मझगाय और रुंझ बांध सहित केन-बेतवा लिंक परियोजना और ललितपुर-सिंगरौली रेल मार्ग से प्रभावित आदिवासी किसानों के विस्थापन, मुआवजे और पुनर्वास से जुड़े सवालों के साथ पन्ना में शुरू हुआ चिता आंदोलन आज दसवें दिन और तेज हो गया। चिता सत्याग्रह के साथ अब फांसी सत्याग्रह और मिट्टी सत्याग्रह भी शुरू कर दिया गया है। आंदोलनकारी सुबह से देर रात तक धरना, प्रदर्शन और सत्याग्रह कर रहे हैं।
आंदोलनकारियों में शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार आक्रोश बढ़ रहा है। विस्थापितों और आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने कहा कि जब गांवों में पानी बढ़ रहा है और लोगों के घर डूबने की स्थिति में हैं, तब भी प्रशासन के पास विस्थापित परिवारों की स्पष्ट सूची, प्रत्येक परिवार को मिलने वाले मुआवजे और लंबित मुआवजे का पारदर्शी लेखा-जोखा उपलब्ध नहीं है।
अमित भटनागर ने आरोप लगाया, “जब शासन-प्रशासन अपने ही बनाए कानूनों का पालन नहीं करता, तब लोकतंत्र और संविधान दोनों कमजोर होते हैं। महाभारत में दुशासन ने जिस तरह द्रौपदी का चीरहरण किया था, उसी तरह आज प्रशासन लोकतंत्र का चीरहरण कर रहा है।”
उन्होंने कहा कि आंदोलन का उद्देश्य विकास रोकना नहीं, बल्कि कानून के अनुसार न्यायपूर्ण विस्थापन, उचित मुआवजा, पुनर्वास और पर्यावरण की रक्षा सुनिश्चित कराना है।
मझगाय और रुंझ बांध प्रभावितों का कहना है कि मुख्यमंत्री द्वारा घोषित 12.50 लाख रुपए के पैकेज के बावजूद अनेक परिवारों को अब तक पूरी राशि नहीं मिली है। आंदोलनकारियों के अनुसार, घोषणा को दो महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी भुगतान की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई, जबकि दूसरी ओर प्रभावितों के मकान तोड़ने और डूब क्षेत्र में पानी बढ़ने की स्थिति लगातार बनी हुई है।
अमित भटनागर ने कहा, “जब तक परिवार को उसका पूरा अधिकार और मुआवजा नहीं दिया गया, तब तक उसके घर को उजाड़ना किस कानून और इंसानियत के तहत उचित है? मकान तोड़ने के लिए बड़ी संख्या में पुलिस और अधिकारी पहुंच जाते हैं, लेकिन लोगों की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के समय केवल आश्वासन दिए जाते हैं। क्या सिर्फ बातों से जनता का पेट भर जाएगा?”
ललितपुर-सिंगरौली रेलमार्ग से प्रभावित सबदुआ गांव के भूरा पटेल ने बताया कि रेलवे स्टेशन के निर्माण के लिए उनकी जमीन अधिग्रहित की जा रही है। उनके अनुसार राजस्व रिकॉर्ड में जमीन सिंचित दर्ज है तथा वहां कुआं, ट्यूबवेल, पेड़ और मकान मौजूद हैं, लेकिन इन परिसंपत्तियों का मुआवजा नहीं दिया गया।
भूरा पटेल के अनुसार, उनकी लगभग 2 बीघा जमीन का भी उचित मूल्यांकन नहीं किया गया। कुआं, ट्यूबवेल, पेड़ और मकान का मुआवजा नहीं दिया जा रहा है जिसके कारण उनका पूरा परिवार मानसिक तनाव में है और उनकी माता और पिता बीमार होकर बिस्तर पर पड़े हुए हैं। ललितपुर सिंगरौली रेल मार्ग प्रभावितों का आरोप है कि उनके गांव की सभी जमीन सिंचित है जिसे अधिकारियों ने घूस के चक्कर में असंचित कर दिया है।
उन्होंने कहा कि आपत्ति दर्ज कराने के लिए निर्धारित तारीख पर संबंधित अधिकारी उपलब्ध नहीं थे और अब परिवार लगातार कार्यालयों के चक्कर लगा रहा है।
मझगाय बांध प्रभावित लंगड़ी आदिवासी ने बताया कि उनके परिवार के बेटे-बेटी के नाम भी मुआवजा प्रक्रिया में नहीं जोड़े गए और उन्हें केवल 5 लाख रुपए की राशि मिली है। उनके मकान का मुआवजा भी अब तक नहीं मिला है, जबकि घर के आसपास पानी लगातार बढ़ रहा है।
उन्होंने बताया कि लगातार तनाव के कारण वह कई दिनों से बीमार हैं और प्रशासन को दिए गए अनेक आवेदनों के बावजूद समस्या का समाधान नहीं हुआ। आंदोलन स्थल पर मझगाय, कुंवरपुर, वनहरीकला-टपरिया सहित अन्य प्रभावित क्षेत्रों के लोगों ने अपने दस्तावेज और पूर्व में दिए गए आवेदनों की प्रतियां दिखाते हुए कहा कि वे लगातार अपनी समस्याओं के निराकरण की मांग कर रहे हैं।
आंदोलनकारियों का आरोप है कि समस्याओं का समाधान करने के बजाय प्रशासन आंदोलन स्थल पर बिजली और पानी की सुविधाएं प्रभावित कर रहा है तथा आंदोलनकारियों को शांति भंग के नोटिस दिए जा रहे हैं। आंदोलनकारियों ने अब आंदोलन स्थल पर अपनी टपरियां तैयार कर ली हैं और राशन सहित आवश्यक सामग्री एकत्रित कर लंबे संघर्ष की तैयारी शुरू कर दी है।
अमित भटनागर ने कहा कि यह लड़ाई केवल मुआवजा और पुनर्वास तक सीमित नहीं है। यह जल-जंगल-जमीन, केन नदी, पन्ना टाइगर रिजर्व, संविधान और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की लड़ाई है। उन्होंने कहा कि केन-बेतवा लिंक परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर भी गंभीर सवाल हैं। आंदोलनकारियों के अनुसार, परियोजना से बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई, केन नदी और पन्ना टाइगर रिजर्व के पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव तथा आदिवासी गांवों के विस्थापन के मुद्दे लगातार उठाए जा रहे हैं।
आंदोलनकारियों का कहना है कि केन-बेतवा लिंक परियोजना के अंतर्गत आने वाले आदिवासी गांवों में कई परिवारों को उचित सूचना, मुआवजा और पुनर्वास के बिना विस्थापन का सामना करना पड़ा है। उनका आरोप है कि वन संरक्षण कानून, पुनर्वास संबंधी कानूनों तथा ग्राम सभा की भूमिका से जुड़े कानूनी प्रावधानों का भी कई मामलों में पालन नहीं किया गया। इन्हीं मुद्दों को लेकर पिछले कई वर्षों से प्रभावित ग्रामीण आंदोलन कर रहे हैं।
अमित भटनागर ने कहा कि यदि शासन-प्रशासन ने तत्काल प्रभावितों की समस्याओं का समाधान नहीं किया और आंदोलन को दबाने के प्रयास जारी रहे तो देशभर के सामाजिक कार्यकर्ताओं, किसान संगठनों, आदिवासी संगठनों और लोकतांत्रिक आंदोलनों से संपर्क कर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक आंदोलन खड़ा किया जाएगा।