप होना चाहिए क्योंकि भावनात्मक परेशानी ठीक होने की प्रक्रिया, इलाज के नियमों का पालन और जीवन की गुणवत्ता पर काफी असर डालती है।