भारत में आत्महत्या एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बन गई है और इसके कई मामले मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़े हैं। डिप्रेशन (अवसाद), सिजोफ्रेनिया, बाइपोलर डिसऑर्डर, एंग्जायटी डिसऑर्डर और नशीले पदार्थों के सेवन से जुड़ी समस्याओं (सब्सटेंस यूज डिसऑर्डर) जैसी स्थितियों में आत्महत्या की दर में बढ़ोतरी देखी गई है। आत्महत्या से जुड़े व्यवहार के कई कारण हो सकते हैं, जैसे:
जैविक और नशीले पदार्थों के सेवन से जुड़े कारक: मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकारों वाले लोगों में अक्सर न्यूरोट्रांसमीटर के असंतुलन के कारण मस्तिष्क के कामकाज में गड़बड़ी होती है, जिससे सोचने-समझने की क्षमता, भावनाएं और व्यवहार प्रभावित होते हैं। सेरोटोनिन, डोपामाइन और नॉरपेनेफ्रिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर डिप्रेशन, जल्दबाजी में निर्णय लेने (इम्पल्सिविटी) और आत्महत्या से जुड़े व्यवहार से जुड़े होते हैं। लंबे समय तक तनाव रहने से स्ट्रेस हार्मोन, खासकर कोर्टिसोल का स्तर बढ़ जाता है, जिससे भावनाओं को नियंत्रित करने की क्षमता कम हो सकती है और निराशा व हताशा की भावना बढ़ सकती है, जिससे आत्महत्या का खतरा बढ़ जाता है। नशीले पदार्थों का सेवन सेरोटोनिन, डोपामाइन और गामा-अमीनोब्यूट्रिक एसिड जैसे न्यूरोट्रांसमीटर सिस्टम को बदलकर इस खतरे को और बढ़ा देता है। शराब और ड्रग्स के लंबे समय तक सेवन से सोचने-समझने की क्षमता और समस्या सुलझाने की काबिलियत कम हो सकती है और निराशा की भावना बढ़ सकती है। नशे की हालत में व्यक्ति बिना सोचे-समझे कोई कदम उठा सकता है, जबकि नशा छोड़ने की स्थिति (विड्रॉल) में अक्सर भावनात्मक परेशानी और आत्महत्या के विचार बढ़ जाते हैं।
शारीरिक कारक: कई तरह की शारीरिक स्वास्थ्य स्थितियां मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकती हैं और आत्महत्या का खतरा बढ़ा सकती हैं। कैंसर, डायबिटीज, दिल की बीमारियां, न्यूरोलॉजिकल विकार, लंबे समय तक रहने वाला दर्द और विकलांगता जैसी पुरानी बीमारियों से लगातार तनाव, कामकाज में दिक्कत और जीवन की गुणवत्ता में कमी आ सकती है। नींद की समस्या, थकान, हार्मोन का असंतुलन और शारीरिक कमियां भावनात्मक सेहत को और खराब कर सकती हैं। लंबी बीमारी को संभालने का बोझ, साथ ही दूसरों पर निर्भरता, निराशा और अपनी मर्जी से काम न कर पाने की भावना मानसिक परेशानी को बढ़ा सकती है और आत्महत्या के विचारों व व्यवहार को बढ़ावा दे सकती है।
मनोवैज्ञानिक और व्यक्तिगत कारक: आत्महत्या के विचार रखने वाले लोगों में अक्सर निराशा, बेबसी, खुद को बेकार समझने, अपराधबोध और आत्म-सम्मान में कमी जैसी भावनाएं देखी जाती हैं। जीवन की खराब गुणवत्ता, जीवन में किसी मकसद का न होना और भविष्य को लेकर अनिश्चितता लगातार नकारात्मक सोच को बढ़ावा दे सकती है। तनाव, भावनात्मक परेशानी और रोजमर्रा की चुनौतियों का सामना करने में कठिनाई निराशा की भावना को और बढ़ा सकती है, जिससे व्यक्ति आत्महत्या को अपनी तकलीफों से बचने का एक तरीका मानने लगता है। परिवार और आपसी रिश्तों से जुड़े कारण: किसी व्यक्ति की मानसिक सेहत को बेहतर बनाने में परिवार का माहौल बहुत अहम भूमिका निभाता है। मानसिक बीमारी से जूझ रहे लोगों को काम न कर पाने या आर्थिक रूप से योगदान न दे पाने के कारण आलोचना का सामना करना पड़ता है और कुछ लोगों को परिवार के भीतर ही नजरअंदाजी, दुर्व्यवहार या भेदभाव का अनुभव होता है। वैवाहिक झगड़े, रिश्तों में समस्याएं और समाज से ठुकराए जाने की भावना अकेलेपन और भावनात्मक तकलीफ को और बढ़ा सकती है।
सामाजिक कारण: मानसिक बीमारी से जुड़े सामाजिक अलगाव, कलंक और भेदभाव आत्महत्या के जोखिम को बढ़ाने वाले मुख्य कारण हैं। लोग दूसरों की राय या ठुकराए जाने के डर से सामाजिक रिश्तों से दूर हो सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच, समुदाय का सहयोग न मिलना, गरीबी और अपर्याप्त सामाजिक कल्याण व्यवस्थाएं मानसिक तकलीफ को और बढ़ा सकती हैं।
इलाज से जुड़े कारण: आत्महत्या के जोखिम में योगदान देने वाला एक और महत्वपूर्ण कारण मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित उपलब्धता और पहुंच है। भारत में मानसिक विकारों की देर से पहचान, अपर्याप्त इलाज और ट्रीटमेंट गैप (लगभग 85 प्रतिशत) के कारण, लोग अक्सर बिना इलाज के लक्षणों और मानसिक तकलीफ से जूझते रहते हैं।
(लेखक प्रमोद गुप्ता छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव स्थित सेंट्रल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेस के निदेशक व मनोचिकित्सक हैं)