सारांश
इस साल शुरुआती चार महीनों में राज्य के 22 में से 14 जिलों में लिंगानुपात 900 से नीचे है। चरखी दादरी में यह सबसे कम 768 है। यहां 1,691 बच्चों ने जन्म लिया जिनमें 957 लड़के और 734 लड़कियां थीं।
जानकार एसआरबी में इस गिरावट का सीधे कन्या भ्रूण हत्या से जोड़ते हैं। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का मानना है कि राज्य के लोगों द्वारा लिंग जांच और कन्या भ्रूण हत्या हो रही है
गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम (पीसी-पीएनडीटी) कानून के तहत सजा बहुत मुश्किल है। इस कारण लिंग जांच से जुड़े लोगों में भय कम रहता है। ऐसे लोग आदतन ऑफेंडर बन जाते हैं।
110 वर्षों में हरियाणा के लिंगानुपात में महज 12 अंकों का ही सुधार हुआ। आजादी के बाद हुई पहली जनगणना और 2011 की आखिरी जनगणना के बीच में यह सुधार महज 8 अंकों का है।
हरियाणा एक बार भी फिर अपने लिंगानुपात में गिरावट के कारण चर्चा में है। जनवरी से अप्रैल 2026 के शुरुआत चार महीनों में जन्म के समय लिंगानुपात (एसआरबी) 895 पर आ गया है यानी 1,000 लड़कों के अनुपात में केवल 895 लड़कियों का ही जन्म हुआ।
2025 के अंत में राज्य का लिंगानुपात 923 था। अफसरों ने इसके लिए लिंग जांच पर सख्ती और कानून के बेहतर क्रियान्वयन को श्रेय दिया था। इससे पहले 2019 में राज्य का लिंगानुपात 923 पर पहुंचा था लेकिन अन्य वर्षों में इसमें गिरावट देखी गई।
2026 के शुरुआत चार महीनों में लिंगानुपात में 2025 के मुकाबले 28 अंकों की गिरावट को झटके के तौर पर देखा जा रहा है। शायद यही कारण है कि आंकड़ों के सामने आने के बाद राज्य सरकार ने चार वरिष्ठ स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को निलंबित और अन्य आठ को कारण बताओ नोटिस जारी किया है।
इस साल शुरुआती चार महीनों में राज्य के 22 में से 14 जिलों में लिंगानुपात 900 से नीचे है। चरखी दादरी में यह सबसे कम 768 है। यहां कुल 1,691 बच्चों ने जन्म लिया जिनमें 957 लड़के और 734 लड़कियां थीं।
जानकार एसआरबी में इस गिरावट का सीधे कन्या भ्रूण हत्या से जोड़ते हैं। खुद स्वास्थ्य विभाग से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि राज्य के लोगों द्वारा लिंग जांच और कन्या भ्रूण हत्या हो रही है। उनका यह भी कहना है कि लिंग जांच की संभावना सख्ती के कारण राज्य में बेहद मुश्किल है लेकिन यह काम हरियाणा से सटे राज्यों- उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान में चोरी छुपे खूब हो रहा है।
स्वास्थ्य विभाग में पीसी-पीएनडीटी अधिकारी के रूप में तैनात रहे एक डॉक्टर ने डाउन टू अर्थ को बताया कि एसआरबी में गिरावट के कई कारण बताते हैं। वह कहते हैं कि अक्सर विभाग में लोग बदलते रहते हैं और उनमें को-ऑर्डिनेशन की कमी रहती है।
उनका यह भी कहना है कि गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम (पीसी-पीएनडीटी) कानून के तहत सजा बहुत मुश्किल है। इस कारण लिंग जांच से जुड़े लोगों में भय कम रहता है। वे हर जांच के 50-60 रुपए लेते हैं और कुछ सालों में ही कई लाख रुपए कमा लेते हैं। दो तीन साल में एक बार पकड़े जाने पर भी उनका ज्यादा कुछ नहीं बिगड़ता। महज 40-50 हजार रुपए वकील पर खर्च कर वह बाहर आ जाते हैं।
अधिकारी का कहना है कि ऐसे लोग आदतन ऑफेंडर बन जाते हैं। ये लोग जिन राज्यों में लिंग जांच का अवैध काम करते हैं, वहां कानून के प्रति अधिक जागरुकता नहीं है।
अधिकारी का कहना है कि “हम अक्सर जब हम दूसरे राज्यों में रेड मारने जाते हैं तो हमें स्थानीय सहयोग भी नहीं मिलता। कई बार हमें लगता है कि आखिर वे क्यों आ गए।”
वह कहते हैं कि हरियाणा का स्वास्थ्य विभाग इस कानून के बेहतर पालन के लिए पूरी मुस्तैदी के साथ काम कर रहा है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से 1,200 से अधिक मुकदमे दर्ज किए गए हैं, लेकिन राज्य के लोगों की मानसिकता में बदलाव नहीं आया है।
लड़कों की चाहत कन्या भ्रूण हत्या की सबसे बड़ी वजह है। यह वह भी कहते हैं कि राज्य की आर्थिक संपन्नता से लोगों के पास पैसा है, इसलिए वे भ्रूण का लिंग जांच कराने में 50-60 रुपए आसानी से खर्च कर देते हैं।
अधिकारी कहते हैं कि राज्य के पंचकूला और मेवात का लिंगानुपात सबसे बेहतर रहता है। पंचकूला सबसे विकसित जिला है और मेवात में सबसे अधिक गरीबी है। इन दोनों राज्यों से लिंग जांच और भ्रूण हत्या न के बराबर है लेकिन अन्य जिलों में ऐसी स्थिति नहीं है। वह यह भी कहते हैं कि बढ़ती महंगाई को देखते हुए अधिकांश दंपत्ति एकल संतान को प्राथमिकता देते हैं।
बहुत से दंपत्ति ऐसे भी हैं जो पहली संतान लकड़ा होने पर दूसरी संतान नहीं करते। ऐसे भी लोग बड़ी संख्या में हैं जो पहली संतान लड़की होने पर हर साल में दूसरी संतान लड़का ही चाहते हैं। उनका कहना है कि हालिया समय में यह प्रवृत्ति भी देखी गई है कि दंपत्ति एक ही संतान करना चाहते हैं और उन्हें लड़का ही चाहिए। ऐसे लोग अक्सर मोटी रकम खर्च लिंग जांच कराने से गुरेज नहीं करते।
रोहतक जिले में बाल अधिकारों पर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता सुभाष चंदर कहते हैं कि हरियाणा में वारिश लड़के को ही माना जाता है। लोगों को लगता है कि लड़की शादी करके चली जाएगी और उस पर खर्च भी करना होगा। इस कारण भी लोगों में लड़कियों की चाहत कम होती है। लिंगानुपात में गिरावट के कारण हरियाणा में अक्सर लड़कों को शादी के लिए लड़कियां नहीं मिलतीं। बहुत से परिवार दूसरे राज्यों से शादी कर लड़कियां ला रहे हैं। इसके लिए वे मोटा पैसा भी खर्च करते हैं।
पुराना दाग
हरियाणा अपने कम लिंगानुपात के लिए दशकों से बदनाम रहा है। हरियाणा के डायरेक्टोरेट ऑफ सेंसस ऑपरेशन के अनुसार, करीब सवा सौ साल पहले 1901 की जनगणना में हरियाणा का लिंगानुपात 867 था, जबकि भारत का लिंगानुपात 972 था।
1901 से अब तक हुई किसी भी जनगणना में हरियाणा का लिंगानुपात 900 नहीं पहुंचा। 2011 की जनगणना का आंकड़ा (879 लिंगानुपात) पिछले 110 वर्षों का सबसे बेहतर आंकड़ा है। जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि 110 वर्षों में हरियाणा के लिंगानुपात में महज 12 अंकों का ही सुधार हुआ। आजादी के बाद हुई पहली जनगणना और 2011 की आखिरी जनगणना के बीच में यह सुधार महज 8 अंकों का है।
हरियाणा की इस परिपाटी को बदलने के लिए 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना शुरू की थी। योजना के कुछ वर्षों में बेहतर नतीजे दिखाई दिए।
2015 में राज्य का लिंगानुपात 876 था जो 2019 में 923 पहुंच गया था। इसके बाद गिरावट का दौर हुआ था जो 2024 तक जारी रहा। हालांकि 2025 में यह 2019 के स्तर पर पहुंच गया लेकिन अब फिर इसमें तेज गिरावट हुई है।
हरियाणा के एक अधिकारी नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताते हैं कि साल के शुरुआती 5-6 महीनों में कुल जन्म कम होते हैं और लिंगानुपात कम रहने की प्रवृत्ति देखी जाती है लेकिन बाद के महीनों में इसमें सुधार होता है। उनका यह भी कहना है कि स्वास्थ्य विभाग के बहुत से अफसरों की मानसिकता भी लड़कों का चाहत रखने वाले लोगों की तरह है।
अधिकारी आगे कहते हैं कि उनकी दो लड़कियां हैं। उनकी पत्नी को अक्सर महिलाएं लड़का न होने पर ताने मारती हैं। वह कहते हैं कि राज्य ने भले ही आर्थिक उन्नति कर ली हो लेकिन वह राज्य के लोगों को "पढ़ा-लिखा-अनपढ़" मानते हैं।