मधुसूदन बंडी 
राजकाज

समरस या असहमति का मौन?

निर्विरोध चुनावों को अतिरिक्त ग्रांट देने का चलन कई राज्यों में फैल चुका है, लेकिन सवाल यह है कि यह कदम कितना लोकतांत्रिक है

Madhusudan Bandi

4 जुलाई, 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार गुजरात में इस साल हुए 4,564 ग्राम पंचायतों के चुनावों में से 761 ग्राम पंचायत “समरस” घोषित की गईं। इनमें से 56 पूर्णतः महिला ग्राम पंचायत थीं। समरस वे गांव/ग्राम पंचायतें हैं जहां सरपंच और सभी वार्ड सदस्य निर्विरोध (बिना किसी औपचारिक विरोध) चुने जाते हैं। आंध्र प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और तेलंगाना जैसे राज्यों ने भी अपनी-अपनी पंचायती व्यवस्थाओं में सर्वसम्मति आधारित चुनाव/चयन के अलग-अलग मॉडल आजमाए हैं। यह प्रक्रिया गांव में ग्राम सभा जैसी बैठक बुलाकर शुरू होती है, जहां सरपंच, उप-सरपंच और वार्ड सदस्यों के नामों पर सहमति बनाई जाती है। अन्य नामांकन दाखिल होने से रोकने के प्रयास किए जाते हैं।

इसके बाद अधिकारी समरस पंचायत की औपचारिक घोषणा करते हैं। तब वह ग्राम पंचायत जल निकासी, स्वास्थ्य केंद्र, सड़क, विद्यालय तथा जलापूर्ति से जुड़े विकास कार्यों के लिए वित्तीय प्रोत्साहन (आर्थिक लाभ) पाने की पात्र हो जाती है। गुजरात में राज्य समर्थित ‘समरस’ मॉडल को 2001-02 में इसलिए लागू किया गया था कि गांव में सौहार्द और सद्भाव को बढ़ावा दिया जा सके तथा विवाद-मुक्त गांवों को प्रोत्साहित किया जा सके। हालांकि आंकड़ों के मुताबिक 2001-02, 2006-07, 2011-12, 2016-17 और 2021-22 में कुल पंचायत चुनावों के मुकाबले समरस पंचायतों की हिस्सेदारी क्रमशः 21.44 प्रतिशत, 21.66 प्रतिशत, 16.94 प्रतिशत, 11.86 प्रतिशत और 10.51 प्रतिशत रहा, जो गिरावट दर्शाता है। वहीं पूर्णत: महिला समरस पंचायतों के लिए प्रोत्साहन भी असरदार नहीं रहे। अब तक औसतन सिर्फ 6.86 प्रतिशत ने महिला नेतृत्व चुना। यह दर्शाता है कि महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी के महत्व पर जागरूक करना जरूरी है।

वहीं यह समझना महत्वपूर्ण हो जाता है कि राज्य द्वारा वित्तीय प्रोत्साहनों के माध्यम से सर्वसम्मति आधारित चुनावों को सक्रिय रूप से बढ़ावा देना क्या लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रभावित करता है। खासकर तब, जब गुप्त मतपत्र के माध्यम से प्रतिनिधियों का चयन करना लोकतंत्र का सार माना जाता है। राज्य में समरस के बढ़ते चलन ने इसके गुण-दोषों पर बहस छेड़ दी है। समर्थकों का तर्क है कि यह योजना न केवल गांवों में शांति बनाए रखने में मदद करती है बल्कि चुनाव व्यय बचाने में भी सहायक है। आलोचक कहते हैं कि लोकतांत्रिक प्रणाली में व्यक्तिगत मताधिकार मूलभूत है और इसे बनाए रखने के लिए कोई भी खर्च ज्यादा नहीं माना जा सकता। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, ग्राम पंचायत चुनाव पर सरकार का खर्च उम्मीदवारों के निजी खर्च से कम होता है। दिलचस्प है कि कुछ समरस पंचायतों में प्रत्याशियों ने स्वीकार किया कि उन्होंने उतना ही धन खर्च किया, जितना सामान्य पंचायतों में होता है। यह धन प्रायः ग्रामीणों को खुश रखने और नामांकन रोकने में लगा। कुछ समरस पंचायतों में आरोप लगे कि प्रभावशाली लोगों ने निर्णय थोपे। सामान्य चुनाव वाले गांवों में भी माहौल बिगड़ा; कुछ को “गद्दार” कहकर अनुदान न मिलने का दोषी ठहराया गया। यह दर्शाता है कि सरकारी प्रलोभन अन्य कारणों पर भारी हैं। नतीजतन, समरस हो या न हो, गांवों में कलह बनी रही और यह तब तक जारी रहेगी, जब तक समरस विकल्प और पंचायतों पर बहस जारी है। कुछ पंचायतों में समरस नहीं हो पाया, लेकिन वही उम्मीदवार बाद में चुनाव जीत गए, जिससे लगा चुनाव बेकार थे। पर मतों का मामूली फर्क दिखाता है कि लोगों ने गुप्त मतदान में खुलकर अपनी पसंद बताई।

मेरे अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि समरस मॉडल में लोगों को चुनाव लड़ने से रोका जाता है। गांव के बुज़ुर्ग, जो अक्सर जमींदार होते हैं, बैठक करके सरपंच और वार्ड सदस्यों के नाम तय कर देते हैं। अध्ययन में पाई गई समरस पंचायतें या तो सामाजिक एकजुटता के लिए जानी गईं या फिर कुछ परिवारों के दबदबे के लिए। ऐसी व्यवस्था गांव में अनुशासन और विकास लाती है, पर 73वें संविधान संशोधन में तय लोकतांत्रिक भागीदारी को कमजोर करती है, जिसमें गुप्त मतदान और प्रतिस्पर्धी चुनाव जरूरी हैं। असली समस्या यह है कि लोग चुने गए उम्मीदवारों का मजबूरी में समर्थन दिखाते हैं और कई बार बहुसंख्यक होते हुए भी कमजोर वर्गों को प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने विवाद-मुक्त गांव की सोच से इसे बढ़ावा दिया था, लेकिन उन्हें मानना होगा कि लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों से समझौता सही हल नहीं है। आखिर उनके कई बड़े नेता स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों से ही ऊपर आए हैं।

(लेखक गुजरात इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च, अहमदाबाद के फैकल्टी सदस्य हैं)