आईआईटी मद्रास के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के प्रो. एस. महालिंगम (बाएं से दूसरे) अपने शोध दल के साथ संस्थान परिसर की प्रयोगशाला में। 
स्वास्थ्य

भारत में स्तन कैंसर पर बड़ा जीनोमिक अध्ययन, हर चार में से एक मरीज में मिला वंशानुगत जोखिम

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास और कार्किनोस हेल्थकेयर के शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया

DTE Staff

  • आईआईटी मद्रास और कार्किनोस हेल्थकेयर के शोधकर्ताओं ने भारत में स्तन कैंसर पर सबसे बड़े जीनोमिक अध्ययन को पूरा किया।

  • अध्ययन में पाया गया कि हर चार में से एक मरीज में वंशानुगत आनुवंशिक परिवर्तन है, जो बीआरसीए1 और बीआरसीए2 जीन के बाहर भी पाया गया।

  • यह अध्ययन भारत में आनुवंशिक जांच प्रणाली की पुनर्समीक्षा की आवश्यकता को दर्शाता है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास और कार्किनोस हेल्थकेयर के शोधकर्ताओं ने भारत में स्तन कैंसर पर अब तक के सबसे बड़े जीनोमिक अध्ययनों में से एक को पूरा किया है। अध्ययन में चेन्नई के कुमरन अस्पताल और चेन्नई ब्रेस्ट सेंटर ने भी सहयोग किया। शोध में पाया गया कि भारत में हर चार में से एक स्तन कैंसर मरीज में कैंसर जोखिम से जुड़ा वंशानुगत आनुवंशिक परिवर्तन मौजूद है, जिनमें अधिकांश बदलाव प्रसिद्ध बीआरसीए1 और बीआरसीए2 जीन के बाहर पाए गए।

इसका मतलब यह है कि अगर 4 महिलाओं को स्तन कैंसर है, तो उनमें से लगभग 1 महिला के शरीर में ऐसा जीन बदलाव होता है जो उसे परिवार से मिला है यानी यह जोखिम माता-पिता से बच्चों तक जा सकता है।

यह अध्ययन प्रतिष्ठित ऑन्कोलॉजी जर्नल बीएमसी कैंसर में प्रकाशित हुआ है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, यह अध्ययन बताता है कि भारत में वर्तमान आनुवंशिक जांच प्रणाली की पुनर्समीक्षा की आवश्यकता है, क्योंकि अभी भी परीक्षण मुख्यतः बीआरसीए जीन तक सीमित हैं। अध्ययन में भारतीय आबादी के लिए सटीक कैंसर उपचार (प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी), परिवार आधारित जोखिम रोकथाम और सुरक्षित कीमोथेरेपी रणनीतियों के विकास में महत्वपूर्ण आधार प्रदान किया गया है।

आईआईटी मद्रास के राष्ट्रीय कैंसर टिश्यू बायोबैंक के प्रमुख और अध्ययन के लीड लेखक प्रो. एस. महालिंगम ने कहा, " भारत में लगभग एक-चौथाई स्तन कैंसर मरीजों में वंशानुगत रोगजनक वेरिएंट मिलने से यह स्पष्ट होता है कि भारत में बीआरसीए-आधारित सीमित जांच पर्याप्त नहीं है और मल्टी-जीन या एक्सोम आधारित परीक्षण अपनाने की आवश्यकता है।"

अध्ययन में 479 स्तन कैंसर मरीजों के जर्मलाइन डीएनए का विश्लेषण किया गया। यह डेटा आईआईटी मद्रास के राष्ट्रीय कैंसर टिश्यू बायोबैंक से प्राप्त नमूनों पर आधारित है और अब भारत कैंसर जीनोम एटलस का हिस्सा बन चुका है, जो देश का पहला ओपन-सोर्स कैंसर जीनोम डेटा संसाधन है।

प्रमुख निष्कर्ष

अध्ययन में पाया गया कि:

  1. 24.6 प्रतिशत मरीजों में रोगजनक या संभावित रोगजनक आनुवंशिक बदलाव मिले।

  2. केवल 8.35 प्रतिशत मामलों में बीआरसीए1/बीआरसीए2 जीन परिवर्तन पाए गए।

  3. 11.9 प्रतिशत मरीजों में डीएनए मरम्मत से जुड़े अन्य जीन प्रभावित थे।

  4. कुल सकारात्मक मामलों में 67 प्रतिशत बदलाव बीआरसीए जीन के बाहर पाए गए, जिनमें एमएलएच1, एनएफ1, टीपी53 और आरबी1 जैसे जीन शामिल हैं।

शोध के प्रथम लेखक डॉ. जॉन पीटर के अनुसार, अध्ययन में कैंसर से इतर स्वास्थ्य जोखिम भी सामने आए। 21 प्रतिशत से अधिक मरीजों में ऐसे आनुवंशिक बदलाव मिले जो मार्फान सिंड्रोम, हृदय अतालता और पारिवारिक उच्च कोलेस्ट्रॉल जैसी बीमारियों से जुड़े हैं। वहीं लगभग 8 प्रतिशत मरीज कुछ आनुवंशिक एवं मेटाबोलिक रोगों के वाहक पाए गए।

कीमोथेरेपी सुरक्षा पर भी संकेत

कार्किनोस हेल्थकेयर की डॉ. बानी जॉली ने बताया कि अध्ययन में डीपीवाईडी जीन के ऐसे वेरिएंट मिले जो 5-एफयू और कैपेसिटाबीन जैसी कीमोथेरेपी दवाओं से गंभीर दुष्प्रभाव का जोखिम बढ़ा सकते हैं। इससे उपचार शुरू करने से पहले डीपीवाईडी जीन परीक्षण की आवश्यकता पर जोर मिलता है।

शोधकर्ताओं ने कुल 97 कैंसर संवेदनशीलता जीनों का विश्लेषण किया और वैश्विक डेटाबेस से तुलना कर भारतीय आबादी से जुड़े विशिष्ट आनुवंशिक पैटर्न भी पहचाने। अध्ययन में भारत-विशिष्ट वेरिएंट की पहचान हुई।

शोध दल का कहना है कि भारत की विविध आबादी को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे जीनोमिक अध्ययन बढ़ाना जरूरी है, ताकि देश के अनुरूप कैंसर जांच और उपचार नीतियां विकसित की जा सकें।