दुनिया में लगभग 26 करोड़ लोग अस्थमा से प्रभावित हैं, हर साल लाखों मौतें होती हैं, जिससे यह गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य समस्या बनी हुई
भारत वैश्विक अस्थमा बोझ का करीब 13 प्रतिशत हिस्सा वहन करता है, जागरूकता और समय पर इलाज की कमी से स्थिति चिंताजनक बनी
विश्व स्तर पर हर साल लगभग 4.5 लाख लोगों की मौत अस्थमा से जुड़ी जटिलताओं के कारण होती है, जो रोकथाम योग्य मानी जाती
कुछ क्षेत्रों में 3 से 20 प्रतिशत बच्चे अस्थमा के लक्षणों से प्रभावित पाए गए हैं, शहरी प्रदूषण इसका प्रमुख कारण बन रहा
वर्ष 2023 में लगभग 36.3 करोड़ लोग अस्थमा से प्रभावित रहे, बेहतर उपचार और इनहेलर की पहुंच से मरीजों की स्थिति सुधर सकती
हर साल पांच मई को विश्व अस्थमा दिवस दिवस मनाया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, अस्थमा एक लंबे समय से चली आ रही फेफड़ों की बीमारी है, जो हर उम्र के लोगों को प्रभावित करती है। यह बीमारी सांस लेने में कठिनाई पैदा करती है और समय के साथ गंभीर रूप ले सकती है।
आज के समय में बढ़ते प्रदूषण, धूल और बदलती जीवनशैली के कारण भारत में अस्थमा के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय पर पहचान और सही उपचार मिल जाए, तो अस्थमा को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है।
क्या है अस्थमा और इसके लक्षण
अस्थमा फेफड़ों की वायु नलियों में सूजन और संकुचन के कारण होता है। जब किसी व्यक्ति को अस्थमा होता है, तो उसकी सांस की नलियां संवेदनशील हो जाती हैं। धूल, धुआं, परागकण, ठंडी हवा या संक्रमण जैसे कारकों के संपर्क में आने पर ये नलियां सूज जाती हैं और उनमें बलगम बनने लगता है। इससे सांस लेना कठिन हो जाता है।
इसके मुख्य लक्षणों में खांसी, सीटी जैसी आवाज के साथ सांस लेना (घरघराहट), सांस फूलना और सीने में जकड़न शामिल हैं। ये लक्षण कभी हल्के तो कभी गंभीर हो सकते हैं और समय-समय पर बढ़ते-घटते रहते हैं।
भारत में बढ़ता अस्थमा का खतरा
पूरी दुनिया में करोड़ों लोग अस्थमा से प्रभावित हैं। आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में लगभग 26 करोड़ लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं और हर साल लाखों लोगों की मौत इससे जुड़ी जटिलताओं के कारण होती है। भारत अकेले ही वैश्विक अस्थमा के लगभग 13 प्रतिशत मामलों का हिस्सा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, साल 2023 में अस्थमा से दुनिया में लगभग 36.3 करोड़ लोग प्रभावित हुए और इसके कारण 4,42,000 लोगों की मृत्यु हुई।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में अस्थमा से होने वाली मौतों की संख्या कई अन्य देशों की तुलना में अधिक है। इसका मुख्य कारण बीमारी के बारे में जागरूकता की कमी, देर से इलाज और सही तरीके से उपचार न लेना है।
इस साल विश्व अस्थमा दिवस की थीम ‘अस्थमा से पीड़ित हर व्यक्ति के लिए एंटी-इंफ्लेमेटरी इनहेलर तक पहुंच: अब भी एक अत्यंत आवश्यक जरूरत’ है।
बच्चों में बढ़ती समस्या
अस्थमा का असर बच्चों पर भी तेजी से बढ़ रहा है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि कुछ इलाकों में तीन से 20 प्रतिशत बच्चे अस्थमा के लक्षणों से प्रभावित हैं। शहरों में रहने वाले बच्चों में यह समस्या अधिक देखी जा रही है। इसका कारण वायु प्रदूषण, ट्रैफिक का धुआं, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल और खराब होती हवा की गुणवत्ता है।
इनहेलर को लेकर गलतफहमियां
अस्थमा के इलाज में इनहेलर सबसे प्रभावी और सुरक्षित तरीका माना जाता है। इसके बावजूद भारत में इनहेलर को लेकर कई तरह की गलत धारणाएं हैं। कई लोग इसे आदत बनाने वाला या गंभीर बीमारी का संकेत मानते हैं, जो पूरी तरह गलत है।
डॉक्टरों के अनुसार, इनहेलर सीधे फेफड़ों तक दवा पहुंचाते हैं और इससे दवा का असर जल्दी होता है। यह अस्थमा के दौरे को रोकने और लक्षणों को नियंत्रित करने में बहुत मददगार होते हैं।
जागरूकता और समय पर इलाज जरूरी
हर साल विश्व अस्थमा दिवस के अवसर पर लोगों को इस बीमारी के बारे में जागरूक किया जाता है। इस साल का विषय है कि हर अस्थमा मरीज तक एंटी-इंफ्लेमेटरी इनहेलर की पहुंच सुनिश्चित की जाए। विशेषज्ञों का कहना है कि सही समय पर जांच, नियमित दवा और डॉक्टर की सलाह का पालन करने से मरीज सामान्य जीवन जी सकता है।
अस्थमा एक गंभीर लेकिन नियंत्रित की जा सकने वाली बीमारी है। इसके प्रति जागरूकता बढ़ाना, समय पर इलाज शुरू करना और सही दवाओं का उपयोग करना बेहद जरूरी है। यदि लोग इनहेलर से जुड़ी गलतफहमियों को दूर करें और डॉक्टर की सलाह लें, तो अस्थमा से होने वाले खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सही जानकारी और सावधानी के साथ अस्थमा के मरीज भी एक स्वस्थ और सक्रिय जीवन जी सकते हैं।