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स्वास्थ्य

विज्ञापनों की चमक बनाम दफ्तरों का अंधेरा

सरकारी दावों और ज़मीनी हकीकत का टकराव: सरकारी विभागों में महिला कर्मियों के साथ जेंडर-आधारित असंवेदनशीलता और संस्थागत भेदभाव

Snehlata Shukla

आधुनिक भारत के राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में ‘महिला सशक्तीकरण’ केवल एक नीतिगत शब्द नहीं रह गया है, बल्कि यह सरकारों की योजनाओं, चुनावी घोषणाओं और सार्वजनिक दावों का सबसे प्रमुख हिस्सा बन चुका है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियानों से लेकर महिला उद्यमिता और नेतृत्व को बढ़ावा देने वाले बड़े-बड़े वादे लगातार किए जाते हैं।  महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों की सबसे बड़ी संरक्षक होने का दावा सभी सरकारें करती हैं ।

लेकिन जब इन चमकदार नारों और सरकारी दावों के पीछे की प्रशासनिक सच्चाई को देखा जाता है, तो एक गहरा विरोधाभास सामने आता है। पूरे देश की महिलाओं को सशक्त बनाने का दावा करने वाला तंत्र अपने ही सरकारी विभागों में कार्यरत महिला कर्मचारियों के साथ लैंगिक असंवेदनशीलता, अपमानजनक भाषा, मानसिक प्रताड़ना और संस्थागत भेदभाव को रोक पाने में असफल दिखाई देता है।

यह समस्या किसी एक कार्यालय या विभाग तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी तंत्र के भीतर गहराई से बैठी उस पितृसत्तात्मक मानसिकता का हिस्सा है, जो महिलाओं को आज भी बराबरी के ‘पेशेवर’ के रूप में सहजता से स्वीकार नहीं कर पाई है।

भाषा की मानसिक क्रूरता: ‘कैज़ुअल सेक्सिज़्म’ का अदृश्य ज़हर

सरकारी दफ्तरों में अनुशासन और आचरण नियमावली की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, लेकिन महिला कर्मचारियों को रोज़मर्रा की बातचीत में जिस भाषा का सामना करना पड़ता है, वह अक्सर उनके आत्मसम्मान को भीतर से चोट पहुंचाने वाली होती है। मनोविज्ञान की भाषा में इसे ‘कैज़ुअल सेक्सिज़्म’ कहा जाता है।

यदि कोई महिला अधिकारी किसी मुद्दे पर दृढ़ता से अपनी बात रखे या गलत आदेश का विरोध करे, तो उसे बहुत जल्दी ‘ज़िद्दी’, ‘झगड़ालू’ या ‘अहंकारी’ कह दिया जाता है। पर वही व्यवहार यदि कोई पुरुष अधिकारी करे, तो उसे ‘मजबूत नेतृत्व’ और ‘प्रशासनिक क्षमता’ का प्रतीक माना जाता है। यह दोहरा मापदंड महिलाओं के आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता को कमजोर करता है।

इतना ही नहीं, छोटी-सी प्रशासनिक चूक या पारिवारिक कारणों से छुट्टी लेने पर अक्सर यह तंज सुनने को मिलता है कि “महिलाओं के लिए नौकरी तो बस टाइमपास है, इनका असली ध्यान घर-परिवार में रहता है।” ऐसी टिप्पणियां वर्षों की मेहनत, प्रतिस्पर्धा और पेशेवर प्रतिबद्धता को एक झटके में खारिज कर देती हैं।

दफ्तरों के गलियारों में महिलाओं के पहनावे, निजी जीवन और चरित्र को लेकर होने वाली गपशप इस मानसिक क्रूरता को और बढ़ा देती है। यदि कोई महिला अपनी मेहनत से आगे बढ़ती है, तो उसकी योग्यता की सराहना करने के बजाय उसके चरित्र पर सवाल उठाना व्यवस्था का सबसे घिनौना चेहरा बनकर सामने आता है।

उच्च अधिकारियों का रवैया और ‘ग्लास सीलिंग’

सरकारी तंत्र पदसोपान पर आधारित व्यवस्था है, जहाँ उच्च अधिकारियों का रवैया पूरे कार्यस्थल का वातावरण तय करता है। दुर्भाग्यवश, कई स्थानों पर महिला कर्मचारियों को सक्षम सहकर्मी के बजाय ‘कमजोर जेंडर’ के रूप में देखा जाता है।

महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स, कानून-व्यवस्था से जुड़ी जिम्मेदारियां या चुनौतीपूर्ण फील्ड पोस्टिंग अक्सर महिलाओं को यह कहकर नहीं दी जातीं कि “वे देर रात तक काम नहीं कर पाएंगी” या “फील्ड का दबाव उनके लिए कठिन होगा।” पहली नज़र में यह सुरक्षा की चिंता लग सकती है, लेकिन वास्तविकता में यह महिलाओं को अवसरों से दूर रखने का एक सूक्ष्म भेदभाव है। यही ‘ग्लास सीलिंग’ है—एक ऐसी अदृश्य दीवार, जो महिलाओं की प्रगति को सीमित कर देती है। मीटिंग्स में भी महिलाओं के सुझावों को हल्के में लेना एक सामान्य प्रवृत्ति है। कई बार किसी महिला कर्मचारी का सुझाव पूरी तरह अनसुना कर दिया जाता है, लेकिन वही बात जब कोई पुरुष सहकर्मी दोहराता है, तो उसे गंभीरता से लिया जाता है। महिलाओं के विचारों की यह बौद्धिक अनदेखी धीरे-धीरे उन्हें मौन की ओर धकेल देती है।

सूक्ष्म भेदभाव और सामाजिक अलगाव

सरकारी विभागों में भेदभाव हमेशा प्रत्यक्ष नहीं होता; कई बार यह बेहद सूक्ष्म रूप में सामने आता है। कार्यालय के बाद होने वाली अनौपचारिक बैठकों, चाय-सिगरेट के बीच बनने वाले नेटवर्क और आंतरिक रणनीतियों में पुरुष कर्मचारियों की भागीदारी अधिक होती है। महिलाएं पारिवारिक जिम्मेदारियों और सामाजिक सीमाओं के कारण इन ‘बॉयज़ क्लब’ का हिस्सा नहीं बन पातीं। परिणामस्वरूप, वे अनौपचारिक सत्ता संरचनाओं से बाहर कर दी जाती हैं और महत्वपूर्ण सूचनाएं अक्सर उन्हें सबसे बाद में मिलती हैं।

मातृत्व अवकाश या चाइल्ड केयर लीव (CCL) जैसी वैधानिक सुविधाओं को भी कई बार महिलाओं के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता है। छुट्टी लेने वाली महिला कर्मचारी को एक ‘बोझ’ की तरह देखा जाता है और यह माहौल बनाया जाता है कि “इसके हिस्से का काम दूसरों को करना पड़ रहा है।” इसका असर उनके मूल्यांकन, पदोन्नति और कार्यस्थल पर छवि पर भी पड़ता है। जैविक और सामाजिक जिम्मेदारियों को उनके करियर की कमजोरी बना दिया जाता है।

शिकायत समितियों का संस्थागत दिखावा

कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए पॉश एक्ट  के तहत हर सरकारी विभाग में आंतरिक शिकायत समिति का गठन अनिवार्य है। लेकिन व्यवहारिक स्तर पर इन समितियों की प्रभावशीलता कई बार सवालों के घेरे में दिखाई देती है।

यदि कोई महिला मानसिक उत्पीड़न, लैंगिक टिप्पणी या अपमानजनक व्यवहार के खिलाफ शिकायत करने का साहस जुटाती है, तो उसे अक्सर ‘समस्याप्रद’ महिला की तरह देखा जाता है। सहकर्मी दूरी बना लेते हैं और कई बार अप्रत्यक्ष दबाव इतना बढ़ा दिया जाता है कि शिकायत वापस लेना ही आसान विकल्प लगने लगता है।स्थिति तब और जटिल हो जाती है, जब आरोपी कोई प्रभावशाली अधिकारी हो। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच के बजाय “मामले को ज्यादा न बढ़ाने” की सलाह दी जाती है। इससे महिलाओं का कानूनी और संस्थागत विश्वास कमजोर पड़ता है।

नीतियों से पहले नीयत में बदलाव

यदि सरकारें वास्तव में महिला सशक्तीकरण को लेकर गंभीर हैं, तो सबसे पहले उन्हें अपने सरकारी दफ्तरों के भीतर मौजूद लैंगिक असमानताओं को खत्म करना होगा।जेंडर सेंसिटाइजेशन केवल निचले कर्मचारियों तक सीमित न रहकर वरिष्ठ अधिकारियों तक अनिवार्य होना चाहिए। लैंगिक अपमानजनक भाषा और व्यवहार के प्रति ‘शून्य सहनशीलता नीति’ अपनाई जानी चाहिए। शिकायत समितियों को विभागीय दबाव से मुक्त और अधिक स्वतंत्र बनाया जाना चाहिए, ताकि महिलाएं बिना भय के न्याय मांग सकें। इसके साथ ही पोस्टिंग, मूल्यांकन और प्रमोशन की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी होनी चाहिए, ताकि महिलाओं की योग्यता किसी व्यक्तिगत पूर्वाग्रह की शिकार न बने।

सशक्तीकरण नारों से नहीं, सम्मान से तय होगा

कोई भी समाज तब तक खुद को आधुनिक या प्रगतिशील नहीं कह सकता, जब तक उसकी आधी आबादी कार्यस्थल पर असुरक्षा, भेदभाव और मानसिक प्रताड़ना झेलने को मजबूर हो। सरकारी दफ्तरों में काम करने वाली महिलाएं किसी विशेष रियायत की नहीं, बल्कि अपने संवैधानिक अधिकार, सम्मान और बराबरी की हकदार हैं। जब तक सरकारी तंत्र की भाषा, सोच और व्यवहार में वास्तविक बदलाव नहीं आएगा, तब तक ‘महिला सशक्तीकरण’ के दावे केवल राजनीतिक भाषण और कागजी घोषणा भर बने रहेंगे। वास्तविक सशक्तीकरण विज्ञापनों से नहीं, बल्कि कार्यस्थलों पर मिलने वाले सम्मान और समान अवसरों से तय होगा।