इलस्ट्रेशन: योगेंद्र आनंद / सीएसई
राजकाज

विश्लेषण: वित्त आयोग की सिफारिशें, राज्यों व पंचायतों के लिए कितनी फायदेमंद

16वें वित्त आयोग ने बदलती वित्तीय और जलवायु परिस्थितियों को देखते हुए सुधारों की सिफारिश की है।

Himanshu Nitnaware, Raju Sajwan

केंद्र सरकार ने 16वें वित्त आयोग की कर-वितरण संबंधी सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है। ये सिफारिशें 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 तक प्रभावी रहेंगी। वित्त आयोग एक संवैधानिक निकाय है, जिसका गठन हर पांच वर्ष में भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है। इसका काम केंद्र सरकार और राज्यों के बीच करों की शुद्ध आय के वितरण की व्यवस्था के संबंध में सिफारिशें करना है।

करों के इस विभाज्य पूल में केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए उपकर और अधिभार शामिल नहीं होते। वित्त आयोग अनुदान-सहायता से संबंधित सिद्धांतों की भी सिफारिश करता है। ये अनुदान राज्यों को भारत की संचित निधि से सहायता, दान या अंशदान के रूप में दिए जाते हैं। साथ ही, वित्त आयोग पंचायतों और नगरपालिकाओं के लिए भी अनुदान के सिद्धांत निर्धारित करता है। आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत गठित निधियों की वित्तीय व्यवस्था की समीक्षा भी वित्त आयोग करता है और उसके लिए भी सिफारिशें देता है।

1 फरवरी को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट लोकसभा में प्रस्तुत की और सदन को इसकी सरकारी स्वीकृति की जानकारी दी। रिपोर्ट में राज्यों को विभाज्य कर पूल में 41 प्रतिशत हिस्सेदारी देने की सिफारिश की गई है, जो कि पिछले वित्त आयोग द्वारा की गई सिफारिश के समान है। इसे ऊर्ध्वाधर बंटवारा कहा जाता है।

ऊर्ध्वाधर बंटवारे में पहले यह तय होता है कि कुल कर राशि में से राज्यों को कितना हिस्सा मिलेगा। उसी हिस्से को अलग-अलग राज्यों के बीच कैसे बांटा जाए, इसी प्रक्रिया को क्षैतिज बंटवारा कहा जाता है। इसके लिए 16वें वित्त आयोग ने छह मानदंडों को आधार बनाया। इनमें आय में अंतर (किसी राज्य के प्रति व्यक्ति जीएसडीपी (सकल राज्य घरेलू उत्पाद) और सबसे अधिक प्रति व्यक्ति जीएसडीपी वाले तीन बड़े राज्यों की औसत प्रति व्यक्ति जीएसडीपी के बीच का अंतर) के अलावा जनसंख्या, जनसांख्यिकीय प्रदर्शन, क्षेत्रफल, वन क्षेत्र और भारत के सकल घरेलू उत्पाद में राज्य के योगदान को मानदंड के रूप में शामिल किया गया है। यह पहली बार है जब किसी वित्त आयोग ने राष्ट्रीय जीडीपी में राज्यों के योगदान को एक मानदंड के रूप में जोड़ा है। इससे पहले के वित्त आयोग अलग-अलग मानकों का उपयोग करते रहे थे।

16वें वित्त आयोग ने उल्लेख किया है कि केरल, ओडिशा, हरियाणा, गुजरात और तमिलनाडु सहित 18 राज्यों ने करों के बंटवारे का प्रतिशत बढ़ाकर 50 प्रतिशत करने की मांग की थी। दूसरी ओर केंद्र सरकार ने कर हस्तांतरण में संयम बरतने की जरूरत बताते हुए कहा था कि वर्तमान में सकल राजस्व प्राप्तियों का लगभग 49 प्रतिशत राज्यों को दिया जा रहा है और यह व्यवस्था दीर्घकाल में वित्तीय रूप से टिकाऊ नहीं है। इसी पृष्ठभूमि में 16वें वित्त आयोग ने राष्ट्रीय जीडीपी में राज्यों के योगदान को एक अतिरिक्त मानदंड के रूप में शामिल किया, ताकि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में अधिक योगदान देने वाले राज्यों को अपेक्षाकृत अधिक महत्व मिल सके। हालांकि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि इस मानदंड को दिया गया भार ऐसा रखा गया है जिससे केवल एक संकेतात्मक बदलाव हो और राज्यों की हिस्सेदारी में कोई बड़ा या अचानक परिवर्तन न आए।

एक और महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए 16वें वित्त आयोग ने “राजस्व घाटा अनुदान” की व्यवस्था समाप्त कर दी है। इस व्यवस्था के तहत केंद्र सरकार राज्यों को उनकी आय और व्यय के बीच के अंतर को पाटने के लिए धन देती थी। साथ ही स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे क्षेत्रों और पहाड़ी राज्यों जैसी भौगोलिक कठिनाइयों से जूझ रहे राज्यों को भी इसी माध्यम से सहायता मिलती थी। यह प्रावधान प्रथम वित्त आयोग द्वारा शुरू किया गया था और उसके बाद के सभी वित्त आयोगों ने ऐसे अनुदान दिए थे। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में इन अनुदानों की राशि धीरे-धीरे घटाई जा रही थी, खासकर तब से जब राज्यों को विभाज्य कर पूल में अधिक हिस्सा मिलने लगा। 16वें वित्त आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 15वें वित्त आयोग द्वारा अनुशंसित राजस्व घाटा अनुदानों में जो लगातार कमी लाई गई थी और जो 2025-26 तक लगभग शून्य स्तर पर पहुंच रही है, उसी प्रवृत्ति को आगे बढ़ाते हुए अब किसी भी राज्य को राजस्व घाटा अनुदान देने की सिफारिश नहीं की जाती। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह किसी प्रकार के क्षेत्र-विशेष या राज्य-विशेष अनुदान की भी सिफारिश नहीं कर रहा है।

नया उपशीर्षक

16वें वित्त आयोग ने वन क्षेत्र को एक मानदंड के रूप में शामिल रखते हुए राज्यों को अपने मौजूदा वनों को सुरक्षित रखने और वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन देने की कोशिश की है। आयोग ने राज्य के वन आवरण को दिए जाने वाले 10 प्रतिशत वजन (वेटेज) को बरकरार रखा है, लेकिन इसकी परिभाषा में कुछ अहम बदलाव किए हैं। अब तक केवल बहुत सघन वन और मध्यम सघन वन को ही वन क्षेत्र की गणना में प्रमुख आधार माना जाता था, लेकिन अब खुला वन (ओपन फॉरेस्ट) भी एक अतिरिक्त श्रेणी के रूप में शामिल किया गया है, जिससे कुल वन क्षेत्र को परिभाषित किया जाएगा। बहुत सघन वन वे क्षेत्र हैं जहां पेड़ों की छत्रछाया (कैनोपी) 70 प्रतिशत या उससे अधिक होती है। मध्यम सघन वन वे हैं जिनकी छत्रछाया घनत्व 40 से 70 प्रतिशत के बीच होता है। खुला वन उन क्षेत्रों को कहा गया है जहां छत्रछाया घनत्व 10 से 40 प्रतिशत के बीच होता है। खुले वन आमतौर पर शुष्क या झाड़ीदार वन होते हैं, जिनमें स्वाभाविक रूप से पेड़ों का घनत्व कम होता है। इनमें गर्म और ठंडे रेगिस्तानों जैसे खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र भी शामिल हैं। साथ ही घास के मैदान और सवाना क्षेत्र भी इसी श्रेणी में आते हैं। शोधकर्ता और पारिस्थितिकीविद् पिया सेठी का कहना है कि खुले वनों को शामिल करना खास महत्व रखता है, क्योंकि देश में अब भी पेड़ों की छत्रछाया का घनत्व ही आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया प्रमुख पारिस्थितिक मापदंड है। इस दृष्टि से यह कदम सराहनीय है।

हालांकि पिया सेठी यह भी कहती हैं कि इस निर्णय से कुछ गंभीर चिंताएं भी खड़ी होती हैं, जिन पर सावधानी से विचार किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि भले ही “खुले वन” की श्रेणी में अन्य पारिस्थितिकी तंत्र शामिल किए गए हों, लेकिन केवल “वन” शब्द का प्रयोग घास के मैदानों और सवाना जैसे महत्वपूर्ण गैर-वन पारिस्थितिकी तंत्रों को स्पष्ट रूप से पहचान और महत्व देने में असफल रहता है। वह यह भी जोड़ती हैं कि इस कदम को केंद्र सरकार द्वारा 2023 में अधिसूचित ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। इस कार्यक्रम के तहत क्षतिग्रस्त भूमि पर वनीकरण कर “ग्रीन क्रेडिट” अर्जित करने की व्यवस्था की गई है। आलोचकों का आरोप है कि यह योजना घास के मैदानों, सवाना और बाढ़ के मैदानों जैसे प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों को उद्योगों के व्यावसायिक उपयोग के लिए खोलने का रास्ता बना सकती है। इस योजना की यह कहकर भी आलोचना की गई है कि इससे ऐसे क्रेडिट तो उत्पन्न किए जा रहे हैं, जिनसे वनों, वन्यजीवों या पारिस्थितिकी सेवाओं को कोई स्पष्ट लाभ सिद्ध नहीं होता। सेठी का मानना है कि ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम की शुरुआत और हाल की नीतिगत पहलें, जिनमें वन क्षेत्रों में पौधारोपण की अनुमति शामिल है, यदि 16वें वित्त आयोग की उस सिफारिश के साथ मिलाकर देखी जाएं जिसमें वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन देने की बात कही गई है, तो अनजाने में यह वास्तविक पारिस्थितिक पुनर्स्थापन के बजाय केवल पौधारोपण को बढ़ावा दे सकती हैं। यह विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि भारतीय वन सर्वेक्षण द्वारा प्रस्तुत वर्तमान वन आवरण के आंकड़ों में पहले से ही बाग-बगीचे, पार्क और वृक्षारोपण क्षेत्र शामिल किए जाते हैं।

इसके अलावा 16वें वित्त आयोग ने 2015 से 2023 के बीच राज्यों के घनत्व आधारित वन क्षेत्र में हुई वृद्धि के लिए प्रोत्साहन की व्यवस्था भी की है। केंद्र सरकार ने खुले वनों को 0.30, मध्यम सघन वनों को 0.65 और अत्यंत सघन वनों को 1.0 का वजन दिया है। आयोग ने हर तरह के जंगल को अलग अंक दिए हैं। ये अंक इस बात पर तय हुए हैं कि वह जंगल कितना घना है, खासकर बहुत घने जंगल के मुकाबले। फिर दो चीजें देखी जाती हैं। एक, किसी राज्य के जंगल देश के कुल जंगल में कितना हिस्सा रखते हैं। दूसरी, उस राज्य में जंगल कितना बढ़ा है। इन दोनों को 80 और 20 के अनुपात में मिलाकर जंगल से जुड़ा अंतिम अंक तय किया जाता है। इन दोनों हिस्सों को 80 और 20 के अनुपात में जोड़ा जाता है। इसी आधार पर “वन मानक” तय किया जाता है।

पंचायतों का हिस्सा

16वें वित्त आयोग ने ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों के लिए अनुदानों में बड़ा इजाफा किया है। 2026 से 2031 की अवधि के लिए कुल 7,91,493 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। यह राशि 2021-26 की अवधि में 15वें वित्त आयोग द्वारा दिए गए अनुदानों की तुलना में लगभग 82 प्रतिशत अधिक है। इस कुल राशि में से 4,35,236 करोड़ रुपए ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिए तय किए गए हैं। यह पिछली बार की तुलना में लगभग 84 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। ग्रामीण निकायों के लिए दी गई राशि दो हिस्सों में बंटी है। पहला हिस्सा है सुनिश्चित मूल अनुदान, जो कुल राशि का 80 प्रतिशत है और इसकी रकम 3,48,188 करोड़ रुपए है। दूसरा हिस्सा प्रदर्शन (परफॉर्मेंस) आधारित अनुदान का है, जो कुल का 20 प्रतिशत है और 87,048 करोड़ रुपए है। प्रदर्शन आधारित अनुदान में से 43,524 करोड़ रुपए सीधे ग्रामीण निकायों के कामकाज से जुड़े होंगे, खासकर इस बात से कि वे अपनी खुद की आय कितनी बढ़ा पाते हैं। दिल्ली स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के प्रोफेसर वी.एन. आलोक कहते हैं, “मूल अनुदान भी कुछ शर्तों से जुड़ा है। इसमें नियमित चुनाव कराना, खातों का प्रकाशन और ऑडिट, राज्य वित्त आयोग का समय पर गठन और उसकी रिपोर्ट पेश होने के छह महीने के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट रखना शामिल है। जो अनुदान बंधनमुक्त (अनटाइड) है, उसे किसी भी उद्देश्य के लिए खर्च किया जा सकता है, लेकिन उससे वेतन और अन्य स्थापना संबंधी खर्च नहीं किए जा सकते।”

16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है, “हमने स्थानीय निकायों को अपनी आय के स्रोत विकसित करने पर विशेष जोर दिया गया है। वर्तमान में अधिकतर ग्रामीण और शहरी निकाय अपनी ओर से बहुत कम राजस्व जुटा पाते हैं। अपने कामकाज के लिए वे काफी हद तक और कई बार पूरी तरह केंद्र और राज्य सरकारों पर निर्भर रहते हैं। 15वें वित्त आयोग ने शहरी निकायों को संपत्ति कर संग्रह बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन प्रणाली शुरू की थी, जिसमें अनुदानों को राजस्व वृद्धि से जोड़ा गया था। हमने इसी प्रोत्साहन प्रणाली को आगे बढ़ाया है और अपनी सिफारिशों में शामिल किया है।” विशेषज्ञों ने इस सिफारिश का स्वागत किया है। उनका कहना है कि स्थानीय निकायों की अपनी आय बढ़ाने पर जोर देना बहुत महत्वपूर्ण कदम है। पूर्व केंद्रीय पंचायती राज सचिव एस. एम. विजयानंद के अनुसार, उत्तर भारत के अधिकांश राज्यों में स्थानीय निकायों की अपनी आय लगातार घटती गई है। पहले राज्य औपचारिक रूप से शर्तें मान लेते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं चलेगा। अनुदान पाने के लिए उन्हें हर साल अपनी आय में वृद्धि दिखानी होगी। साथ ही, उसको कुछ अन्य सुधार भी करने होंगे। अहमदाबाद स्थित गुजरात इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च में सहायक प्रोफेसर मधुसूदन बंदी ने कहा, “सिर्फ अनुदान बढ़ाने से ग्रामीण विकास में बड़ा बदलाव नहीं आएगा, जब तक कि राज्य सरकारें आवश्यक सुधारों को गंभीरता से लागू न करें।” दिल्ली स्थित गैर-लाभकारी संस्था प्रोफेशनल असिस्टेंस फॉर डेवलपमेंट एक्शन (प्रदान) के कार्यकारी निदेशक सरोज कुमार महापात्रा कहते हैं, “प्रदर्शन-आधारित अनुदानों पर जिस तरह जोर दिया गया है, उससे यह बात स्पष्ट होती है कि पंचायती संस्थाओं को बंधित अनुदानों पर निर्भर रहने की बजाय खुद को मजबूत करते हुए स्वायत्त संस्थाओं का रूप लेना चाहिए।” वहीं, पूर्व केंद्रीय पंचायती राज सचिव सुनील कुमार अपनी आपत्ति जताते हुए कहते हैं कि वित्त आयोग द्वारा स्थानीय निकाय शब्द का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए, क्योंकि संविधान के भाग नौ और भाग नौ-क को देखें, तो कहीं भी “स्थानीय निकाय” शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। ये स्थानीय स्वशासन या लोकल सेल्फ गवर्नमेंट हैं। वित्त आयोग को यही शब्द इस्तेमाल करना चाहिए।

वित्त आयोग ने टाइड व अनटाइड फंड में भी बदलाव किया है। टाइड यानी बंधे हुए और अनटाइड का मतलब बंधन मुक्त। 15वें वित्त आयोग ने 60 प्रतिशत टाइड और 40 प्रतिशत धनराशि अनटाइड के लिए थी। पंचायती राज मंत्रालय के पूर्व सचिव सुनील कुमार ने कहा, “टाइड का मतलब यह है कि आपके हाथ बांध दिए गए हैं। ग्राम पंचायतों को विकास की योजनाओं में 30 प्रतिशत राशि पेयजल और 30 प्रतिशत स्वच्छता पर खर्च को शामिल करना होता है, चाहे स्थानीय समुदाय को उसकी आवश्यकता महसूस हो या नहीं। यह स्थानीय स्वायत्तता को कमजोर करता है।” 16वें वित्त आयोग ने इसे 50:50 कर दिया है। सुनील कुमार कहते हैं, “टाइड फंड की जरूरत ही नहीं है, ग्राम सभाएं तय करें कि उन्हें अपना पैसा किस मद पर खर्च करना है, लेकिन केंद्रीय मंत्रालयों के दबाव ऐसा संभव नहीं हो पाता।”

नया जलवायु परिदृश्य

16वें वित्त आयोग ने राष्ट्रीय आपदा कोष के लिए धन आवंटित करते समय राज्यों द्वारा पिछले कई वर्षों में आपदाओं पर किए गए वास्तविक खर्च को आधार बनाया है। इसमें 2015-16 से 2023-24 तक का खर्च, 2024-25 के संशोधित अनुमान और 2025-26 के बजट अनुमान शामिल किए गए। महंगाई को ध्यान में रखते हुए इन आंकड़ों को 5 प्रतिशत बढ़ाया गया। इसके बाद पिछले 11 वर्षों के औसत व्यय में और 10 प्रतिशत की वृद्धि की गई। इस गणना के आधार पर 2026-27 के लिए आपदा संबंधी खर्च हेतु 14,370 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। 2026-27 से 2030-31 की पांच वर्षीय अवधि के लिए आयोग ने राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (एडीआरएफ) और राज्य आपदा शमन कोष (एडीएमएफ) के लिए कुल 2,04,401 करोड़ रुपए की सिफारिश की है। इसमें से 1,55,916 करोड़ रुपए केंद्र सरकार देगी और 48,485 करोड़ रुपए राज्यों को वहन करने होंगे। सामान्य राज्यों के लिए केंद्र और राज्य के बीच लागत साझेदारी का अनुपात 75:25 तय किया गया है, जबकि पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों के लिए यह अनुपात 90:10 रहेगा। आयोग ने यह भी सुझाव दिया है कि कुल राशि का 80 प्रतिशत राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष और 20 प्रतिशत राज्य आपदा शमन कोष को दिया जाए। इसका मतलब है कि 1,63,521 करोड़ रुपए प्रतिक्रिया कोष और 40,880 करोड़ रुपए शमन कोष के लिए होंगे।

वर्तमान में राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष के तहत चक्रवात, सूखा, भूकंप, आग, बाढ़, सुनामी, ओलावृष्टि, भूस्खलन, हिमस्खलन, बादल फटना, कीट प्रकोप, पाला और शीतलहर जैसी आपदाएं शामिल हैं। राज्यों को यह भी अनुमति है कि वे अपनी कुल राशि का 10 प्रतिशत उन स्थानीय आपदाओं में तत्काल राहत के लिए उपयोग कर सकते हैं जो राष्ट्रीय सूची में शामिल नहीं हैं, बशर्ते राज्य सरकार उन्हें औपचारिक रूप से अधिसूचित करे और स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करे। आयोग ने इस लचीलेपन को जारी रखने की सिफारिश की है। 16वें वित्त आयोग ने यह भी दर्ज किया है कि राज्यों की ओर से लू को राष्ट्रीय स्तर पर अधिसूचित आपदा घोषित करने की मांग लगातार बढ़ रही है। अब तक 11 राज्य लू को राज्य-विशेष आपदा घोषित कर चुके हैं। कई अन्य राज्यों ने भी इसे राष्ट्रीय सूची में शामिल करने के लिए औपचारिक अनुरोध भेजे हैं। आयोग के अनुसार, अत्यधिक गर्मी का असर कमजोर और संवेदनशील आबादी पर सबसे ज्यादा पड़ता है। आंकड़े बताते हैं कि 1981 से 2022 के बीच भारत में अत्यधिक गर्म दिनों की संख्या और उनकी तीव्रता दोनों में तेज वृद्धि हुई है। वर्ष 2013, 2016, 2019, 2022 और 2024 में लू की गंभीर स्थितियां दर्ज की गईं।

16वें वित्त आयोग ने बिजली गिरने की घटनाओं को भी तेजी से बढ़ते खतरे के रूप में चिन्हित किया है। भारतीय मौसम विभाग के सहयोग से तैयार वार्षिक रिपोर्ट (2020-21) का हवाला देते हुए आयोग ने कहा है कि इस अवधि के दौरान देशभर में बिजली गिरने की घटनाओं में 34 प्रतिशत की वृद्धि हुई। वर्ष 2020-21 में लगभग 1.85 करोड़ बार बिजली गिरने की घटनाएं दर्ज की गईं, जो पिछले वर्ष की तुलना में 47 लाख अधिक थीं। इन रुझानों को देखते हुए 16वें वित्त आयोग ने निष्कर्ष निकाला है कि लू और बिजली गिरने दोनों को औपचारिक रूप से राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाना चाहिए। इससे राज्यों को इनके बढ़ते प्रभाव से निपटने के लिए आपदा राहत कोष तक अधिक सीधे और नियमित रूप से पहुंच मिल सकेगी।

रिपोर्ट में एक और अहम बदलाव यह है कि वनाग्नि को आपदा जोखिम सूचकांक तय करने वाले दस प्रमुख खतरों में स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है। इस सूचकांक के आधार पर राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष और राज्य आपदा शमन कोष की कुल राशि का 30 प्रतिशत आवंटित किया जाता है। दिल्ली स्थित गैर-लाभकारी संस्था क्लाइमेट रेजिलिएंट ऑब्जर्विंग सिस्टम्स प्रमोशन काउंसिल के अध्यक्ष और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के तकनीकी सहयोगी संजय श्रीवास्तव का कहना है कि इससे आपदाओं से निपटने की क्षमता बढ़ाने के लिए वित्तीय प्रावधानों को मजबूती मिलेगी। खासकर हिमालयी राज्यों को सीधा लाभ मिलेगा और यह कदम जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन और शमन प्रयासों के अनुरूप है।

हालांकि पिया सेठी चेतावनी देती हैं कि यह तरीका खुले प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों (ओपन नेचुरल इकोसिस्टम) के नुकसान को तेज कर सकता है। उदाहरण के लिए, ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम के लिए चिन्हित 50 प्रतिशत से अधिक वन भूमि ऐसे ही क्षेत्रों से मिलती है। इससे कीमती प्राकृतिक आवास दूसरे उपयोग में बदले जा सकते हैं। इनमें शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्र शामिल हैं। ठंडे रेगिस्तान भी इसमें आते हैं। घासभूमि और अन्य जैव-विविध पारिस्थितिक तंत्र भी प्रभावित हो सकते हैं। ये सभी क्षेत्र अभी “ओपन फॉरेस्ट” श्रेणी में रखे गए हैं। इन पर असंख्य समुदायों की आजीविका निर्भर करती है।