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स्वास्थ्य

आवरण कथा: भारत में बीमारी की वजह से आत्महत्याओं में 45% बढ़ोतरी, पंजाब में सबसे अधिक मामले, क्यों आजिज आ रहे हैं लोग

भारत में हर साल 30 हजार से अधिक आत्महत्याएं बीमारियों की वजह से हो रही हैं। 2024 में बीमारियां प्रतिदिन 84 आत्महत्याओं की वजह बनीं। पंजाब में हर दूसरी आत्महत्या बीमारियों की देन है। ऐसे में सवाल उठता है कि आत्महत्या को उकसाने वाली आखिर कौन-सी बीमारियां हैं? इसके क्या कारण हैं? और यह कितना बड़ा स्वास्थ्य संकट है? ऐसे तमाम प्रश्नों के उत्तर टटोलती भागीरथ की रिपोर्ट

Bhagirath

गुरमीत सिंह के घर का दरवाजा 5 मई 2026 की रात खुला था। उनका छोटा बेटा जब देर रात ड्यूटी खत्म कर घर पहुंचा तो घर के अंदर 55 वर्षीय पिता और 48 वर्षीय मां नरेंदर कौर बेसुध पड़े थे। उन्होंने जहर खाकर आत्महत्या कर ली थी। उनके शव के पास ही जहर की शीशी पड़ी थी। नरेंदर कौर लंबे समय से गंभीर बीमारियों से जूझ रही थीं, जिस कारण गुरमीत मानसिक तनाव में थे। घर में मिले सुसाइड नोट में उन्होंने लिखा था कि वे अपनी जिंदगी से पूरी तरह टूट चुके हैं। उनके इस कदम के लिए परिवार का कोई सदस्य या रिश्तेदार जिम्मेदार नहीं है। उन्होंने पत्र में अपने बच्चों से माफी मांगते हुए यह भी लिखा कि उन्होंने गरीबी में जन्म लिया और गरीबी में इस दुनिया को छोड़कर जा रहे हैं।

मृतक दंपत्ति पंजाब के लुधियाना जिले के पमाल गांव में रहते थे। गांव के पंच खुशपाल सिंह ने डाउन टू अर्थ को बताया कि दंपत्ति का लोगों से मिलना-जुलना बहुत कम था। उनका बड़ा बेटा और बेटी कनाडा में रहते हैं और छोटा बेटा लुधियाना में ही एक अस्पताल में नौकरी करता है। खुशपाल के अनुसार, गुरमीत सिंह की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी। उन्होंने अपने खेत बेचकर बच्चों को कनाडा भेजा था और उनके पास रोजगार का कोई साधन नहीं था।

खुशपाल आगे बताते हैं कि किसी को कर्ज दिलाने में गुरमीत ने गारंटर की भूमिका निभाई थी। उसका 5-6 लाख रुपए का कर्ज गुरमीत को चुकाना पड़ा था। वहीं गुरमीत की पत्नी लंबे समय से मधुमेह से पीड़ित थी और उनकी नजर बहुत कमजोर हो गई थी। इन सब कारणों से गुरमीत परेशान रहते थे। शायद उन्हें लगा होगा कि मौत ही उन्हें कष्टों से मुक्ति दे सकती है, इसलिए उन्होंने जहर खाकर अपनी जिंदगी का अंत कर लिया। गुरमीत और उनकी पत्नी की आत्महत्या हर साल बीमारियों की वजह से होने वाली आत्महत्याओं की एक छोटी-सी बानगी भर है।

भारत में आत्महत्या से होने वाली दुखद मौतें बेहद सामान्य हैं। किसानों की आत्महत्या की खबरें अक्सर सुर्खियां बनती हैं लेकिन खेती-बाड़ी से जुड़ी मुश्किलों की तुलना में बीमारी के कारण आत्महत्या से कहीं ज्यादा लोगों की जान जाती है। मई में जारी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में पूरे देश में 10,546 किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की। इसके विपरीत, बीमारी के कारण 30,617 लोगों ने आत्महत्या की। एनसीआरबी की “भारत में आकस्मिक मौतें और आत्महत्याएं 2024” रिपोर्ट के अनुसार, इनमें मानसिक बीमारी के कारण 14,305 आत्महत्याएं और दीर्घकालिक बीमारी से जुड़ी 14,075 आत्महत्याएं शामिल हैं।

बीमारियों की वजह से आत्महत्या करने वालों में 30-45 आयु वर्ग के लोगों की संख्या सबसे अधिक है। 2024 में ही इस आयु वर्ग के 8,312 लोगों (6,088 पुरुष, 2,218 महिलाएं और 6 समलैंगिक) ने आत्महत्या की। इसके बाद 45-60 आयु वर्ग के 7,384 लोगों और 60 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के 6,359 लोगों ने बीमारियों की वजह से अपनी जिंदगी खत्म कर ली। 18 से 30 वर्ष से कम आयु वर्ग के 7,215 युवाओं ने बीमारियों के कारण मौत को गले लगा लिया। 18 वर्ष से कम आयु के 1,347 लोगों ने आत्महत्या की जिनमें अधिकांश संख्या लड़कियों की है। इस आयु वर्ग के अतिरिक्त अन्य सभी आयु वर्ग में आत्महत्या करने वाले अधिकांश पुरुष हैं।

भारत में बीमारियों की वजह से आत्महत्याओं का बढ़ता ट्रेंड कई सालों से लगातार देखा जा रहा है। डाउन टू अर्थ ने एनसीआरबी के 10 साल (2015-2024) के आंकड़ों का विश्लेषण किया और पाया कि बीमारी की वजह से होने वाली आत्महत्याओं में 2015 के मुकाबले 2024 में लगभग 45 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है (देखें, मौत की दहलीज,)।

देश में ऐसे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की संख्या भी बढ़ी है जहां बीमारी से जुड़ी आत्महत्याएं राष्ट्रीय औसत से अधिक हैं। 2015 में ऐसे 12 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश थे। 2024 तक यह संख्या बढ़कर 16 हो गई। लक्षद्वीप में यह हिस्सेदारी सबसे ज्यादा यानी 100 प्रतिशत थी, जहां दर्ज की गई तीनों आत्महत्याएं बीमारी की वजह से थीं। इसके बाद पंजाब का नंबर था, जहां 50.4 प्रतिशत यानी हर दूसरी आत्महत्या स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ी थी। सिक्किम में यह आंकड़ा 34.4 प्रतिशत था।

हालांकि ये आंकड़े भी समस्या की गंभीरता को कमतर ही दिखाते हैं। रिसर्चरों और हेल्थ एक्सपर्ट्स का लंबे समय से कहना है कि आत्महत्या के सरकारी आंकड़ों में कई मौतें छूट जाती हैं, खासकर ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में। अगर सभी मामलों को रिकॉर्ड किया जाता तो मरने वालों की असल संख्या काफी ज्यादा हो सकती थी। फरीदाबाद के अमृता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में साइकियाट्री विभाग के प्रमुख व वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ सोशल साइकियाट्री के अध्यक्ष राकेश चड्ढा डाउन टू अर्थ को बताते हैं, “एनसीआरबी का आंकड़ा आत्महत्याओं की असल तस्वीर पेश नहीं करता क्योंकि यह रिपोर्ट किए गए मामलों पर आधारित है।” वह 2010 की “मिलियन डेथ स्टडी” का जिक्र करते हैं, जिसमें पुरुषों में आत्महत्या की दर 1,00,000 में 26.3 और महिलाओं में 1,00,000 में 17.5 आंकी गई थी जो उस समय एनसीआरबी द्वारा बताई गई दरों से लगभग दोगुनी थी।

इसी तरह पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएचएफआई) के चांसलर के श्रीनाथ रेड्डी का भी मानना है, “बहुत संभावना है कि ये असल बोझ से कम आंकड़े हों। आत्महत्या की कई कोशिशें रिपोर्ट नहीं की जातीं। साथ ही जो आत्महत्याएं रिपोर्ट की जाती हैं, उनके कारण कुछ और बताए जा सकते हैं।”

पंजाब की हालत “गंभीर”

2024 की एनसीआरबी रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक, पंजाब में 2024 में कुल 2,229 लोगों ने आत्महत्याएं कीं और राज्य की आत्महत्या दर 7.2 प्रतिशत है जो राष्ट्रीय औसत 12.2 से कम है। इसका अर्थ यह है कि देश में एक लाख की आबादी पर जहां 12.2 लोगों ने आत्महत्या की वहीं पंजाब में यह आंकड़ा 7.2 है।

लेकिन अगर हम बीमारियों की वजह से होने वाली आत्महत्याओं के आंकड़ों पर नजर डालें तो पंजाब की स्थिति उलट जाती है। जहां देश में कुल आत्महत्याओं में 18 प्रतिशत आत्महत्याएं बीमारियों की वजह से हो रही हैं, वहीं पंजाब में यह आंकड़ा 50.4 प्रतिशत है। यानी राज्य में होने वाली हर दूसरी आत्महत्या बीमारियों की वजह से हो रही है। 2024 में राज्य में कुल आत्महत्याओं में से 1,123 आत्महत्याएं बीमारियों की वजह से हुईं।

इससे पहले 2023 में पंजाब में बीमारियों की वजह से आत्महत्या ही हिस्सेदारी 48.3 प्रतिशत (1,109 आत्महत्या), 2022 में 44.9 प्रतिशत (1,096 आत्महत्या), 2021 में 44.5 प्रतिशत (1,164 आत्महत्या), 2020 में 36.4 प्रतिशत (951 आत्महत्या), 2019 में 27.7 प्रतिशत (654 आत्महत्या), 2018 में 42.1 प्रतिशत (722 आत्महत्या), 2017 में 31.7 प्रतिशत (469 आत्महत्या), 2016 में 19.7 प्रतिशत (283 आत्महत्या) और 2015 में 23.5 प्रतिशत (246 आत्महत्या) रही। आंकड़े बताते हैं कि इन 10 वर्षों में पंजाब में बीमारियों की वजह से आत्महत्या की हिस्सेदारी दोगुने से अधिक बढ़ गई है।

पंजाब 2020 से 2024 तक बीमारियों की वजह से सर्वाधिक आत्महत्या की हिस्सेदारी वाले राज्यों में लगातार पहले स्थान पर बना हुआ है और इन पांच वर्षों में यह दर हर साल बढ़ी है। इससे पहले के कुछ वर्षों में भी यह राज्य बीमारियों के कारण होने वाली सर्वाधिक आत्महत्याओं की हिस्सेदारी वाले राज्यों की सूची में शामिल रहा है।

यह पैटर्न खास तौर पर औद्योगिक जिले लुधियाना में स्पष्ट तौर पर दिखता है। गुरमीत सिंह और उनकी पत्नी नरेंदर कौर इसी जिले के निवासी थे। 2024 में इस शहर में 320 लोगों ने आत्महत्या की, जिनमें से 230 लोगों ने बीमारी की वजह से आत्महत्या की। एनसीआरबी के मुताबिक, लुधियाना सर्वाधिक आत्महत्याओं वाले जिलों की सूची में शामिल है। यहां बेंगलुरु (469 आत्महत्या), चेन्नई (308 आत्महत्या) और सूरत (264 आत्महत्या) और दिल्ली (251 आत्महत्या) के बाद सर्वाधिक आत्महत्या बीमारियों के कारण हुई हैं।

मानसिक रोग बड़ी वजह

एनसीआरबी आंकड़ों के विश्लेषण से बीमारियों से जुड़ा एक चिंताजनक ट्रेंड सामने आता है। 2024 में पंजाब में बीमारी की वजह से हुई 1,123 आत्महत्याओं में से 1,066 मानसिक बीमारी, छह कैंसर से और 51 अन्य दीर्घकालिक (क्रोनिक) बीमारियों से जुड़ी थीं। दूसरे शब्दों में राज्य में बीमारी से संबंधित 95 प्रतिशत आत्महत्याएं मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के कारण थीं। पंजाब में आत्महत्या के हॉटस्पॉट लुधियाना में बीमारी से जुड़ीं 230 आत्महत्याओं में से 219 आत्महत्याओं की वजह मानसिक बीमारी थी।

बेंगलुरु के “मेंटल हेल्थ फर्स्ट इंडिया” के संस्थापक व पंजाब के वरिष्ठ मनोचिकित्सक जिमी अंगद सिंह का कहना है कि ये आंकड़े देश में और खासकर पंजाब में मानसिक स्वास्थ्य के छिपे हुए संकट की ओर इशारा करते हैं। उनका कहना है कि डिप्रेशन और दूसरी मानसिक बीमारियों का अक्सर पता नहीं चल पाता और उनका इलाज भी नहीं हो पाता।

जिमी अंगद सिंह पंजाब की स्थिति को बेहद गंभीर मानते हुए कहते हैं कि बीमारियों की वजह से हर दूसरी आत्महत्या का अर्थ है कि मौन और अदृश्य अवसाद (डिप्रेशन) का न तो निदान हो रहा है और न ही उस पर ध्यान दिया जा रहा है। यह स्थिति व्यवस्था की गहरी विफलता और चिंताजनक हालात को उजागर करती है। इसे केवल स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ा नहीं, बल्कि एक चिकित्सकीय संकट और सामाजिक-आर्थिक पतन के रूप में देखा जाना चाहिए (देखें, व्यवस्था की गहरी विफलता का नतीजा है मानसिक रोगियों की आत्महत्याएं,)।

पंजाब में कृषि संकट और स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। हरित क्रांति से उत्पन्न रसायन प्रधान कृषि मॉडल ने दूषित भूजल और गंभीर दीर्घकालिक बीमारियों, विशेष रूप से कैंसर की विरासत छोड़ी है। यही कारण है कि राज्य के कई क्षेत्रों को आम बोलचाल में कैंसर बेल्ट कहा जाता है। आत्महत्या को अक्सर आर्थिक विनाश से परिवार को बचाने के प्रयास के रूप में गलत समझा जाता है, लेकिन अधिकांश लोग इसके गहरे मनोवैज्ञानिक पहलू को नहीं देख पाते।

जिमी के अनुसार, यह स्थिति दर्शाती है कि हम केवल बीमारी से नहीं जूझ रहे हैं, बल्कि बीमारी के मनोवैज्ञानिक परिणामों के साक्षी बन रहे हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि बीमारियों की वजह से आत्महत्या की बढ़ती हिस्सेदारी पंजाब में पीड़ा के बदलते स्वरूप को दर्शाती है। हम अक्सर बीमारी को केवल चिकित्सकीय समस्या और आत्महत्या को केवल मनोवैज्ञानिक समस्या मानते हैं, जबकि वास्तव में दोनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।

राकेश चड्ढा डाउन टू अर्थ से हुई बातचीत में बताते हैं, “आत्महत्या के मामलों में अक्सर डिप्रेशन (अवसाद) एक मुख्य वजह होती है। यह डिप्रेशन या तो अपने आप में एक बीमारी हो सकती है या फिर किसी दूसरी मानसिक बीमारियों जैसे स्किजोफ्रेनिया, बाइपोलर डिसऑर्डर, शराब या ड्रग्स की लत, पर्सनैलिटी डिसऑर्डर या गंभीर शारीरिक बीमारी (जैसे कैंसर) के साथ एक लक्षण के तौर पर हो सकती है।” चड्ढा का यह भी कहना है कि आत्महत्या बहुत ज्यादा तनाव या निराशा की वजह से भी हो सकती है, खासकर तब जब जिंदगी के हालात की वजह से इंसान सारी उम्मीदें खो देता है। ऐसे मामलों में भी डिप्रेशन की भूमिका होती है। पंजाब जैसे समृद्ध राज्यों में बीमारियों की वजह से आत्महत्या की सबसे अधिक हिस्सेदारी की वजह पूछने पर चड्ढा जवाब देते हैं, “संपन्नता आत्महत्या से सुरक्षा नहीं देती। दक्षिण कोरिया, जापान और रूस जैसे खुशहाल देशों में दूसरों की तुलना में आत्महत्या की दर काफी ज्यादा है। इसलिए, बीमारियों के कारण पंजाब में आत्महत्या की हिस्सेदारी का सबसे ज्यादा होना कोई अनोखी बात नहीं है। भारत के दूसरे राज्यों की तुलना में पंजाब में ड्रग्स और शराब का इस्तेमाल बहुत ज्यादा है और यह आत्महत्या की ज्यादा दर का एक कारण हो सकता है।

पंजाब के तरणतारण में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता रणजीत सिंह भी चड्ढा की बातों से इत्तेफाक रखते हुए नशे को आत्महत्या और मानसिक रोगों की प्रमुख वजह मानते हैं। वह पंजाब में बीमारियों के तेजी से बढ़ने की वजह के तौर पर खेती में अत्यधिक रसायनों के उपयोग को जिम्मेदार ठहराते हैं और कहते हैं कि इनकी वजह से राज्य का भोजन और पानी बहुत खराब हो चुका है। बीमारियों से ग्रस्त लोग अक्सर महंगे इलाज से टूट जाते हैं और परिवार को कर्ज से बचाने के लिए अपनी जिंदगी का अंत कर लेते हैं।

के श्रीनाथ रेड्डी कहते हैं कि पंजाब में लंबे समय तक रहने वाली गैर-संचारी बीमारियों, शराब की लत और नशीली दवाओं के इस्तेमाल बहुत ज्यादा है। ये सभी आत्महत्या के जोखिम को बढ़ाते हैं। उनके अनुसार, शारीरिक बीमारी से लंबे समय तक परेशानी, काम छूटने या उत्पादकता कम होने, आय का नुकसान या इलाज पर होने वाले खर्च, परिवार के सदस्यों या देखभाल करने वालों पर निर्भरता, आजादी छिनने और उम्मीद खत्म होने की वजह से लंबे समय तक तनाव हो सकता है। इन चिंताओं से बचने की इच्छा या फिर परिवार के सदस्य की बीमारी के बुरे असर झेल रहे अपनों पर बोझ न बनने की चाहत से आत्महत्या का खयाल आ सकता है। वह आगे बताते हैं कि शारीरिक बीमारी न्यूरोएंडोक्राइन एक्सिस और गट-ब्रेन एक्सिस को बिगाड़ देती है, जिससे शरीर में सूजन बढ़ जाती है। कोर्टिसोल, एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन और थायरॉयड हार्मोन में बदलाव से डिप्रेशन हो सकता है और आत्महत्या की कोशिशें हो सकती हैं। इसके अलावा, इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाएं (जैसे ओपिओइड और कुछ तरह की एंटी-डिप्रेसेंट) आत्महत्या के विचारों को बढ़ावा दे सकती हैं। कोर्टिसोल, एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन और थायरॉयड हार्मोन में बदलाव से डिप्रेशन हो सकता है और आत्महत्या की कोशिशें हो सकती हैं।

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ साइकोलॉजी में 2024 में प्रकाशित अमन अग्रवाल, फहमीना बख्त के अध्ययन “ए थियारेटिकल पर्सपैक्टिव ऑन कमर्शलाइजेन इन एग्रीकल्चर साइकोलॉजिकल रिजीलिएंस एंड रूरल पंजाब इन इंडिया” में भी पाया गया है, “भारत का अन्न भंडार कहे जाने वाले पंजाब में पिछले कुछ दशकों में खेती-बाड़ी में बहुत बड़े बदलाव आए हैं, खासकर 1960 के दशक में हरित क्रांति के आने के बाद। हालांकि इस क्रांति से शुरुआत में खुशहाली आई, लेकिन साथ ही कई नई चुनौतियां भी खड़ी हो गईं। खेती के व्यवसायीकरण से कुछ लोगों का उत्पादन और आमदनी तो बढ़ी, लेकिन कई किसानों के लिए आर्थिक रूप से कमजोर होने, कर्ज में डूबने और तनाव का सामना करने जैसी समस्याएं भी पैदा हुईं।”

अध्ययन के अनुसार, बाजार की कीमतों में उतार-चढ़ाव, फसल खराब होने और कर्ज के बोझ से यह तनाव अक्सर बढ़ जाता है, जिससे उन लोगों के लिए खतरनाक स्थिति बन जाती है जो इन दबावों का सामना नहीं कर पाते। अध्ययन में पाया गया है कि पंजाब में किसानों की आत्महत्याओं की मुख्य वजहों में से एक है कर्ज का बोझ। ज्यादा ब्याज वाले लोन और दिखावे या फिजूलखर्ची वाले सामाजिक खर्चों की वजह से यह समस्या और गंभीर हो जाती है। किसानों में मानसिक स्वास्थ्य संकट की एक बड़ी वजह है लगातार तनाव, सामाजिक शर्म और समाज की उम्मीदों पर खरा न उतर पाने का मानसिक दबाव। आईसीएआर (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) के “नेशनल एग्रीकल्चरल साइंस फंड” के तहत पंजाब, तेलंगाना और महाराष्ट्र में की गई एक स्टडी में अवसाद को आत्महत्या की सोच का एक अहम कारण बताया गया है।

इंडियन जर्नल ऑफ सोशल सायकायट्री में 2020 में प्रकाशित अपने अध्ययन में अजीत सिदाना, साक्षी गुप्ता और रवीना सरोये ने चंडीगढ़ के ग्रामीण और शहरी इलाकों में सर्वेक्षण किया। उनका सर्वेक्षण कहता है, आत्महत्या की वजह आर्थिक परेशानियां (34 प्रतिशत), तनाव (33 प्रतिशत), डिप्रेशन (22 प्रतिशत), मानसिक बीमारी (21 प्रतिशत), पारिवारिक झगड़े (15 प्रतिशत) और बेरोजगारी (15 प्रतिशत) थीं।

जिमी कहते हैं कि पंजाब में अपनी जेब से स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च भारत में सबसे ज्यादा है। प्राइवेट हेल्थकेयर बहुत महंगा और शोषणकारी है। एक बड़ी बीमारी परिवार पर कर्ज का बोझ लगभग 40 प्रतिशत तक बढ़ा सकती है, जिससे कमजोर या गरीब परिवार तुरंत गरीबी रेखा से नीचे जा सकता है। जब किसी किसान या खेतिहर मजदूर को यह एहसास होता है कि जिंदा रहने के लिए उन्हें अपनी बची-खुची जमीन बेचनी पड़ेगी जो उनके बच्चों की पहचान और गुजारे का एकमात्र जरिया है तो वे आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं।

राष्ट्रीय प्रवृत्ति

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, दुनियाभर में हर साल 7.20 लाख आत्महत्याएं होती हैं। हर 40 सेकंड में दुनिया में कहीं न कहीं आत्महत्या होती है और कई प्रयास होते हैं। डब्ल्यूएचओ द्वारा 2014 में प्रकाशित रिपोर्ट “प्रिवेंटिंग सुसाइड: ए ग्लोबल इंपेरिटिव” के अनुसार, ज्यादा आय वाले देशों में आत्महत्या करने वाले 90 प्रतिशत लोगों में मानसिक विकार पाए जाते हैं और जिन 10 प्रतिशत लोगों में साफ तौर पर कोई बीमारी नहीं पता चल पाती, उनमें भी मानसिक लक्षण आत्महत्या करने वालों जैसे ही होते हैं। हालांकि, चीन और भारत के अध्ययनों से पता चलता है कि कुछ एशियाई देशों में आत्महत्या करने वालों में मानसिक विकार कम (लगभग 60 प्रतिशत) पाए जाते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, इस जोखिम को सावधानी से देखना चाहिए। आत्महत्या करने वाले या आत्महत्या की कोशिश करने वाले लोगों में एक साथ कई मानसिक बीमारियां हो सकती हैं। आत्महत्या से जुड़े सबसे आम विकार डिप्रेशन और शराब के सेवन से जुड़ी समस्याएं हैं। रिपोर्ट के अनुसार, एक साथ कई मानसिक बीमारियां होने पर आत्महत्या का जोखिम बढ़ जाता है। जिन लोगों को एक से ज्यादा मानसिक विकार होते हैं, उनमें जोखिम काफी ज्यादा होता है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, कई आत्महत्याएं संकट के क्षणों में अचानक हो जाती हैं, खासकर तब जब व्यक्ति आर्थिक समस्याओं, रिश्तों में झगड़े, लंबे समय से चला आ रहा दर्द और बीमारी से निपटने में असमर्थ हो जाता है।

मानसिक रोगों के कारण आत्महत्या की वैश्विक प्रवृत्ति भारत में भी दिखाई देती है। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, 2015 और 2024 के बीच बीमारियों के कारण 2,68,000 से ज्यादा लोगों ने आत्महत्या की। इनमें से 1,18,896 मामले मानसिक बीमारी से जुड़े थे। 2024 में प्रतिदिन 39 लोगों ने मानसिक रोगों के कारण आत्महत्या की। पिछले 10 वर्षों में कुल आत्महत्याओं में जहां 28 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, वहीं बीमारियों की वजह से होने वाली आत्महत्याएं 45 प्रतिशत बढ़ी हैं। कुल आत्महत्याओं में मानसिक रोगों का योगदान सबसे अधिक है। पिछले 10 वर्षों (2015-24) के बीच 1,18,896 लोगों ने मानसिक रोगों के कारण आत्महत्याएं की हैं। आंकड़े बताते हैं कि इन 10 वर्षों में मानसिक रोगों के कारण आत्महत्याओं में 70 प्रतिशत का उछाल आया है।

मानसिक रोगों के कारण आत्महत्या की प्रवृत्ति युवाओं में सबसे अधिक है। अकेले 2024 में 18-29 आयु वर्ग के 4,258 और 30-45 आयु वर्ग के 4,375 लोगों ने मानसिक रोगों के कारण आत्महत्या का फैसला किया। 45-60 आयु वर्ग में ऐसे लोगों की संख्या 3,008 और 60 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में 1,820 ने मानसिक रोगों के चलते आत्महत्या की। 18 वर्ष से कम आयु वर्ग में ऐसे 844 लोग थे, जिनमें सबसे बड़ी संख्या लड़कियों की थी। अन्य सभी आयु वर्ग में यह आंकड़ा पुरुषों का अधिक है।

अन्य दीर्घकालिक बीमारियां

आंकड़ों में मानसिक रोगों के बाद अन्य दीर्घकालिक बीमारियों की वजह से आत्महत्या की बढ़ती संख्या भी चिंताजनक पहलू के तौर पर सामने आती है। 2024 में 14,075 लोगों ने दीर्घकालिक बीमारियों के चलते अपनी जान दी है। 60 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लोगों में इन बीमारियों की वजह से आत्महत्या सबसे अधिक है। इस आयु वर्ग के 3,846 और 45 से 60 आयु वर्ग में 3,672 लोगों ने दीर्घकालिक बीमारियों वजह से जान दी। 2015 में 11,134 लोगों ने अन्य दीर्घकालिक बीमारियों की वजह से जान दी थी। दूसरे शब्दों में कहें तो पिछले 10 वर्षों में इन बीमारियों की वजह से आत्महत्या में करीब 26 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। के श्रीनाथ रेड्डी कहते हैं कि लंबे समय तक चलने वाली गंभीर या अपंग बनाने वाली बीमारियां, जैसे एडवांस्ड कैंसर, हार्ट फेलियर या क्रोनिक रीनल फेलियर, लकवा मारने वाला स्ट्रोक, समाज में स्टिग्मा या अकेलापन महसूस कराने वाली बीमारियां जैसे एचआईवी-एड्स और ऐसी बीमारियां जिनका इलाज बहुत महंगा होता है, किसी व्यक्ति को आत्महत्या की ओर ले जा सकती हैं। मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं आत्महत्या का एक बड़ा कारण हैं, जो अक्सर शारीरिक बीमारियों से जुड़ी होती हैं। जिन बुजुर्गों को देखभाल की जरूरत होती है और वे खुद को अकेला महसूस करते हैं, उनका जीवन से मोहभंग होने की संभावना होती है।

क्या गरीबी, इलाज का बढ़ता खर्च और हेल्थकेयर सेवाओं की खराब हालत भी इसके कारण हैं? इस प्रश्न के जवाब में रेड्डी कहते हैं कि ये सभी अकेले या एक साथ मिलकर, किसी व्यक्ति में आत्महत्या के विचार और कोशिश को बढ़ावा दे सकते हैं। ये चीजें इंसान को खाई के किनारे तक ले जाती हैं। सामाजिक सहारे की कमी और उम्मीद खो देने से इंसान गहरी निराशा की खाई में गिर सकता है। जिमी के अनुसार, एनसीआरबी के डेटा से यह तो साफ है कि आत्महत्याएं बढ़ रही हैं। लेकिन मानसिक बीमारियां शायद ही कभी किसी एक कारण से होती हैं। यह आमतौर पर बायोलॉजी, साइकोलॉजी और समाज के आपसी तालमेल का नतीजा होती हैं। यानी इसके कई पहलू होते हैं। वह बताते हैं, “मेरे क्लिनिकल अनुभव के अनुसार, सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है बीमारी का देर से पता चलना। डिप्रेशन को अक्सर कमजोरी समझ लिया जाता है। एंग्जायटी (चिंता) को सिर्फ ज्यादा सोचने की आदत मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। कई परिवार तब मदद मांगते हैं जब स्थिति काफी बिगड़ चुकी होती है या आत्महत्या की प्रवृत्ति दिखने लगती है। हालांकि सरकारी रिकॉर्ड में अक्सर इन मौतों को शारीरिक बीमारी की श्रेणी में रखा जाता है, लेकिन हमारी क्लिनिकल हकीकत यह दिखाती है कि पुरानी शारीरिक बीमारियां और गंभीर मानसिक समस्याएं आपस में गहराई से जुड़ी हुई हैं।”

बहुत कुछ किया जाना बाकी

निमहंस के नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे 2015-16 में पाया गया था कि भारत में 10.6 प्रतिशत वयस्क मानसिक विकारों से पीड़ित हैं। भारत में मानसिक विकारों की लाइफटाइम प्रीवलेंस 13.7 प्रतिशत है। राष्ट्रीय अध्ययनों से पता चलता है कि भारत की 15 प्रतिशत वयस्क आबादी को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिनके लिए इलाज या मदद की जरूरत होती है।

छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव स्थित सेंट्रल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेस के निदेशक व मनोचिकित्सक प्रमोद गुप्ता मानते हैं कि उपचार से संबंधित एक अन्य महत्वपूर्ण कारक जो आत्महत्या के जोखिम में योगदान देता है, वह है मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित उपलब्धता और पहुंच। निदान में देरी, अपर्याप्त उपचार और भारत में मानसिक विकारों के लिए लगभग 85 प्रतिशत अनुमानित उपचार-अंतर (ट्रीटमेंट गैप) के कारण कई व्यक्ति बिना उपचार के लक्षणों और मनोवैज्ञानिक तनाव से जूझते रहते हैं (देखें, एक गंभीर स्वास्थ्य संकट है मानसिक रोग में आत्महत्याएं,)।

दिल्ली स्थित मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान (इहबास) में वरिष्ठ मनोचिकित्सक ओम प्रकाश डाउन टू अर्थ को बताते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य रोगियों की पहचान और उनका पूरा इलाज बहुत जरूरी है। अधिकांश मामलों में देखा जाता है कि रोगी इलाज को अधूरा छोड़ देते हैं, जिससे समस्या और गंभीर हो जाती है। वह कहते हैं कि मानसिक रोगी दूर दराज के क्षेत्रों से जिला अस्पताल पहुंचते हैं जिससे उनका पूरा दिन व्यर्थ हो जाता है और दिहाड़ी भी मारी जाती है। ऐसे लोगों को नियमित रूप से अस्पताल तक जाने के लिए जरूरी है कि कम से कम उन्हें इतनी आर्थिक मदद दी जाए जिससे उनका दिहाड़ी और किराए की भरपाई हो सके। क्षयरोग (टीबी) के मरीजों की तर्ज पर मानसिक रोगियों को भी आर्थिक मदद दी जानी चाहिए।

जिमी के अनुसार, पंजाब और व्यापक रूप से भारत में मानसिक स्वास्थ्य के निदान और उपचार की वर्तमान संस्थागत व्यवस्था गंभीर रूप से अपर्याप्त है। स्थिति में सुधार लाने के लिए हमें इन संरचनात्मक कमियों की पहचान करनी होगी और लक्षित हस्तक्षेप लागू करने होंगे। उनका कहना है कि भारत ने जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम और राष्ट्रीय टेली-मानस स्वास्थ्य कार्यक्रम जैसी पहलों के माध्यम से महत्वपूर्ण प्रगति की है। फिर भी, सामान्य मानसिक विकारों के उपचार में अंतर (ट्रीटमेंट गैप) बहुत बड़ा है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में। वह मानते हैं कि मानसिक बीमारी न तो चरित्र की कमजोरी है और न ही केवल जैव-रासायनिक विकार। यह बायोलॉजी, व्यक्तिगत अनुभवों और सामाजिक वातावरण के परस्पर प्रभाव का परिणाम है। इसलिए प्रभावी रोकथाम के लिए केवल अस्पतालों में नहीं, बल्कि स्कूलों, कार्यस्थलों, परिवारों और समुदायों में भी हस्तक्षेप की आवश्यकता है।