अस्पतालों के आईसीयू में जूझती जिंदगियां, बाहर रोते परिजन और मौत से लड़ते मासूम—मेनिन्जाइटिस की यह तस्वीर हर साल और भयावह होती जा रही है। मामूली सिरदर्द और बुखार से शुरू होने वाली यह बीमारी अब खामोश कातिल बन चुकी है, जो हर घंटे औसतन 30 जिंदगियों को निगल रही है। यानी सालभर में ढाई लाख से ज्यादा लोगों की मौत सिर्फ इसी बीमारी से हो रही है।
इस बारे में किए एक नए अंतराष्ट्रीय अध्ययन से पता चला है कि 2023 में इस बीमारी ने करीब 259,000 लोगों की जान ली थी, जबकि 25.4 लाख से ज्यादा नए मामले सामने आए थे।
हर दिन सैकड़ों बच्चों की जा रही जान
सबसे डराने वाली बात यह है कि इन मौतों में करीब एक-तिहाई बच्चे शामिल हैं। आंकड़े बताते हैं कि 86,600 से ज्यादा पांच साल से कम उम्र के बच्चों की जान इस बीमारी ने ली है, यानी हर दिन सैकड़ों मासूम इस बीमारी से जिंदगी की जंग हार रहे हैं। इनमें ज्यादातर मामले अफ्रीकी देशों से जुड़े हैं।
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल लैंसेट न्यूरोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं।
गौरतलब है कि हाल ही में ब्रिटेन में मेनिन्जाइटिस के प्रकोप के बाद यह बीमारी एक बार फिर सुर्खियों में आ गई है, जहां एक नाइटक्लब से फैले संक्रमण के कारण दो लोगों की मौत हो गई। ब्रिटेन के केंट क्षेत्र में हाल ही में बैक्टीरियल संक्रमण के प्रकोप के बाद दो हफ्तों में 10,000 से ज्यादा लोगों को वैक्सीन दी गई।
देखा जाए तो, साल 2000 के बाद से टीकों की उपलब्धता की वजह से दुनिया भर में इस बीमारी के मामलों और मौतों में कमी आई है, फिर भी खतरा पूरी तरह टला नहीं है।
क्या है मेनिन्जाइटिस
बता दें मेनिन्जाइटिस एक गंभीर बीमारी है, जिसमें मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के आसपास की झिल्लियों में सूजन आ जाती है। यह वायरस, बैक्टीरिया, फंगस या परजीवियों के संक्रमण से जुड़ी बीमारी है। इनमें बैक्टीरियल संक्रमण अपेक्षाकृत कम होता है, लेकिन सबसे ज्यादा घातक साबित होता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी पुष्टि की है कि इस बीमारी का सबसे घातक रूप बैक्टीरियल मेनिन्जाइटिस है, जो महज 24 घन्टों में ही मरीज की जान ले सकता है।
यह कितना घातक है इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इससे संक्रमित हर छठे मरीज की मृत्यु हो जाती है। दूसरी तरफ जो बच जाते हैं उनकी जिंदगी भी कोई आसान नहीं होती। आंकड़े दर्शाते हैं कि इसके शिकार 20 फीसदी मरीजों को लंबे समय तक शारीरिक या मानसिक समस्याएं हो सकती हैं।
बैक्टीरियल मेनिन्जाइटिस के चार मुख्य कारण माने जाते हैं इनमें: नाइसेरिया मेनिन्जाइटिडिस (मेनिन्गोकोकस), स्ट्रेप्टोकोकस निमोनिया (न्यूमोकोकस), हीमोफिलस इन्फ्लुएंजा और स्ट्रेप्टोकोकस एगालैक्टिए (ग्रुप-बी स्ट्रेप्टोकोकस) शामिल हैं।
ये बैक्टीरिया दुनियाभर में मेनिन्जाइटिस से होने वाली आधे से ज्यादा मौतों के लिए जिम्मेवार हैं। साथ ही, सेप्सिस और निमोनिया जैसी गंभीर बीमारियां भी पैदा कर सकते हैं।
पता चला है कि यह बीमारी किसी भी आयु वर्ग के लोगों को अपनी चपेट में ले सकती है। यह एक संक्रामक बीमारी है जो खांसते या छींकते समय निकलने वाली बूंदों या फिर नजदीकी सम्पर्क से फैलती है। इस बीमारी से सबसे ज्यादा प्रभावित निम्न और मध्यम आय वाले देश हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक यह बेहद घातक बीमारी है, साथ ही इससे स्वास्थ्य से जुड़ी जटिल समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं। ऐसे में इससे निपटने के लिए तत्काल चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता पड़ती है।
‘मेनिन्जाइटिस बेल्ट’: जहां सबसे ज्यादा कहर बरपा रही बीमारी
इसके प्रसार की बात करें तो सबसे ज्यादा मामले उप-सहारा अफ्रीका में सामने आते हैं, यही वजह है कि इस क्षेत्र को अक्सर 'मेनिन्जाइटिस बेल्ट' के रूप में भी जाना जाता है।
यह बेल्ट पश्चिम में सेनेगल और गाम्बिया से लेकर पूर्व में इथियोपिया तक फैली है। निष्कर्ष दर्शाते हैं कि नाइजीरिया, चाड और नाइजर जैसे देशों में स्थिति विशेष रूप से गंभीर पाई गई है। वहीं, विकसित देशों में भी हालिया प्रकोप यह दिखाते हैं कि उन देशों में भी खतरा अभी टला नहीं है।
अध्ययन से पता चला है कि इस बीमारी के पीछे छिपे कारण भी उतने ही गंभीर हैं। जन्म के समय कम वजन, समय से पहले जन्म (प्रीमैच्योर डिलीवरी) और घरों में दूषित हवा मेनिन्जाइटिस से होने वाली मौतों के सबसे बड़े जोखिम कारक बनकर सामने आए हैं। यानी यह सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि गरीबी, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और खराब जीवन स्थितियों की भी कहानी है।
रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा 2030 तक मेनिन्जाइटिस पर काबू पाने का जो लक्ष्य रखा गया है उसे हासिल करना अब मुश्किल नजर आ रहा है।
खतरे में लक्ष्य
डब्ल्यूएचओ ने इस दशक के अंत तक 2015 के स्तर की तुलना में बैक्टीरियल मेनिन्जाइटिस के मामलों में 50 फीसदी और मौतों में 70 फीसदी की कमी लाने का लक्ष्य रखा है। लेकिन अध्ययन के मुताबिक, हर साल मामलों और मौतों में गिरावट उस रफ्तार से नहीं हो रही, जितनी इस लक्ष्य को पाने के लिए जरूरी है, यानी इस दिशा में हो रही प्रगति की रफ्तार अभी भी आधी है।
ऐसे में विशेषज्ञों ने जोर दिया है कि इस चुनौती से निपटने के लिए टीकाकरण का दायरा बढ़ाना, बेहतर इलाज और जांच व निगरानी प्रणाली को मजबूत करना बेहद जरूरी है। शोधकर्ताओं ने यह भी आगाह किया कि अक्सर विकासशील देशों में मेनिन्जाइटिस से होने वाली कई मौतें दर्ज ही नहीं हो पातीं, जिससे असल आंकड़े इससे कहीं ज्यादा हो सकते हैं।
मेनिन्जाइटिस महज एक संक्रमण नहीं, बल्कि कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था और असमानता की भी कहानी है। इसका बढ़ता खतरा यह भी दिखाता है कि स्वास्थ्य सेवाओं में असमानता कितनी बड़ी चुनौती है, जहां इलाज की कमी, मौत का कारण बन रही है।