स्वस्थ वयस्क जीवन का आधार क्या है? इसका उत्तर है प्रारम्भिक बाल्यावस्था में उचित पोषण, खासकर जीवन के प्रथम एक हजार दिनों में, अर्थात गर्भधारण से लेकर बच्चे के दूसरे जन्मदिन तक। यही वह अवधि होती है जब मस्तिष्क का तीव्र विकास होता है और शरीर को स्वस्थ वृद्धि के लिए पर्याप्त पोषण की आवश्यकता होती है। इस निर्माणकारी अवधि में पोषण की कमी का शारीरिक तथा बौद्धिक विकास पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए बच्चों को उचित पोषण उपलब्ध कराना 1950 के दशक में नियोजित विकास कार्यक्रमों के प्रारम्भ से ही स्वास्थ्य क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण विकासात्मक हस्तक्षेप रहा है। फिर भी कुपोषण आज भी भारत के समक्ष सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के नवीनतम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस 6) से इस समस्या की व्यापकता स्पष्ट होती है। हालांकि भारत ने बाल एवं मातृ स्वास्थ्य के अनेक संकेतकों पर उल्लेखनीय प्रगति की है, तथापि वर्ष 2023–24 के सर्वेक्षण से यह ज्ञात होता है कि आज भी अनेक बच्चों को जीवन के अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रथम एक हजार दिनों के दौरान पर्याप्त पोषण उपलब्ध नहीं हो पाता। एनएफएचएस 6 के निष्कर्षों के अनुसार 6 से 23 माह की आयु के स्तनपान करने वाले बच्चों में केवल 15 प्रतिशत को ही पर्याप्त आहार प्राप्त होता है।
इसी आयु वर्ग के जो बच्चे स्तनपान नहीं करते हैं, उनमें यह अनुपात 16 प्रतिशत है। कुल मिलाकर यह आंकड़ा लगभग 15 प्रतिशत के आसपास है। दूसरे शब्दों में भारत के पांच वर्ष से कम आयु के अस्सी प्रतिशत से अधिक बच्चों को पर्याप्त आहार प्राप्त नहीं हो रहा है। आधिकारिक रूप से “पर्याप्त आहार” से आशय है ऐसे स्तनपान करने वाले बच्चों को, जिन्हें कम-से-कम चार खाद्य समूहों से भोजन तथा न्यूनतम भोजन प्राप्त हो। वहीं, स्तनपान न करने वाले बच्चों के लिए इसका अर्थ है कि वे शिशु एवं लघु बाल आहार पद्धतियों के कम-से-कम तीन मानकों को पूरा करते हों अर्थात उन्हें प्रतिदिन कम-से-कम दो बार अन्य दूध या दुग्ध उत्पाद दिए जाएं, न्यूनतम भोजन सुनिश्चित किया जाए (6–8 माह के शिशुओं को दिन में कम-से-कम दो बार तथा 9–23 माह के बच्चों को कम-से-कम तीन बार ठोस अथवा अर्द्ध-ठोस भोजन दिया जाए) तथा दूध अथवा दुग्ध उत्पादों के खाद्य समूह को छोड़कर कम-से-कम चार भिन्न-भिन्न खाद्य समूहों से ठोस अथवा अर्द्ध-ठोस भोजन उपलब्ध कराया जाए। इसके दुष्परिणाम अन्य प्रमुख स्वास्थ्य संकेतकों, विशेषकर आयु के अनुसार कम लंबाई तथा क्षीणता (लंबाई के अनुसार कम वजन) में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
एनएफएचएस 6 के अनुसार देश में पांच वर्ष से कम आयु के 29 प्रतिशत बच्चे बौनेपन से तथा 19 प्रतिशत बच्चे क्षीणता से ग्रस्त हैं। ये आंकड़े न केवल देश के समक्ष विद्यमान पोषण संकट की व्यापकता को रेखांकित करते हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि इसका असमान रूप से अधिक भार ग्रामीण क्षेत्रों पर पड़ रहा है। किसी राज्य की आर्थिक समृद्धि अथवा सुशासन की प्रतिष्ठा भी बच्चों की पोषण स्थिति को आवश्यक रूप से प्रभावित नहीं करती। सामान्यतः यह अपेक्षा की जा सकती है कि अधिक समृद्ध राज्य मातृ एवं शिशु कल्याण कार्यक्रमों पर अधिक व्यय करेंगे और परिणामस्वरूप उनके पोषण संबंधी संकेतक बेहतर होंगे। किन्तु भारत के समृद्ध राज्यों में गिने जाने वाले गुजरात में 6 से 23 माह की आयु के केवल लगभग 8 प्रतिशत बच्चों को ही पर्याप्त आहार प्राप्त होता है। वहां पांच वर्ष से कम आयु के एक-तिहाई से अधिक बच्चे बौनेपन से तथा लगभग पांचवां भाग क्षीणता से ग्रस्त है।
इसके विपरीत, देश के सबसे निर्धन राज्यों में से एक झारखंड में अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति दिखाई देती है, जहां 13 प्रतिशत से अधिक बच्चों को पर्याप्त आहार प्राप्त होता है। इसी प्रकार, व्यापक सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों के कारण अपेक्षाकृत बेहतर शासन वाले राज्य के रूप में माने जाने वाले आंध्र प्रदेश में 19 प्रतिशत से अधिक बच्चों को पर्याप्त आहार उपलब्ध हो रहा है। दूसरी ओर मध्य प्रदेश, जहां निरंतर उच्च स्तर का कुपोषण दर्ज किया जाता रहा है, एक बार फिर बाल पोषण से संबंधित अनेक संकेतकों में सबसे ऊपर है। राज्य में पांच वर्ष से कम आयु के 31 प्रतिशत से अधिक बच्चे बौनेपन से ग्रस्त हैं। कम वजन वाले बच्चों का अनुपात पिछले राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में 33 प्रतिशत से बढ़कर 39.7 प्रतिशत हो गया है। ये आंकड़े वर्तमान हस्तक्षेपों की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं। दीर्घकालिक बाल कुपोषण की कीमत केवल शारीरिक विकास तक सीमित नहीं रहती। शोध कार्यों से यह सिद्ध हुआ है कि प्रारम्भिक बाल्यावस्था में अपर्याप्त पोषण का संबंध आगे चलकर शिक्षा में निम्न उपलब्धि तथा वयस्क अवस्था में कम उत्पादकता से है। इस दृष्टि से कुपोषण केवल स्वास्थ्य संबंधी चुनौती नहीं बल्कि आर्थिक चुनौती भी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 6 के परिणाम संकेत देते हैं कि नीति-निर्माताओं को केवल कार्यक्रमों के विस्तार पर ही नहीं बल्कि उनकी प्रभावशीलता तथा लाभार्थियों तक उनकी वास्तविक पहुंंच में सुधार पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए।