यूरेनियम का नाम सुनते ही घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि सभी यूरेनियम एक ही तरह से खतरनाक नहीं होते हैं। यू-238 जो हमें ब्रेस्ट मिल्क में मिला है उसकी हाफ-लाइफ (यानी किसी रेडियोधर्मी पदार्थ के टूटने की दर को मापने का तरीका) बहुत कम है। इसका रेडियोएक्टिव एक्टिविटी बहुत कम है।
यह शोध अकादमिक था, जिससे आगे वृहद शोध का रास्ता तैयार हो। मदर मिल्क में यूरेनियम का होना अच्छा है या बुरा, यह अभी नहीं कहा जा सकता क्योंकि न ही डबल्यूएचओ का स्टैंडर्ड है और न ही बीआईएस का मानक या गाइडलाइन। इसलिए यह कहना कि ब्रेस्टमिल्क में पांच माइक्रोग्राम प्रति लीटर यूरेनियम 238 मिला है, इससे कैंसर हो जाएगा। यह उचित नहीं है। सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) के अध्ययन में बिहार और देश के कई राज्यों में पानी में यूरेनियम की मौजूदगी मिली है। यह जरूर है कि पानी के जरिए यह ब्रेस्ट मिल्क में पहुंच सकता है।
हालांकि, शरीर यूरिन के जरिए काफी मात्रा को रिलीज कर देता है लेकिन कुछ न कुछ शरीर में रीटेन हो जाता है जो अंततः ब्रेस्टमिल्क में चला जाता है। अब यहां सवाल है कि स्तनपान करने वाला शिशु इससे प्रभावित होगा या नहीं? मेरा मानना है कि यह मात्रा इतनी कम है और बच्चों की खुराक भी बहुत कम है तो वह अभी ऐसा कोई बड़ा प्रभाव नहीं डाल पाएगा। एक वयस्क आठ गिलास पानी पीता है जबकि शिशु आधा ग्लास तक दूध ही पिएगा।
इससे इनटेक काफी कम होगा। हमारे अकादमिक शोध से यह तो कन्फर्म हो गया है कि ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम मिल गया है। लेकिन अभी यूरेनियम की जो मात्रा ब्रेस्टमिल्क में मिली है, उससे कोई नतीजा निकालना और घबराना ठीक नहीं है। अंत में यह जरूर है कि सरकार समेत जो भी वैज्ञानिक इस पर काम कर रहे हैं उन्हें यह अब यह भी स्वीकार करना होगा कि वह देशव्यापी ब्रेस्टमिल्क की जांच करें।
(अशोक कुमार घोष, महावीर कैंसर संस्थान में रिसर्च हेड हैं)