केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट प्रभावित गांवों में क्रमिक चूल्हाबंदी जारी है। फोटो: जय किसान संगठन  
राजकाज

केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट प्रभावितों के नेता अमित भटनागर तोड़ेंगे आमरण अनशन, समर्थन में कई गांवों में चूल्हा बंदी

जय किसान संगठन के अनुसार, भटनागर से चर्चा के बाद प्रशासन ने आदेश जारी किया, प्रोजेक्ट प्रभावितों गांवों में फिर से होगा वेरिफिकेशन

Bhagirath

केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट सहित अन्य सिंचाई परियोजना प्रभावितों का समूह अपने आंदोलन के नेता अमित भटनागर का अनशन तुड़वाने छतरपुर के बिजावर में पहुंच चुका है। शाम तक वह अनशन तोड़ सकते हैं। अमित भटनागर के अनशन का आज 23 जुलाई को 18वां दिन है। 19 जुलाई को चिता आंदोलन से जबरन उठाने के बाद वह आईसीयू में भर्ती हैं और वहीं से उनका आमरण अनशन भी जारी है।

अमित भटनागर के समर्थन में पन्ना और छतरपुर के परियोजना प्रभावित गांवों में चूल्हा बंदी आंदोलन भी चल रहा है। पलकोहा गांव में करीब 50-60 घरों में चूल्हा नहीं जल रहा है। गांव में रहने वाली रोशनी अहिरवार ने डाउन टू अर्थ को बताया कि क्रमिक चूल्हाबंदी पिछले तीन दिन से चल रही है।

जय किसान संगठन का कहना है कि अमित भटनागर ने स्वास्थ्य अत्यंत गंभीर होने के बावजूद स्पष्ट किया है कि जब तक वास्तविक प्रभावित परिवारों को न्याय नहीं मिलता और परियोजनाओं में हुई अनियमितताओं का समाधान नहीं होता, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा।

संगठन के अनुसार, आईसीयू में प्रभारी कलेक्टर एवं अपर जिला दंडाधिकारी विनय द्विवेदी ने अमित भटनागर से उनकी मांगों पर विस्तृत चर्चा की। इस चर्चा के बाद प्रशासन ने तत्काल एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए उन वास्तविक प्रभावित परिवारों का पुनः परीक्षण (री-वेरिफिकेशन) कराने का निर्णय लिया है, जिनके नाम अब तक पात्र सूची में शामिल नहीं हो पाए हैं।

अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) एवं भू-अर्जन अधिकारी बिजावर द्वारा जारी आदेश के अनुसार, सुकवाहा, भौरखुवा, घुघरी, नैगुवां, ककरा, कदवारा, पलकोहा, खरयानी, ढोढन, मैनारी, कुपी, शाहपुरा, बसुधा और डुगरिया सहित प्रभावित गांवों में प्रशासनिक टीमें जाकर पुनः सत्यापन करेंगी।

इन टीमों में संबंधित तहसीलदार, नायब तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक, हल्का पटवारी, जल संसाधन विभाग के उपयंत्री तथा अन्य संबंधित विभागों के अधिकारी शामिल किए गए हैं। चर्चा के दौरान यह भी सहमति बनी कि इस पूरी प्रक्रिया में जय किसान संगठन का एक अधिकृत प्रतिनिधि भी प्रत्येक गांव में उपस्थित रहेगा, जिससे सर्वेक्षण पारदर्शी एवं निष्पक्ष ढंग से सम्पन्न हो तथा कोई भी वास्तविक प्रभावित परिवार अपने अधिकार से वंचित न रह जाए।

अमित भटनागर ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यदि प्रशासन पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता से गांव-गांव जाकर वास्तविक प्रभावितों का सत्यापन करता है, तो यह हजारों प्रभावित परिवारों के लिए न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

आईसीयू में भर्ती अमित भटनागर का आमरण अनशन जारी है

आमरण अनशन समाप्त करने की अपील

अमित भटनागर की लगातार बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए देशभर के अनेक पर्यावरणविदों, किसान नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, जन आंदोलनों, बुद्धिजीवियों तथा विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने उनसे आमरण अनशन समाप्त करने की भावनात्मक अपील की है। अपील करने वालों में नर्मदा बचाओ आंदोलन की संस्थापक एवं नेशनल अलायंस फॉर पीपल्स मूवमेंट्स (एनएपीएम) की सह-संस्थापक मेधा पाटकर, अरावली विरासत जन अभियान के सह-संस्थापक कैलाश मीणा, अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष इंद्रजीत सिंह, ओडिशा के वरिष्ठ पर्यावरण एवं आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता प्रफुल्ल सामंतरा, एसएपीएसीसी की सह-संयोजक सौम्या दत्ता, आदिवासी समन्वय मंच भारत की कुसुम रावत, रोशन वलवी, अशोक चौधरी, साधना उइके एवं विश्वनाथ तिर्की, पीपुल फॉर अरावली की संस्थापक नीलम अहलूवालिया, शाहबाद घाटी संरक्षण संघर्ष समिति के समन्वयक प्रशांत पाटनी, हरियाणा के पर्यावरणविद् लोकेश भिवानी सहित अनेक राष्ट्रीय संगठनों एवं सामाजिक आंदोलनों के देश भर के लगभग 500 प्रतिनिधि शामिल हैं।

चूल्हा बंदी आंदोलन

केन–बेतवा लिंक परियोजना प्रभावित गांवों के लाेगों का कहना है कि जिस प्रकार आंदोलनकारी आदिवासी महिलाओं, किसानों और ग्रामीणों को बार-बार पुलिस कार्रवाई के माध्यम से आंदोलन स्थल से हटाया गया तथा आईसीयू में भर्ती अमित भटनागर से परिजनों, मीडिया, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आंदोलनकारियों तक को मिलने नहीं दिया जा रहा है, उससे ग्रामीणों में गहरी चिंता और आक्रोश है।

अमित भटनागर के समर्थन में अनेक गांवों, विशेषकर महिलाओं ने "चूल्हा बंदी आंदोलन" शुरू कर दिया है। कई परिवारों ने अपने घरों में चूल्हा जलाना बंद कर दिया है और इसे अपने संघर्ष एवं एकजुटता का प्रतीक बताया है। अमित भटनागर ने कहा कि यह संघर्ष किसी व्यक्ति, दल या सरकार के विरुद्ध नहीं, बल्कि संविधान, लोकतंत्र, पर्यावरण, आदिवासी समाज और विस्थापित परिवारों के अधिकारों की रक्षा का संघर्ष है। उन्होंने कहा कि प्रशासन द्वारा पुनः सर्वे और संयुक्त जांच दल का गठन एक सकारात्मक पहल है। यदि यह प्रक्रिया निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ पूरी की जाती है तथा सभी छूटे हुए वास्तविक प्रभावित परिवारों को न्याय मिलता है, तो यह आंदोलन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी।