देश में लगभग 10 से 14 लाख लोग सिकल सेल बीमारी से प्रभावित हैं, जिनमें बड़ी संख्या आदिवासी समुदायों की है। प्रतीकात्मक छवि, साभार: आईस्टॉक
स्वास्थ्य

दुनिया भर में सिकल सेल बीमारी के साथ जन्म लेने वाले हर 6 बच्चों में से 1 भारत में जन्म लेता है

विश्व सिकल सेल दिवस: भारत में वैश्विक सिकल सेल जन्मों का 16 फीसदी हिस्सा, 10 से 14 लाख मरीज, जनजातीय क्षेत्रों में 86 में 1 जन्म प्रभावित

Dayanidhi

  • वैश्विक स्तर पर होने वाले सिकल सेल रोग (एससीडी) के कुल मामलों में भारत का हिस्सा लगभग 16 प्रतिशत है।

  • देश में लगभग 10 से 14 लाख लोग सिकल सेल बीमारी से प्रभावित हैं, जिनमें बड़ी संख्या आदिवासी समुदायों की है।

  • मध्य, पश्चिमी और दक्षिणी भारत में सिकल सेल रोग का अधिक प्रभाव देखा जाता है, विशेषकर अनुसूचित जनजातियों में।

  • आदिवासी क्षेत्रों में लगभग हर 86 में से 1 बच्चा सिकल सेल रोग के साथ जन्म लेता है, जो चिंता का विषय है।

  • सरकार ने राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन शुरू किया है, जिसका लक्ष्य जांच, उपचार और आनुवंशिक परामर्श को बढ़ावा देना है।

हर साल 19 जून को विश्व सिकल सेल दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को सिकल सेल बीमारी के बारे में जागरूक करना और इसके इलाज, पहचान तथा रोकथाम पर ध्यान दिलाना है। यह दिन दुनिया भर में सरकारों, स्वास्थ्य संगठनों और समाज को यह याद दिलाता है कि इस बीमारी से प्रभावित लोगों को समय पर इलाज और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिलनी चाहिए।

विश्व सिकल सेल दिवस की शुरुआत वर्ष 2008 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा की गई थी। तब से हर साल यह दिन सिकल सेल बीमारी को एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में पहचान दिलाने के लिए मनाया जाता है।

सिकल सेल बीमारी क्या है?

सिकल सेल बीमारी एक आनुवंशिक रक्त विकार है। इस बीमारी में शरीर की लाल रक्त कोशिकाएं सामान्य गोल और लचीली होने के बजाय कठोर और अर्धचंद्र (हंसिया जैसी) आकार की हो जाती हैं।

इन असामान्य कोशिकाओं के कारण रक्त का प्रवाह ठीक से नहीं हो पाता और शरीर के विभिन्न अंगों तक ऑक्सीजन की आपूर्ति कम हो जाती है। इससे मरीज को बार-बार तेज दर्द, थकान, संक्रमण और कई बार गंभीर जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। यह बीमारी जन्म से ही मौजूद होती है और माता-पिता से बच्चों में आनुवंशिक रूप से पहुंचती है।

दुनिया में स्थिति

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, यह बीमारी दुनिया के कई हिस्सों में बड़ी स्वास्थ्य समस्या बन चुकी है। साल 2021 में लगभग 77 लाख से अधिक लोग इस बीमारी के साथ जी रहे थे। हर साल लगभग पांच लाख से अधिक बच्चे इस बीमारी के साथ जन्म लेते हैं, जिनमें अधिकतर मामले अफ्रीका के उप-सहारा क्षेत्रों में पाए जाते हैं।

इस बीमारी के कारण छोटे बच्चों में मृत्यु दर भी काफी अधिक है। कई मामलों में सही समय पर इलाज न मिलने के कारण स्थिति और गंभीर हो जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक आंकड़े इससे भी अधिक हो सकते हैं क्योंकि कई जगहों पर इस बीमारी की सही पहचान नहीं हो पाती।

भारत में सिकल सेल रोग का प्रभाव

भारत में भी सिकल सेल बीमारी एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती है। शोध पत्रिका द लैंसेट हेमेटोलॉजी के अनुसार, भारत दुनिया में सिकल सेल की बीमारी वाले देशों दूसरा सबसे बड़ा देश है।

वैश्विक स्तर पर होने वाले सिकल सेल रोग (एससीडी) के कुल मामलों में भारत का हिस्सा लगभग 16 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि दुनिया भर में इस बीमारी के साथ जन्म लेने वाले हर छह बच्चों में से लगभग एक भारत में जन्म लेता है। इसलिए यह बीमारी भारत के लिए एक बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दा बन गई है।

देश में लगभग 10 से 14 लाख लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं, जबकि लाखों लोग इसके “कैरीयर” हैं, यानी उनमें बीमारी के लक्षण नहीं होते लेकिन वे इसे आगे बच्चों में पहुंचा सकते हैं। यह बीमारी विशेष रूप से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात और ओडिशा जैसे राज्यों में अधिक पाई जाती है।

यह बीमारी भारत के सभी हिस्सों में समान रूप से नहीं पाई जाती। यह मुख्य रूप से देश के मध्य, पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों में अधिक देखी जाती है। इन क्षेत्रों में आदिवासी और वंचित समुदायों में इसका प्रभाव ज्यादा है।

भारत में हर साल हजारों बच्चे इस बीमारी के साथ जन्म लेते हैं। कई आदिवासी क्षेत्रों में पहले उचित इलाज न मिलने के कारण बच्चों की मृत्यु दर बहुत अधिक थी, लेकिन अब स्थिति में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है।

सरकारी प्रयास और मिशन

भारत सरकार ने इस बीमारी से निपटने के लिए एक राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया है जिसे राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन कहा जाता है।

इस मिशन का उद्देश्य है कि देश के प्रभावित क्षेत्रों में लोगों की समय पर जांच की जाए, बीमारी की जल्दी पहचान हो, और मरीजों को सही इलाज व परामर्श मिल सके। इसके साथ ही लोगों को आनुवंशिक परामर्श भी दिया जाता है ताकि भविष्य में इस बीमारी के प्रसार को कम किया जा सके।

जागरूकता और समानता की आवश्यकता

विश्व सिकल सेल दिवस 2026 का मुख्य संदेश यह है कि हर व्यक्ति को समान स्वास्थ्य सुविधा मिलनी चाहिए, चाहे वह किसी भी क्षेत्र, वर्ग या आर्थिक स्थिति से हो। इस साल की थीम “जीवित रहने के अंतर को खत्म करना: सिकल सेल बीमारी में समानता” इसी बात पर जोर देता है कि बीमारी से प्रभावित लोगों के बीच जीवन बचाने की असमानता को कम किया जाए।

सिकल सेल बीमारी का इलाज संभव है, लेकिन इसके लिए समय पर पहचान, नियमित उपचार और जागरूकता बेहद जरूरी है। यदि समाज और सरकार मिलकर काम करें तो इस बीमारी के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

सिकल सेल बीमारी केवल एक चिकित्सा समस्या नहीं, बल्कि एक सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती भी है। विश्व सिकल सेल दिवस हमें यह याद दिलाता है कि जागरूकता, शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से लाखों लोगों का जीवन बचाया जा सकता है।