फाइल ; फोटो: आईस्टॉक 
राजकाज

इलाज और भोजन पर खर्च हो रही है पेंशन, लोगों ने कहा- सरकार बढ़ाए अपनी हिस्सेदारी

राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के तहत मिल रही पेंशन राशि में 2012 से कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। मंत्रालय द्वारा कराए गए अध्ययन में महंगाई के हिसाब से पेंशन बढ़ाने की सिफारिश की गई है

Raju Sajwan

केंद्र व राज्य सरकारों की ओर से बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों को दी जा रही सामाजिक पेंशन का बड़ा हिस्सा भोजन और इलाज पर ही खर्च हो रहा है, लेकिन बढ़ती महंगाई के बीच यह राशि बेहद अपर्याप्त साबित हो रही है। 

राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम पर हुई एक अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि 65 फीसदी लोग पेंशन से मिली राशि को बीमारियों के इलाज पर खर्च कर रहे हैं, जबकि 63 प्रतिशत लाभार्थियों ने माना कि पेंशन मिलने से भोजन तक उनकी पहुंच बेहतर हुई। 

रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र सरकार ने 2012 के बाद से पेंशन राशि में कोई बढ़ोतरी नहीं की है, जबकि अधिकांश लाभार्थियों के लिए यही पेंशन जीवनयापन का सबसे बड़ा सहारा बनी हुई है। 

संविधान के अनुच्छेद 41 के तहत कमजोर और जरूरतमंद नागरिकों को सामाजिक सहायता देने की जिम्मेदारी के तहत केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एनएसएपी) की शुरुआत 1995 में गरीब बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों को सामाजिक सुरक्षा देने के उद्देश्य से की थी। शुरुआत में यह पूरी तरह केंद्र प्रायोजित योजना थी, लेकिन समय के साथ कई राज्य सरकारों ने इसमें अपनी तरफ से अतिरिक्त राशि यानी “टॉप-अप” जोड़कर पेंशन का दायरा और राशि बढ़ाई। 

रिपोर्ट के अनुसार केंद्र की एनएसएपी योजनाओं से जहां करीब तीन करोड़ लोगों को लाभ मिल रहा है, वहीं राज्यों की अतिरिक्त योजनाओं के जरिए लगभग 5.87 करोड़ और लोगों को पेंशन सहायता दी जा रही है। इस तरह देशभर में केंद्र और राज्य योजनाओं को मिलाकर सामाजिक पेंशन पाने वाले लोगों की संख्या करीब नौ करोड़ तक पहुंच गई है।

राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों ने 2017 से 2021 के बीच, यानी चार वर्षों में, सामाजिक पेंशन योजनाओं में अतिरिक्त “टॉप-अप” और अपनी राज्य स्तरीय योजनाओं पर 1.09 लाख करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए, जबकि केंद्र सरकार द्वारा इसी अवधि में 34,432 करोड़ रुपए खर्च किए।

इस कार्यक्रम का संचालन केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय करता है। मंत्रालय ने दिल्ली स्थित ‘अकादमी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज’ को सर्वे करने को कहा, ताकि योजना के प्रभाव, पारदर्शिता और जमीनी क्रियान्वयन का आकलन किया जा सके। संस्था ने 10 राज्यों की 600 ग्राम पंचायतों में 6,000 लाभार्थियों का सर्वे कर योजना के प्रभाव, क्रियान्वयन और कमियों का आकलन किया। 

दवा व खाने पर खर्च 

मंत्रालय को सौंपी गई संस्था की रिपोर्ट में कहा गया है कि पेंशन का सबसे बड़ा हिस्सा भोजन और इलाज पर खर्च होता है। 63 प्रतिशत लाभार्थियों ने माना कि पेंशन मिलने से भोजन तक उनकी पहुंच बेहतर हुई, जबकि 65 प्रतिशत लोगों ने कहा कि इससे इलाज और स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करना संभव हो पाया। 68 प्रतिशत लाभार्थियों ने बताया कि वे अब जरूरी घरेलू और व्यक्तिगत सामान खरीद पा रहे हैं।

इसके अलावा 75.1 प्रतिशत लाभार्थियों ने कहा कि पेंशन मिलने से परिवार के अन्य कमाने वाले सदस्यों पर उनकी निर्भरता कम हुई है, जबकि 16.5 प्रतिशत लोगों ने माना कि उनकी आर्थिक निर्भरता में काफी कमी आई। करीब 67 से 68 प्रतिशत लोगों ने यह भी कहा कि पेंशन मिलने से परिवार और समाज में उनका सम्मान बढ़ा है तथा आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान की भावना मजबूत हुई है। 

हालांकि राज्यवार स्थिति में भी बड़ा अंतर देखने को मिला। जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना और तमिलनाडु में 70 से 90 प्रतिशत लाभार्थियों ने कहा कि पेंशन से उनके भोजन, इलाज और दैनिक जरूरतों की स्थिति में स्पष्ट सुधार आया है। आंध्र प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में, जहां सरकारें अतिरिक्त “टॉप-अप” पेंशन देती हैं, वहां लाभार्थियों ने बताया कि पेंशन से घरेलू खर्च चलाने और दवा खरीदने में अधिक मदद मिलती है।

बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे कम आय वाले राज्यों में अधिकांश लाभार्थियों ने कहा कि पूरी पेंशन भोजन और दवा में ही खर्च हो जाती है और बचत की कोई संभावना नहीं रहती। गुजरात में कुछ लाभार्थियों ने थोड़ी बहुत बचत होने की बात कही, जो वहां अपेक्षाकृत अधिक राज्य सहायता से जुड़ी मानी गई। 6,000 लाभार्थियों में से केवल 969 लोगों ने बताया कि वे पेंशन से कुछ राशि बचाने में सक्षम हैं, जबकि 83.9 प्रतिशत लोगों ने साफ कहा कि वे कोई बचत नहीं कर पाते।

पर्याप्त नहीं है पेंशन 

अध्ययन में अधिकांश लाभार्थियों ने माना कि वर्तमान पेंशन राशि भोजन, इलाज, बिजली-पानी और अन्य जरूरी खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। करीब 89 प्रतिशत लाभार्थियों का कहना था कि सरकार को पेंशन राशि बढ़ाने और इससे जुड़ी सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए अधिक धन उपलब्ध कराना चाहिए।

रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि जिन राज्यों में राज्य सरकारें अतिरिक्त टॉप-अप राशि देती हैं, जैसे आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु, वहां लाभार्थियों में संतोष और जीवन स्तर अपेक्षाकृत बेहतर है। इसके विपरीत असम, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे कम टॉप-अप वाले राज्यों में लाभार्थियों की परेशानियां अधिक देखी गईं।

वर्तमान में राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के तहत इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना के तहत 60 से 79 वर्ष की आयु के बुजुर्गों को 200 रुपए प्रतिमाह और 80 वर्ष से अधिक आयु वालों को 500 रुपए प्रतिमाह दिए जाते हैं।

विधवा पेंशन योजना और दिव्यांग पेंशन योजना के तहत 300 रुपए प्रतिमाह तथा 80 वर्ष से अधिक आयु होने पर 500 रुपए प्रतिमाह सहायता मिलती है। इसके अलावा राष्ट्रीय पारिवारिक लाभ योजना के तहत परिवार के कमाने वाले सदस्य की मृत्यु होने पर 20 हजार रुपए की एकमुश्त सहायता दी जाती है।

केंद्र सरकार की मूल पेंशन राशि के ऊपर राज्यों द्वारा अलग-अलग “टॉप-अप” दिया जा रहा है।

हरियाणा में बुजुर्गों को लगभग 3,000 रुपए प्रतिमाह तक पेंशन मिल रही है। तेलंगाना की “आसरा” योजना के तहत बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों को करीब 2,000 से 4,000 रुपए तक सहायता दी जा रही है। आंध्र प्रदेश की “एनटीआर भरोसा” योजना में भी पेंशन राशि 2,750 रुपए या उससे अधिक है। तमिलनाडु में राज्य सरकार केंद्र की राशि जोड़कर करीब 1,000 रुपए प्रतिमाह देती है।

गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार और असम जैसे राज्यों में अतिरिक्त सहायता अपेक्षाकृत कम है। कई राज्यों में कुल पेंशन राशि 500 से 1,000 रुपए प्रतिमाह के बीच ही सीमित है।

नेशनल फ्लोर पेंशन लागू करने की सिफारिश 

रिपोर्ट में योजना को जारी रखने की जोरदार सिफारिश करते हुए कहा गया है कि देश की तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद केंद्र सरकार की पेंशन राशि वर्ष 2012 से लगभग अपरिवर्तित बनी हुई है। इसलिए “नेशनल फ्लोर पेंशन” लागू कर पेंशन राशि को महंगाई सूचकांक से जोड़ा जाना चाहिए, ताकि समय-समय पर राशि बढ़ाकर लाभार्थियों को सम्मानजनक जीवन दिया जा सके। “नेशनल फ्लोर पेंशन” का मतलब ऐसी न्यूनतम पेंशन राशि तय करना है, जिसके नीचे देश के किसी भी राज्य में सामाजिक पेंशन न दी जाए। 

रिपोर्ट में कहा गया है कि महंगाई और बढ़ती जीवन-यापन लागत के कारण इसकी वास्तविक कीमत लगातार घटती गई है, जिससे गरीब बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों की जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं। 

रिपोर्ट में योजना के क्रियान्वयन को बेहतर बनाने के लिए कई अहम सुझाव दिए गए हैं। इसमें कहा गया है कि गरीबी रेखा सूची के बजाय आधार, सोशल रजिस्ट्री और राज्यों की फैमिली आईडी जैसी सत्यापित डिजिटल प्रणालियों पर आधारित नई पहचान व्यवस्था अपनाई जानी चाहिए, ताकि पात्र लोगों की सही पहचान हो सके और फर्जी या दोहराव वाले लाभार्थियों को रोका जा सके। गांव और वार्ड स्तर पर सुविधा केंद्र बनाने की सिफारिश भी की गई है, जहां बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों को पंजीकरण, दस्तावेज और शिकायत निवारण में मदद मिल सके। 

अलग-अलग राज्य, अलग-अलग पात्रता 

नियम के मुताबिक गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को पेंशन देने का प्रावधान है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर गरीबी रेखा न होने के कारण अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग आय सीमा तय की गई है। 

असम और बिहार में वार्षिक आय सीमा 27 हजार रुपए से कम रखी गई है। छत्तीसगढ़ में यह सीमा 24 हजार रुपए सालाना है। गुजरात में बीपीएल सूची के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में परिवार की वार्षिक आय एक लाख रुपए और शहरी क्षेत्रों में 1.20 लाख रुपए से कम होना जरूरी है। उत्तर प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए आय सीमा 46,080 रुपए और शहरी क्षेत्रों के लिए 56,460 रुपए सालाना तय की गई है।

हरियाणा में वार्षिक आय सीमा तीन लाख रुपए से कम रखी गई है। आंध्र प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए आय सीमा एक लाख रुपए और शहरी क्षेत्रों के लिए 1.20 लाख रुपए सालाना निर्धारित है। तेलंगाना में ग्रामीण परिवारों की वार्षिक आय 1.50 लाख रुपए और शहरी परिवारों की दो लाख रुपए से कम होनी चाहिए। तमिलनाडु में आय सीमा 60 हजार रुपए सालाना तय है, जबकि जम्मू-कश्मीर में बीपीएल सूची और त्रैमासिक आय सर्वे के आधार पर पात्रता तय की जाती है तथा वार्षिक आय सीमा 1.20 लाख रुपए रखी गई है।

50 हजार रुपए से कम कमाते हैं लोग 

इस अध्ययन में राज्यों के बीच आय वितरण में बड़ा अंतर देखने को मिला। बिहार में 80.5 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में 74.5 प्रतिशत परिवारों की वार्षिक आय 50 हजार रुपए से कम पाई गई, जो इन राज्यों में अत्यधिक आर्थिक कमजोरी को दर्शाता है। गुजरात (67.7 प्रतिशत), तेलंगाना (59.5 प्रतिशत), तमिलनाडु (57.7 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (54 प्रतिशत) और हरियाणा (53.5 प्रतिशत) में भी आधे से अधिक परिवार इसी आय वर्ग में शामिल रहे। वहीं छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक 54.8 प्रतिशत परिवारों की आय 50 हजार से एक लाख रुपए के बीच दर्ज की गई।

रिपोर्ट में जम्मू-कश्मीर की स्थिति अन्य राज्यों से अलग दिखाई दी, जहां 92.3 प्रतिशत परिवारों की वार्षिक आय एक लाख से तीन लाख रुपए के बीच रही और 4.7 प्रतिशत परिवार तीन लाख से छह लाख रुपए आय वर्ग में पाए गए। असम में भी 40.5 प्रतिशत परिवार एक लाख से तीन लाख रुपए आय वर्ग में शामिल रहे। अध्ययन के अनुसार राज्यों के बीच यह आय असमानता बताती है कि कम आय वाले परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा और पेंशन योजनाएं आज भी जीवनयापन का महत्वपूर्ण सहारा बनी हुई हैं।

कमीशनखोरी के शिकार हुए लाभार्थी 

रिपोर्ट में पेंशन स्वीकृति और शुरू कराने की प्रक्रिया में भ्रष्टाचार और बिचौलियों की भूमिका को लेकर भी गंभीर संकेत मिले हैं। अध्ययन के दौरान 162 लाभार्थियों ने बताया कि उन्हें पेंशन मंजूर कराने या शुरू करवाने के लिए सरकारी कर्मचारियों अथवा बिचौलियों को अतिरिक्त पैसे देने पड़े। इनमें से 46 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्होंने किसी एजेंट या बिचौलिये को भुगतान किया। ऐसे लाभार्थियों द्वारा दी गई औसत अतिरिक्त राशि करीब 1400 रुपए थी, हालांकि अलग-अलग राज्यों में इसमें काफी अंतर देखा गया। तमिलनाडु जैसे राज्यों में कुछ लाभार्थियों ने पांच हजार रुपए तक देने की बात कही।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कई जगह अनौपचारिक व्यवस्था के तहत लाभार्थियों से शुरुआती छह महीने की पूरी पेंशन या फिर एक साल तक हर महीने मिलने वाली पेंशन का करीब 10 प्रतिशत हिस्सा बिचौलियों को देना पड़ता है। अध्ययन ने इसे गरीब लाभार्थियों के हितों के खिलाफ गंभीर अनियमितता बताते हुए कहा है कि ऐसी धोखाधड़ी और भ्रष्ट प्रथाओं पर संबंधित अधिकारियों को सख्ती से रोक लगानी चाहिए।