भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ( कैग ) द्वारा वित्त वर्ष 2024-25 के लिए केंद्र सरकार के वित्त खातों पर हाल ही में जारी ऑडिट रिपोर्ट ने एक बार फिर केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान स्वास्थ्य उपकर ( हेल्थ सेस ) से प्राप्त 21,085 करोड़ रुपये में से केवल 14,439 करोड़ रुपये ही प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा निधि में स्थानांतरित किया गया है, जबकि 6,646 करोड़ रुपये की राशि ट्रांसफर नहीं की गई है।
इस संबंध में जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया ( जेएसएआई ) संस्था का कहना है कि वर्ष 2018-19 से 2024-25 के बीच केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य उपकर के रूप में कुल 96,627 करोड़ रुपये एकत्र किया है लेकिन इसमें से केवल 46,554 करोड़ रुपये ही सार्वजनिक खातों में स्थानांतरित किया गया है। इस प्रकार कुल 50,072 करोड़ रुपये की राशि यानी लगभग 52 प्रतिशत निर्धारित निधि में नहीं पहुंचाई गई है। संस्था ने मांग की है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण संसद में स्पष्ट करें कि स्वास्थ्य एवं शिक्षा उपकर लागू होने के बावजूद मार्च 2021 तक सार्वजनिक खातों में अलग लेखा शीर्ष ( एकाउंटिंग हेड ) क्यों नहीं बनाया गया तथा कैग की लगातार आपत्तियों के बावजूद संवैधानिक प्रावधानों का पालन क्यों नहीं किया गया।
कैग रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त मंत्रालय द्वारा स्वास्थ्य उपकर की पूरी राशि निर्धारित रिजर्व फंड में जमा नहीं की जा रही है। जब इस पर स्वास्थ्य मंत्रालय से जवाब मांगा गया तो मंत्रालय ने कहा कि उपकर संग्रहण और संबंधित निधियों में राशि स्थानांतरण की जिम्मेदारी वित्त मंत्रालय की है। हालांकि कैग ने स्पष्ट किया कि “शॉर्ट ट्रांसफर” पर अब तक कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला है। इस संबंध में जेएसएआई संस्था का कहना है कि जब निर्धारित निधियों को समेकित निधि में मिला दिया जाता है तो यह पता लगाना कठिन हो जाता है कि उन निधियों का वास्तव में उनके घोषित उद्देश्य के लिए उपयोग हो रहा है या नहीं। ध्यान रहे कि पारदर्शिता सार्वजनिक वित्तीय जवाबदेही की आवश्यक विशेषताओं में से एक है। यहां सवाल उठता है कि स्वास्थ्य उपकर से प्राप्त राशि का पूर्ण रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को सुदृढ़ करने में उपयोग हो भी रहा है या नहीं।
ध्यान रहे कि सरकार द्वारा एक ओर स्वास्थ्य उपकर के रूप में धन संग्रहित किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा मानव संसाधन, चिकित्सा शिक्षा तथा स्वास्थ्य पर स्वीकृत बजट का पर्याप्त उपयोग नहीं किया जा रहा है। कैग रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीन वर्षों में स्वास्थ्य मानव संसाधन, मेडिकल शिक्षा तथा प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर मिशन जैसी योजनाओं में हजारों करोड़ रुपये खर्च नहीं किए गया है।
ध्यान रहे कि रोकी गई 50,072 करोड़ रुपए की राशि भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में बुनियादी परिवर्तन ला सकती थी। इस राशि से देशभर में 100 से अधिक जिला अस्पतालों तथा 100 सरकारी मेडिकल कॉलेजों की स्थापना संभव थी। यही नहीं विशाल सार्वजनिक संसाधन प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों को भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों के अनुरूप उन्नत करने में भी उपयोग किया जा सकता था। इसके अतिरिक्त, इस राशि का उपयोग ग्रामीण, आदिवासी और अन्य उपेक्षित क्षेत्रों में लाखों डॉक्टर तथा अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की भर्ती और वेतन भुगतान के लिए किया जा सकता था, जहां बड़ी संख्या में रिक्त पद आज भी स्वास्थ्य सेवाओं की प्रभावित और कमजोर कर रहे हैं।
स्रोत: भारत के कैग की केंद्र सरकार के वित्त खातों पर ऑडिट रिपोर्ट से संकलित