स्वास्थ्य

“10 में सात मामले मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े”

रांची स्थित सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकियाट्री के मनोचिकित्सक निशांत गोयल ने विवेक मिश्रा से साक्षात्कार में कहा जलवायु परिवर्तन बड़ा कारक है

Vivek Mishra

पिछले कुछ वर्षों में हम देख रहे हैं कि मानसिक स्वास्थ्य के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है। सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकियाट्री (सीआईपी) जैसे बड़े संस्थान के आंकड़े क्या कहते हैं, खासकर जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में?

वर्तमान में इस विषय पर हमारे यहां कोई हार्ड डेटा नहीं है क्योंकि इस पर शोध के दृष्टिकोण से काम नहीं किया गया है। मैं बाल मनोचिकित्सा और वयस्क रोगियों दोनों को देखता हूं। मेरे पास दैनिक ओपीडी में लगभग 60-70 रोगी होते हैं, जिनमें 15-20 नए रोगी और बाकी फॉलो-अप रोगी होते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य में 25 वर्षों के अनुभव के साथ, मैंने हमेशा यह पाया है कि प्रकाश या जलवायु का हमारे मन और उसके विकास पर प्रभाव पड़ता है। जब हम रोगियों का मूल्यांकन करते हैं तो हम पर्यावरण के बारे में विस्तृत जानकारी को भी शामिल करते हैं। मेरे अनुभव के अनुसार, 10 में 7 रोगियों में पर्यावरण या तो एक पूर्व-निदान कारक यानी बीमारी शुरु होने का कारक या तो एक अवक्षेपण कारक यानी बीमारी को बढ़ाने वाला कारक या फिर उनमें बीमारी के बने रहने का प्रमुख कारक बन रहा है। इसे जीवन से अलग नहीं किया जा सकता है। मानसिक बीमारी (ओपीडी) के मामलों में हर साल 10-12 फीसदी की वृद्धि देखी जा रही है, जिसमें वर्तमान में लगभग 1.3 लाख मरीज प्रति वर्ष देखे जा रहे हैं। यह भी देखा गया है कि बच्चों और किशोरों में मनोविकृति के मामलों में भी पिछले 7 वर्षों में काफी वृद्धि हुई है। विशेष रूप से कोविड के बाद मरीजों की संख्या में बढोतरी हुई है। यह संख्या ज्यादा जागरुकता के कारण भी बढ़ सकती है। सीआईपी अब वृद्ध लोगों के लिए एक अलग जेरियाट्रिक वार्ड स्थापित करने पर विचार कर रहा है।

आजकल बच्चे और युवाओं के बीच “ईको एंजायटी” शब्द का बहुत इस्तेमाल है। इसे आप किस नजरिए से देखते हैं?

बच्चों के लिए, जो कभी पेड़ों से आम तोड़ते थे, अब पेड़ न होने के कारण वे हताश हो जाते हैं और कुछ तो गुस्से में छत से छलांग लगाने जैसा कदम उठा लेते हैं। जलवायु परिवर्तन बच्चों के विकास को प्रभावित कर रहा है। बड़े लोगों के लिए भी, विशेषकर बुढ़ापे में, चलने-फिरने या शाम की सैर के लिए जगह की कमी है। यदि जगह है भी तो अत्यधिक गर्मी के कारण लोग अपने एयर कंडिशनिंग कमरों से बाहर नहीं निकलना चाहते। इससे “ईको चेंबर्स” की अवधारणा उत्पन्न हुई है, जहां लोग अपने कमरों के अंदर ही प्रकृति का अनुभव करने के लिए ऑक्सीजन प्लांट जैसे उपाय कर रहे हैं। यह मन की तसल्ली के लिए है क्योंकि वे बाहर नहीं जा पा रहे हैं। ईको एंजायटी से हर कोई प्रभावित है, लेकिन दो आयु वर्ग विशेष रूप से वल्नरेबल हैं: बचपन और बुढ़ापा। हमारी जिम्मेदारी है कि हम इन आयु वर्गों का अधिक खयाल रखें, क्योंकि बचपन का खराब होना भविष्य के लिए चिंताजनक है और बुजुर्गों को सम्मानजनक जीवन देना हमारा दायित्व।

प्रदूषण के अलग-अलग रूप, चाहे वायु हो, ध्वनि हो या प्रकाश प्रदूषण, यह मानसिक स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित कर रहे हैं?

मैं यह कहता हूं कि किसी भी तरह का पॉल्यूशन चाहे वो प्रकाश का प्रदूषण हो, चाहे वह ध्वनि प्रदूषण हो, चाहे वो वायु प्रदूषण हो, सभी कहीं न कहीं आपके शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य पर उतना ही या उससे ज्यादा प्रभाव डालते हैं। मैं आपको एक उदाहरण देता हूं। एयर पलूशन की वजह से लोगों को रेस्पेरेट्री बीमारी हो रही है। अब इन लोगों में रेस्पेरेट्री बीमारी तब तक ठीक नहीं होगी जब तक वायु प्रदूषण ठीक नहीं होगा। हम ध्यान नहीं देते धीरे-धीरे यह इररिवर्सिबल हो जाती है और कोई भी इररिवर्सिबल शारीरिक बीमारी दरअसल मानसिक बीमारी को साथ में होने का न्यौता देती है।

क्या आप मानते हैं कि मौसम और जलवायु का हमारे दिमाग पर कोई सीधा प्रभाव पड़ता है? और यह प्रभाव सभी लोगों पर एक जैसा होता है?

जलवायु का हमारी मानसिक सेहत पर गहरा प्रभाव पड़ता है। एक अच्छा वातावरण, अच्छे मन के लिए उतना ही जरूरी है जितना कि अच्छे तन के लिए। जलवायु का अनुकूल (कंड्यूसिव) और पॉजिटिव होना मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक है। हालांकि, यह ध्यान रखना चाहिए कि हर व्यक्ति की जलवायु और मौसम के साथ अनुकूलता अलग होती है। कुछ लोगों को गर्मी में तो कुछ लोगों को ठंड में और कुछ को बरसात में बेहतर महसूस होता है। ऐसा देखा जाता है कि जलवायु में बदलाव (क्लाइमेट वैरिएशन) संवेदनशील व्यक्तियों के मन पर असर डाल सकता है। इसका एक उदाहरण सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर (एसएडी) है। एसएडी एक प्रकार का डिप्रेशन है। यह तब होता है जब दिन छोटे होने लगते हैं और रातें लंबी, जिससे प्रकाश की मात्रा कम हो जाती है। इससे मन उदासी की ओर जाने लगता है। यह महिलाओं में पुरुषों की तुलना में अधिक देखा जाता है। इसी तरह, उदासीन (ग्लूमी) वातावरण में भी कुछ लोगों को सामना करने में तकलीफ हो सकती है, खासकर जब वे हाल ही में किसी क्षति से गुजरे हों।

आज का जलवायु परिवर्तन, जो तेजी से हो रहा है, मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर डाल रहा है, खासकर उन लोगों पर जो पहले से मानसिक बीमारियों से जूझ रहे हैं?

आज हम जलवायु परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं, जहां गर्मी बढ़ रही है, बर्फ तेजी से पिघल रही है और सर्दियां छोटी होती जा रही हैं। यह एक ग्लोबल फिनोमिनन है। वनों की कटाई (डी-फॉरेस्टेशन) और शहरीकरण (इनहैबिटेशन) से गर्मी बढ़ रही है। जलवायु में हो रहे प्राकृतिक परिवर्तन इंसान की शारीरिक और मानसिक साइकिल को एडजस्ट करने में तकलीफ पैदा कर रहे हैं। बढ़ती गर्मी और जलवायु परिवर्तन विशेष रूप से संवेदनशील व्यक्तियों में मौजूदा मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं (जैसे साइकोसिस, ओसीडी) के लक्षणों को बढ़ा सकते हैं। बीमारी के फिर से उभरने (रिलैप्स) होने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए, जलवायु का हमारी मानसिक सेहत पर पड़ने वाले प्रभाव को समझना बहुत महत्वपूर्ण है।

कुल मिलाकर, जलवायु परिवर्तन मानसिक स्वास्थ्य के लिए कितना बड़ा खतरा बन चुका है?

जलवायु परिवर्तन और मानसिक बीमारी का गहरा संबंध है। यह विभिन्न प्रकार की मानसिक बीमारियों को बढ़ा सकता है या जन्म दे सकता है। जलवायु परिवर्तन मानसिक बीमारी के उपचार को भी प्रभावित करता है। बाढ़ या अत्यधिक ठंड जैसी चरम मौसम की घटनाओं के कारण मरीजों को इलाज के लिए आने में कठिनाई हो सकती है, जिससे रिलैप्स की आशंका बढ़ जाती है। एक बार रिलैप्स होने पर, बीमारी के पुराने होने का खतरा बढ़ जाता है। यह सभी गैर-संचारी रोगों पर लागू होता है, जिनमें मानसिक बीमारियां, अवसाद, उच्च रक्तचाप, लिपिड की समस्याएं और मधुमेह शामिल हैं, जहां क्रोनिसिटी (पुरानी स्थिति) से बचना महत्वपूर्ण है। मानसिक बीमारी न केवल जीवन प्रत्याशा को प्रभावित करती है, बल्कि ‘दिव्यांगता के साथ बिताए गए दिन’ की अवधारणा को भी प्रभावित करती है।

जलवायु परिवर्तन को एक बहुत बड़े तनाव के रूप में भी देखा जा रहा है। यह तनाव कैसे मानसिक बीमारियों को जन्म दे रहा है?

जलवायु में बदलाव बड़े तनाव का कारक है और तनाव सभी मानसिक बीमारियों के पीछे का कारण है। पारिवारिक और वित्तीय तनाव की तरह, जलवायु परिवर्तन या पर्यावरणीय परिवर्तन भी अपने आप में एक बहुत बड़ी तनावपूर्ण जीवन घटना है। बाढ़ और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाएं किसानों की फसलों और दैनिक आय का विनाश करती हैं। इससे गरीबी और कर्ज में वृद्धि होती है। स्थितियां लोगों को हताशा में धकेल सकती हैं, जिससे कुछ लोग आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं। किसान आत्महत्याएं केवल सामंती प्रथाओं का परिणाम नहीं हैं दरअसल जलवायु परिवर्तन भी इसमें एक बड़ा कारक बन रहा है। इसके अलावा फसलों का बीमा और एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) जैसी सरकारी पहलें जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकती हैं। नीतिगत स्तर पर जलवायु परिवर्तन को स्वीकार करना और उसके अनुसार कदम उठाना आवश्यक है ताकि इस तरह की घटनाओं को कम किया जा सके।

आखिर में, आम लोग इस बढ़ते हुए खतरे का मुकाबला कैसे करें?

यह तो तय है कि बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन का मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है। ट्रॉपिकल क्लाइमेट में खासतौर पर बारिश एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, ऐसे में बारिश का बदलता चरित्र भी मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, इसे क्षेत्रीय खतरों में बांटना संभव नहीं है, यह सभी के लिए बराबर घातक है। मेरे हिसाब से पर्यावरण और मन को बेहतर बनाने के लिए लोगों को अपनी-अपनी जिम्मेदारी लेनी होगी। वनों की कटाई की भरपाई तत्काल नए पेड़ लगाकर होनी चाहिए। किसी चीज पर प्रतिबंध लगाना समाधान नहीं है, बल्कि इससे लोग उसे और अधिक करेंगे। ऐसे में छोटे-छोटे निजी और सार्वजनिक कदम भी मानसिक संकट का बड़ा समाधान बन सकते हैं।