लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाला “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” 16 अप्रैल 2026 से देशभर में लागू हो गया। हालांकि यह कानून 2023 में पास हो गया था जिसे करीब दो साल बाद विधि मंत्रालय द्वारा अधिसूचित कर दिया गया। हालांकि महिला आरक्षण कानून और परिसीमन से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक 17 अप्रैल को वोटिंग के बाद गिर गया।
लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का मुद्दा दशकों पुराना है। तमाम बहसों और आरक्षण के समर्थन के बावजूद वर्तमान 18वीं लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी 14 प्रतिशत ही है। मौजूदा लोकसभा में 75 निर्वाचित महिलाएं सांसद हैं जो पिछली 17वीं लोकसभा में निर्वाचित 78 महिला सांसदों के मुकाबले कम ही हैं।
भारत की राजनीतिक व्यवस्था में महिलाओं की हिस्सेदारी बेहद कम और धीमी गति से बढ़ी है। “परफॉर्मिंग रिप्रजेंटेशन, विमिन मेंबर इन इंडियन पॉर्लियामेंट” किताब के लेखक सिरीन एम रॉय और कैरोल स्पारी ने 1957 से 15 चुनावों के आधार पर अनुमान लगाया गया था कि लोकसभा में महिलाओं की 33 प्रतिशत उपस्थिति में 55 साल और लगेंगे। यानी करीब 11 आम चुनावों के बाद यह स्थिति बनेगी।
वैश्विक औसत से आधी भी नहीं है महिलाओं की हिस्सेदारी
जनवरी 2019 में प्रकाशित इस किताब में लेखकों ने लिखा है कि भारत के निचले सदन (लोकसभा) में केवल 11 प्रतिशत महिलाएं हैं जबकि वैश्विक औसत 23.6 प्रतिशत और क्षेत्रीय (एशिया) औसत 19.7 प्रतिशत है। यह संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व वाले इंटर पार्लियामेंट्री यूनियंस लीग टेबल में भारत को 193 में से 145वीं रैंक पर खड़ा करता है।
किताब के अनुसार, अगर पहली लोकसभा से 16वीं लोकसभा तक चुनी गईं सभी 333 महिलाओं को भी जोड़ दिया जाए तो भी एक पूरी लोकसभा भी नहीं भर पाएगी। यह संसद में पुरुषों के वर्चस्व का प्रतीक है। 1957 से अब तक लोकसभा में महिलाओं की संख्या दहाई के अंक से आगे नहीं बढ़ी है। पहली लोकसभा में 22 महिला सांसद थीं जो 2024 में 75 तक ही पहुंच पाई।
शासन में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने का अगर वास्तव में कहीं सार्थक और गंभीर प्रयास हुए हैं तो वे पंचायतें हैं। देशभर की 21 राज्यों में पंचायती राज संस्थाओं (पीआरआई) में 33 प्रतिशत के बजाय महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। यही वजह है कि पीआरआई में 14.5 लाख निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं जो कुल निर्वाचित प्रतिनिधियों का 46 प्रतिशत है।
ऐसे में अगर महिला शक्ति और शासन में उनके कामकाज को आंकना हो तो पंचायतों का प्रतिनिधित्व कर रही महिलाओं के कामकाज पर नजर डालनी जरूरी हैं। यह भी देखना चाहिए है कि जब महिलाएं निर्णायक भूमिका में होती हैं तो प्राथमिकताएं कैसे बदलती हैं और शासन में किस प्रकार के बदलाव आते हैं।
बदलती हैं प्राथमिकताएं
ओडिशा के केंदुझर जिले के जातरा गांव की सरपंच जशोदा देहुरी डाउन टू अर्थ को बताती हैं कि जब महिलाएं सरपंच बनती हैं, तो शासन की प्राथमिकताएं अक्सर सामान्य इंफ्रास्ट्रक्चर केंद्रित विकास से हटकर जरूरतों पर आधारित, समावेशी और कल्याण-उन्मुख योजना की ओर मुड़ जाती हैं, खासकर उन रोजमर्रा की चुनौतियों को हल करने पर जो परिवारों को झेलनी पड़ती हैं।
जसोदा देहुरी के अनुसार, पुरुष शायद नदियों जैसी बुनियादी चीजों की उपलब्धता को ही काफी मान लें, लेकिन महिलाएं जिन पर पानी लाने की जिम्मेदारी होती है, इस काम के असली बोझ को समझती हैं। इसी वजह से उन्होंने पीने के पानी की उपलब्धता को प्राथमिकता दी। उन्होंने पांच ट्यूबवेल लगवाए और “हर घर जल” जैसी पहलों पर जोर दिया।
वह आगे बताती हैं, “पुरुष प्रतिनिधि शायद स्कूली इंफ्रास्ट्रक्चर को ही काफी मान लें, वहीं महिला असल नतीजों पर ध्यान देती हैं। बच्चों के स्कूल छोड़ने की समस्या को पहचानते हुए उन्होंने हाजिरी पर लगातार नजर रखकर यह पक्का किया कि उनकी पंचायत में कोई भी बच्चा स्कूल न छोड़े।”
उनका यह भी कहना है कि महिला प्रतिनिधि अक्सर महिलाओं के लिए रोजगार के मौकों को भी प्राथमिकता देती हैं, क्योंकि वे समझती हैं कि अगर पैसा महिलाओं के हाथों में हो, तो घर के अंदर की सत्ता-समीकरण बदल सकती है। “गंधमर्धन अपैरल” नाम से एक सिलाई और ट्रेनिंग यूनिट शुरू करने की उनकी पहल इसी सोच को दिखाती है।
शासन के मामले में महिला प्रतिनिधि अक्सर ज्यादा पारदर्शिता और जवाबदेही लाती हैं। खुद भी आर्थिक तंगी झेल चुकी होने के कारण वे भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती हैं। जसोदा देहुरी ने आवास योजनाओं में रिश्वतखोरी के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया और यह सुनिश्चित किया कि गरीब परिवारों पर कोई अतिरिक्त बोझ न पड़े। वह मानती हैं कि महिलाओं का नेतृत्व शासन को ज्यादा संवेदनशील, निष्पक्ष और जमीनी हकीकतों के प्रति ज्यादा जवाबदेह बनाकर उसे और मजबूत बनाता है।
पंचायत की बेहतर योजनाएं बनाती हैं महिलाएं
महिलाओं के साथ काम रहीं फाउंडेशन फॉर ईकोलॉजिकल सिक्योरिटी की प्रोग्राम निदेशक स्वप्ना सारंगी अपने करीब 25 वर्षों के अनुभव के आधार पर कहती हैं कि शुरुआत में हम गांवों में जब पौधे लगाने की बात करते थे, तक पुरुष उन प्रजातियों के नाम लेते थे जो बाजार उन्मुख थे, जैसे टीक और बांस आदि। उनकी समझ बाजार से जुड़ी थी, उन्हें पौधों से आर्थिक लाभ लेना था।
उनके अनुसार, जब हमने महिलाओं से ऐसे पौधों की जानकारी मांगी तो उनके पास ऐसे करीब 50-60 पौधों की लिस्ट थी। ये ऐसे पेड़ थे जिनके पत्ते, फल, फूल, छाल सभी उपयोगी थे। वह बताती हैं कि जब महिलाएं निर्णय लेने वाली भूमिका में आती हैं तो उनकी समझ ज्यादा बेहतर होती है। वनाधिकार कानून (एफआरए) के तहत जहां-जहां लोगों को अधिकार मिले है, वहां की अधिकांश समितियों में महिलाएं अध्यक्ष हैं, जो उनकी सक्रियता के कारण है।
स्वप्ना के अनुसार, पंचायत स्तर पर जहां-जहां महिलाएं अपनी भूमिका को बेहतर तरीके से समझकर काम कर रही हैं, वहां पंचायत की योजनाएं बेहतर बनी हैं। वहां व्यवस्था में आमूलचूल सुधार भी हुआ है। वह बताती हैं कि जब पंचायत में तालाब बनाने का फैसला होता था तब अक्सर पुरुषों का अहम आड़े आता था। वह अपने कस्बे के पास तालाब बनाना चाहते थे। उन्होंने यह नहीं देखा कि जहां पानी है, वहां तालाब बनना चाहिए। इसमें जब महिलाओं की भागीदारी हुई तो उन्होंने वहां तालाब बनाने की योजना बनाई जहां पानी है। उन्होंने ऐसी जगह चिन्ह्त की जहां महिलाओं, पशुओं और बच्चों को पानी उपलब्ध हो।
वह बताती हैं कि पुरुष प्रधान पंचायतों में कंक्रीट के कामों पर अधिक जोर दिया जाता है, जैसे बिल्डिंग, रोड, सामुदायिक हॉल जैसे काम जिनमें अधिक पैसा खर्च होता है। जबकि महिलाओं ने छोटे-छोटे कामों को प्राथमिकता दी। वह करोड़ों के बजट वाले बड़े कामों के बजाय छोटे-छोटे बजट वाले ज्यादा से ज्यादा काम करवाना अधिक पसंद करती हैं।
स्वप्ना सारंगी कहती हैं कि पंचायत में महिलाएं स्कूल में शौचालय, आंगनवाड़ी में बेहतर व्यवस्था अधिक तवज्जो देती हैं। उनकी प्राथमिकताओं में ऐसे काम हैं जिनसे अधिक से अधिक लोग लाभान्वित हों। उन्होंने मां की नजर से योजनाएं बनाईं। साफ सफाई, पानी की बेहतर व्यवस्था, स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े काम उनकी योजनाओं में प्राथमिकता से शामिल हुए। स्वप्ना मानती हैं कि महिला सरपंच अपने फायदे से अधिक गांव के फायदे की सोच से काम करती हैं। महिला सरंपच के पास पहुंचना आसान होता और वे आसानी से उपलब्ध भी होती हैं।
आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के कोठाकोटा गांव की सरपंच पद्मजा रानी डाउन टू अर्थ को बताती हैं, “महिला प्रतिनिधियों की सबसे पहली प्राथमिकता परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाना होता है। वह घर और अपने समाज को सशक्त बनाना चाहती है। उन्होंने महिलाओं को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाने के लिए स्वयं सहायता समूह के जरिए लोन की शुरुआत की, जिसके बाद बहुत सी महिलाओं ने अपना व्यापार शुरू किया है। आमतौर पर पुरुष प्रतिनिधि इस दिशा में नहीं सोचते। ऐसे काम केवल महिलाएं ही कर सकती हैं।”
वास्तविकताओं से तय होती हैं प्राथमिकताएं
राजस्थान के टोंक जिले के सोड़ा गांव की पूर्व सरपंच छवि राजावत ने डाउन टू अर्थ को दिए साक्षात्कार में कहा गया कि जब महिलाएं नेतृत्व करती हैं, तो समुदाय समृद्ध होते हैं।
उनका कहना है कि महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाला अधिनियम उस बात को बड़े पैमाने पर लागू करने का अवसर पैदा करता है, जो पहले ही पंचायत स्तर पर साबित हो चुकी है।
वह कहती हैं कि जब महिलाएं शासन करती हैं, तो शासन का स्वरूप ही “लोगों के लिए विकास” से बदलकर “लोगों के साथ विकास” हो जाता है। हमारी प्राथमिकताएं हमारी वास्तविकताओं से तय होती हैं, जिनमें पानी की उपलब्धता, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और सुरक्षा शामिल हैं। ये कोई हल्के-फुल्के मुद्दे नहीं हैं, बल्कि ये एक मजबूत राष्ट्र की नींव हैं।
उन्होंने बताया कि महिला नेता अपने साथ परामर्श करने की सहज प्रवृत्ति लाती हैं। वे स्वयं सहायता समूहों, स्थानीय नेटवर्क, परिवारों और पुरुषों को प्रगति में इच्छुक भागीदार के रूप में जोड़ती हैं। इस प्रक्रिया से जो निर्णय सामने आते हैं, वे अधिक समावेशी, अधिक टिकाऊ और गहरे मानवीय मूल्यों से भरे होते हैं।
उनका कहना है कि जहां शासन व्यवस्था ने पारंपरिक रूप से केवल दृश्यमान चीजों (सड़कें, स्टेडियम, पुल) को ही महत्व दिया है, वहीं महिलाएं अक्सर कुछ शांत और गहरे प्रश्न पूछती हैं, जैसे क्या बच्चा स्कूल जा रहा है? क्या मां सुरक्षित है? क्या बुजुर्ग माता-पिता की उचित देखभाल हो रही है? हम इस बात पर जोर देते हैं कि सड़कों और इमारतों के साथ-साथ, सुचारू रूप से चलने वाले स्कूल, सभी की पहुंच में स्वास्थ्य सेवाएं और गरिमापूर्ण आजीविका के साधन भी उपलब्ध होने चाहिए।
कम होती है संसाधनों की बर्बादी
छवि के अनुसार, महिलाएं प्रक्रिया-उन्मुख भी अधिक होती हैं। वे यह पूछती हैं कि किसे लाभ मिल रहा है और कौन पीछे छूट रहा है। क्या वितरण प्रणालियां वास्तव में अंतिम व्यक्ति तक पहुंच पा रही हैं? हम कार्यान्वयन की बारीकी से निगरानी करती हैं और जमीनी अनुभव लगातार यह दर्शाता है कि ऐसा करने से संसाधनों की बर्बादी (लीकेज) कम होती है और समुदाय की जवाबदेही मजबूत होती है। यह कोई राजनीतिक तर्क नहीं है। यह तो बस वह स्वाभाविक परिणाम है, जो तब सामने आता है जब निर्णय लेने वाले लोग अपने ही घरों में खराब शासन के दुष्परिणामों को स्वयं भुगत चुके होते हैं।
उनका कहना है कि चूंकि भारत में महिलाएं घर-परिवार के प्रबंधन, देखभाल और अक्सर कृषि कार्यों का दायित्व संभालती हैं, इसलिए उनके निर्णय लेने की प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से कई पीढ़ियों को ध्यान में रखने वाली और बहुआयामी होती है। यह चुनावी दिखावे से नहीं, बल्कि सामाजिक स्वीकार्यता और समुदाय की जरूरतों से प्रेरित है। यह एक ऐसा गुण है जिसकी हमारे लोकतंत्र को आज बहुत ज्यादा जरूरत है।
उन्होंने आगे बताया कि सरपंच के तौर पर मेरा कार्यकाल एक ही सोच से प्रेरित था कि सच्चा विकास इंसानी क्षमताओं और गरिमा को बढ़ाने के बारे में है, न कि सिर्फ कंक्रीट बिछाने के बारे में। उन्होंने कहा, “मैंने शासन को अधिकार के बजाय भरोसे के रिश्ते के तौर पर फिर से परिभाषित किया जिसमें मैंने खुले सामुदायिक संवाद, पारदर्शी फैसले लेने की प्रक्रिया और परियोजनाओं की निगरानी में नागरिकों की भागीदारी को बढ़ावा दिया।
छवि के मुताबिक, शिक्षा को कोई गौण विषय नहीं, बल्कि शासन की मुख्य प्राथमिकता माना गया, सिर्फ दाखिलों की संख्या पर नहीं, बल्कि इस बात पर जोर दिया गया कि क्या हमारे गांव का कोई बच्चा अपने गांव की सीमाओं से परे जाकर बड़े सपने देखने की हिम्मत कर पाता है। मैंने शिक्षकों की सक्रियता और जवाबदेही पर काम किया और किशोरियों को उस उम्र के बाद भी स्कूल में बनाए रखने पर जोर दिया, जिस उम्र में अक्सर बहुत सी लड़कियां चुपचाप स्कूल छोड़ देती हैं।”
छवि के अनुसार, मैंने साझा जमीनों और जैव विविधता की रक्षा के लिए संघर्ष किया, यह समझते हुए कि अगर कोई पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट होता है, तो पूरा समुदाय ही गरीब हो जाता है। स्थानीय मूल्य श्रृंखलाओं के जरिए महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को संभव बनाया और महिलाओं व बच्चों के खिलाफ होने वाली हिंसा के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई। उन्होंने पुरुषों, युवाओं और परिवारों से परिवार नियोजन, लैंगिक समानता और उन सामाजिक बुराइयों के बारे में खुलकर बात की जो चुपचाप हमारी बेटियों को कमजोर करती हैं। यह बेबाकी शायद हमेशा सुखद नहीं थी, लेकिन यह जरूरी थी।
उन्होंने आगे बताया कि शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मैंने युवाओं में व्यवहारिक बदलाव और उनकी आकांक्षाओं पर ध्यान केंद्रित किया, यह एक ऐसा दीर्घकालिक निवेश है जो शायद ही कभी सुर्खियों में आता है, लेकिन जो पूरी एक पीढ़ी को परिभाषित करता है। मेरी हर पहल आपस में जुड़ी हुई थी और उसे इस तरह से डिजाइन किया गया था कि समय के साथ उसका महत्व और भी बढ़ता जाए।