प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
स्वास्थ्य

संकट के मुहाने पर पहुंची मानव पूंजी

विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट में खुलासा, भारत समेत निम्न व निम्न-मध्यम आय वाले देशों में वयस्कों की औसत लंबाई ठहरी या घटी, स्वास्थ्य, कौशल और ज्ञान पर आधारित मानव पूंजी पर गंभीर सवाल

Richard Mahapatra

भारत सहित कई देशों में वयस्काें का कद यानी लंबाई नहीं बढ़ रही है, बल्कि उनकी लंबाई कई दशकों से या तो स्थिर है या घट रही है। क्या यह चिंता की बात है? विकास के क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञ मानते हैं कि हां, ऐसा ही है। लंबाई केवल स्वास्थ्य का संकेतक नहीं है, बल्कि इसे समग्र विकास के पैमाने के रूप में भी देखा जा रहा है। यह स्थिति इसलिए चौंकाने वाली है क्योंकि आम धारणा रही है कि बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और खाने के चीजों की उपलब्धता में सुधार की वजह से इंसानों की लंबाई लगातार बढ़ रही है।

कद (लंबाई) अच्छे स्वास्थ्य और स्वस्थ विकास का एक स्पष्ट संकेत माना जाता है। विश्व बैंक समूह की ताजा रिपोर्ट “बिल्डिंग ह्यूमन कैपिटल- वेयर इट मैटर्स ” में यह बदलाव देखा गया है। इस रिपोर्ट में दुनिया के मानव पूंजी ( ह्यूमन कैपिटल ) की स्थिति का आकलन किया गया है, जिसे “लोगों का स्वास्थ्य, कौशल और ज्ञान” के रूप में परिभाषित किया गया है।

इस आकलन में स्वास्थ्य के साथ-साथ मानव पूंजी के अन्य दो घटकों कौशल और ज्ञान का भी विश्लेषण किया गया है, और इसके लिए वयस्कों की लंबाई को एक संकेतक के रूप में इस्तेमाल किया गया है।

मानव पूंजी का निर्माण बच्चे के जीवन के पहले पांच वर्षों से शुरू होता है। इस उम्र में स्वस्थ जीवन और सीखने की नींव रख जाती है। इसके बाद शिक्षा के जरिए लगभग 20 वर्ष की उम्र तक व्यक्ति में कौशल विकसित होते हैं। फिर करीब 25 वर्ष की उम्र तक वही कौशल उनके रोजगार में इस्तेमाल होने लगता है। इसी कौशाल से व्यक्ति अपने भविष्य के रोजगार का रास्ता तय करता है और अपने परिवार की जिम्मेदारियों के लिए तैयार होता है।

विश्व बैंक समूह के आकलन के अनुसार, “कई निम्न और मध्यम आय वाले देशों (भारत भी इसी समूह में है) में मानव पूंजी का विकास ठहर गया है।” रिपोर्ट बताती है कि गरीब देशों में आज मानव पूंजी का विकास पहले की दशकों की तुलना में और कमजोर हुआ है। अमीर और गरीब देशों के बीच जो बड़ा अंतर दिखाई देता है, उसका एक बड़ा कारण मानव पूंजी का स्तर है।

रिपोर्ट के मुताबिक, अलग-अलग देशों की आय में जो अंतर है, उसमें मानव पूंजी की बड़ी भूमिका है। सरल शब्दों में, अमीर और गरीब देशों के प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के बीच जो फर्क है, उसका लगभग दो-तिहाई हिस्सा मानव पूंजी के अंतर से जुड़ा है।

विश्व बैंक समूह के आकलन में स्वास्थ्य को मानव पूंजी का एक अहम पहलू बताया गया है। इसमें कहा गया है कि इस मामले में अमीर और गरीब देशों के बीच अंतर बहुत ज्यादा है और अगर यही स्थिति रही तो गरीब देशों में आगे चलकर मानव पूंजी के विकास पर नकारात्मक असर पड़ेगा।

औसत लंबाई में बदलाव को समझने के लिए रिपोर्ट में 1966 और 1996 में जन्मे वयस्कों की लंबाई की तुलना की गई है। इसमें पाया गया कि उच्च-मध्यम और उच्च आय वाले देशों में लोग लंबे हुए हैं, जबकि निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देशों में आज के वयस्क 30 साल पहले के मुकाबले छोटे हैं।

रिपोर्ट बताती है कि वयस्कों की औसत लंबाई, जो स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण संकेत मानी जाती है, पश्चिमी यूरोप में 20वीं सदी के दौरान हर दशक में लगभग 1 सेंटीमीटर बढ़ी और हाल के वर्षों में चीन में भी इसी गति से बढ़ी। लेकिन उप-सहारा अफ्रीका के कई देशों में आज के वयस्क 25 साल पहले के मुकाबले छोटे हैं, जो स्वास्थ्य में गिरावट का संकेत है।

रिपोर्ट के अनुसार, उप-सहारा अफ्रीका में 1996 में जन्मा एक वयस्क, 1966 में जन्मे वयस्क की तुलना में औसतन 3 सेंटीमीटर छोटा है।

भारत में भी 1966 और 1996 में जन्मे लोगों की औसत लंबाई लगभग समान रही है या थोड़ी घटी है। यह स्थिति कई निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देशों जैसी ही है।

2023 में विश्व बैंक समूह ने पहली बार यह आकलन किया कि कोविड-19 का मानव पूंजी पर क्या असर पड़ा। तब उसने कहा था, “ हो सकता है कि महामारी के कारण मानव पूंजी में स्पष्ट गिरावट आई है।” उस समय दुनिया में 20 साल से कम उम्र के करीब 2.6 अरब लोग थे, जो भविष्य के कार्यबल (वर्कफोर्स) बनने वाले हैं। यह वह उम्र होती है जब लोग अपने भविष्य की नींव तैयार कर रहे होते हैं। जैसे- स्कूल जाकर पढ़ाई करना, बीमारियों से बचाव के लिए टीकाकरण करवाना और रोजगार के लिए जरूरी कौशल सीखना।

तब से अब तक के दोनों आकलन बताते हैं कि दुनिया की कामकाजी आबादी में मानव पूंजी का बड़ा नुकसान हो रहा है।