राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) राउरकेला के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी उन्नत एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) आधारित प्रणाली विकसित की है, जो व्यक्ति की सोने की मुद्रा (स्लीप पोस्टर) को बिना किसी प्रत्यक्ष संपर्क के ट्रैक कर सकती है।
यह तकनीक खासतौर पर स्वास्थ्य सेवाओं में उपयोगी साबित हो सकती है, क्योंकि यह मरीजों की निगरानी बिना उनकी गोपनीयता भंग किए कर सकती है, यहां तक कि जब मरीज कंबल से ढका हो।
इस शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित जर्नल आईईईई सेंसर्स जर्नल में प्रकाशित हुए हैं। इस शोध पत्र के सह-लेखकों में एनआईटी राउरकेला के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग विभाग के सहायक प्रोफेसर प्रो. सप्तर्षि चटर्जी, उनके बी.टेक छात्र शिलादित्य मंडल तथा जादवपुर विश्वविद्यालय के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. देबांग्शु डे शामिल हैं।
दुनिया भर के अध्ययनों के अनुसार, सोने की गलत मुद्रा लंबे समय में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है। इससे रीढ़, जोड़ों और नसों पर असमान दबाव पड़ता है, जिससे क्रॉनिक मस्कुलोस्केलेटल दर्द, स्पाइनल डीजेनेरेशन, ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया, नसों को नुकसान, पाचन संबंधी समस्याएं, एसिड रिफ्लक्स और गठिया जैसी बीमारियां हो सकती हैं।
विशेष रूप से बिस्तर पर पड़े मरीजों के लिए गलत मुद्रा से बेडसोर जैसी गंभीर जटिलताएं हो सकती हैं।
अभी तक मरीजों की सोने की मुद्रा की निगरानी ज्यादातर मैन्युअल तरीके से की जाती है, जो असंगत और त्रुटिपूर्ण हो सकती है। पहनने योग्य सेंसर महंगे और असुविधाजनक होते हैं। कैमरा आधारित सिस्टम रोशनी की कमी, कंबल जैसे अवरोध और गोपनीयता संबंधी चिंताओं से प्रभावित होते हैं
प्रो. चटर्जी और उनकी टीम ने इन सीमाओं को दूर करने के लिए तीन तरह के सेंसर का उपयोग किया है—
लॉन्ग-वेव इंफ्रारेड इमेजिंग सेंसर: शरीर की गर्मी के आधार पर बिना विजुअल इमेज के मुद्रा पहचानता है। डेप्थ सेंसर: शरीर की आकृति और मुद्रा को रिकॉर्ड करता है। प्रेशर सेंसर: बिस्तर पर वजन के वितरण का विश्लेषण करता है। इन सेंसर से प्राप्त डेटा को प्रोसेस करने के लिए टीम ने एक जनरेटिव एआई मॉडल और ग्राफ-आधारित न्यूरल नेटवर्क विकसित किया, जो शरीर के विभिन्न जोड़ों की स्थिति को पहचानकर पोस्टर का वर्गीकरण करता है।
प्रो. सप्तर्षि चटर्जी के अनुसार, यह सिस्टम कठिन परिस्थितियों जैसे कम रोशनी या कंबल से ढके होने में भी प्रभावी ढंग से काम करता है। प्रयोगशाला परीक्षणों में इस मॉडल ने लगभग 98 प्रतिशत सटीकता हासिल की है, जो इसे वास्तविक उपयोग के लिए विश्वसनीय बनाती है।
मरीजों की निरंतर निगरानी संभव
केयरगिवर्स का कार्यभार कम होगा
गोपनीयता सुरक्षित रहेगी (कोई विजुअल इमेजिंग नहीं)
अस्पताल, बुजुर्गों और स्लीप एपनिया मरीजों के लिए उपयोगी
इस तकनीक को मल्टी-मॉडल इमेजिंग सिस्टम के रूप में बेड में इंटीग्रेट करने की अनुमानित लागत लगभग 30,000 रुपए है, जिसे बड़े पैमाने पर उत्पादन के जरिए और कम किया जा सकता है।
शोधकर्ता भविष्य में इस तकनीक को और उन्नत बनाकर गलत सोने की मुद्रा से जुड़ी बीमारियों की पहचान और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के निदान में भी उपयोग करने की योजना बना रहे हैं।
यह तकनीक भविष्य में अस्पतालों के साथ-साथ होम केयर सिस्टम में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।