फाइल फोटो : विकास चौधरी/सीएसई 
राजकाज

ग्रामीण क्षेत्रों का शहरीकरण: कितना सही-कितना गलत

केंद्रीय वित्त आयोग ने ग्रामीण क्षेत्रों के शहरीकरण को प्रोत्साहित करने की सिफारिश की है

Raju Sajwan

16वें वित्त आयोग ने अधिक ग्रामीण क्षेत्रों को शहरी दायरे में शामिल करने के लिए प्रोत्साहन देने की सिफारिश की है। इसके तहत 2026 से 2030 की अवधि के लिए 10,000 करोड़ रुपए का ‘शहरीकरण प्रोत्साहन’ प्रावधान किया गया है।

इसके अलावा प्रति व्यक्ति एकमुश्त पात्रता राशि 2,000 रुपए तय की गई है, जो 2011 की जनगणना के आधार पर होगी। यह राशि उन राज्यों को दी जाएगी जो उपनगरीय गांवों को कम से कम एक लाख आबादी वाले निकटवर्ती बड़े शहरी निकायों में शामिल करेंगे। साथ ही, उन्हें उस क्षेत्र को ग्रामीण से शहरी स्वरूप में बदलने के लिए उपयुक्त नीतियां भी बनानी होंगी। आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि शहरीकरण आर्थिक विकास को गति देता है। शहरों में भौतिक और मानव संसाधन, बुनियादी ढांचा, आर्थिक गतिविधियां और रोजगार के अवसर एक ही स्थान पर उपलब्ध होते हैं।

हालांकि ये सिफारिशें ऐसे समय आई हैं जब कई राज्यों में ग्रामीण पंचायतें इस तरह के बदलावों का विरोध कर रही हैं। उनका तर्क है कि शहरी क्षेत्र में शामिल होने के बाद वे ग्रामीण क्षेत्रों के लिए बनी कई योजनाओं और विशेष सुविधाओं से वंचित हो जाती हैं।

वित्त आयोग ने शहरी विकास को बढ़ावा देने के लिए दो अहम बातों पर जोर दिया है। पहला, शहरों में समुचित जल-निकासी व्यवस्था विकसित करना। दूसरा, जो ग्रामीण क्षेत्र व्यवहार में शहरी हो चुके हैं, उन्हें समय पर शहरी निकाय का कानूनी दर्जा देना। आयोग का कहना है कि इन दोनों में देरी होने से अव्यवस्थित विकास होता है।

बुनियादी ढांचा कमजोर रहता है और नागरिकों को ठीक से सेवाएं नहीं मिल पातीं। रिपोर्ट में कहा गया है, “समग्र उत्पादकता के नजरिए से देखें तो 2023-24 में 46 प्रतिशत कार्यबल कृषि क्षेत्र में लगा हुआ था, जबकि मौजूदा कीमतों पर कृषि का योगदान कुल मूल्य संवर्धन में केवल 17.8 प्रतिशत था। इसके मुकाबले उद्योग और सेवा क्षेत्रों में प्रति श्रमिक औसत मूल्य संवर्धन, कृषि की तुलना में लगभग 3.9 गुना अधिक है। इसलिए यदि श्रमिक ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर जाएं और कृषि से निकलकर उद्योग और सेवाओं में काम करें तो प्रति श्रमिक कुल मूल्य संवर्धन बढ़ाने की काफी संभावनाएं हैं।”

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन, दिल्ली के प्रोफेसर वी. एन. आलोक कहते हैं कि शहरीकरण को बढ़ावा देना और प्रवासी आबादी की अव्यवस्थित बस्तियों की समस्या से निपटना एक स्वागतयोग्य कदम है। उनके अनुसार, इस मुद्दे पर हिमाचल प्रदेश और तमिलनाडु के छठे राज्य वित्त आयोगों की रिपोर्टों में गंभीर विचार-विमर्श हुआ है। इसी तरह तमिलनाडु, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल के पांचवें राज्य वित्त आयोगों ने भी इस विषय पर विस्तार से चर्चा की है।

सिफारिशें ऐसे समय में आई हैं, जब कई पंचायतें इस तरह के बदलावों का विरोध कर रही हैं। तर्क है कि इससेे उन्हें मिलने वाली सुविधाएं खत्म हो जाएंगी

लेकिन पूर्व केंद्रीय पंचायती राज सचिव एस. एम. विजयानंद का कहना है कि यह दृष्टिकोण पूरी तरह सही नहीं है। उनके अनुसार, बेहतर होगा कि परि-शहरी क्षेत्रों का विकास भीतर की ओर किया जाए, ताकि लोगों को शहरों की ओर भागने की जरूरत न पड़े और शहरों पर अतिरिक्त दबाव न बढ़े।

दिल्ली स्थित गैर-लाभकारी संस्था प्रोफेशनल असिस्टेंस फॉर डेवलपमेंट एक्शन (प्रदान) के कार्यकारी निदेशक सरोज कुमार महापात्र का कहना है कि यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि शहरीकरण प्रोत्साहन के कारण कृषि प्रधान और दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों से ध्यान या संसाधन अनजाने में न हट जाएं। ये क्षेत्र अब भी जल सुरक्षा, आजीविका और बुनियादी सेवाओं की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। उनके अनुसार, ग्रामीण विकास के नजरिए से शहरीकरण प्रोत्साहन की रूपरेखा ऐसी होनी चाहिए जो क्षेत्रीय विविधताओं को समझे और उसे इस तरह लागू किया जाए कि वह ग्रामीण विकास में हो रहे मूल निवेश का पूरक बने, प्रतिस्पर्धी नहीं।