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जंगल

उत्तराखंड का भालूगाड़ मॉडल: वनों की पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के भुगतान की हिमालयी पहल

उत्तराखंड की वन पंचायतों और भालूगाड़ सहकारी समिति ने दिखाया कि प्रकृति की पारिस्थितिकी सेवाओं का आर्थिक मूल्यांकन, पारदर्शी राजस्व साझेदारी और स्थानीय भागीदारी मिलकर हिमालयी क्षेत्रों में हरित अर्थव्यवस्था और संरक्षण आधारित विकास का मार्ग खोल सकते हैं

Dr. GCS Negi, Dr Pradeep Singh, Rajendra Singh Mehra

हैक्या जंगलों की रक्षा करने वाले स्थानीय समुदायों को उनकी पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं (पेमेंट फॉर इकोसिस्टम सर्विस–पीईएस) का आर्थिक प्रतिफल मिलना चाहिए? नैनीताल जिले के भालूगाड़ का समुदाय-आधारित इको-टूरिज्म मॉडल बताता है कि यदि वन, जल, पर्यटन और स्थानीय आजीविका को एकीकृत किया जाए, तो प्रकृति-आधारित समाधान जलवायु परिवर्तन, जल संकट और ग्रामीण विकास जैसी चुनौतियों का प्रभावी उत्तर बन सकते हैं। यदि हिमालय देश को जल, कार्बन, जैव विविधता और स्वच्छ पर्यावरण जैसी अमूल्य सेवाएँ देता है, तो इनकी रक्षा करने वाले समुदायों को केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि उचित आर्थिक प्रतिफल भी मिलना चाहिए।

धारी (जनपद नैनीताल) से कसियालेख–मुक्तेश्वर मार्ग के समीप घने बाँज–बुरांश के जंगलों से होकर लगभग एक किलोमीटर लंबी पगडंडी भालूगाड़ जलधारा के किनारे-किनारे नीचे उतरती है। कुछ ही देर में चट्टानों से गिरती जलधारा की गूँज सुनाई देती है। यही है भालूगाड़ जलप्रपात, जो आज उत्तराखंड के उभरते सामुदायिक इको-टूरिज्म स्थलों में से एक है। पहली दृष्टि में यह एक सामान्य प्राकृतिक जलप्रपात प्रतीत होता है, किंतु इसकी वास्तविक कहानी जंगल, जल, स्थानीय समुदाय और सतत विकास के गहरे संबंध की है।

हिमालय को "एशिया का जल स्तम्भ" (वाटर टॉवर ऑफ एशिया) कहा जाता है। भारत की अनेक प्रमुख नदियों का उद्गम यहीं से होता है और करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा इसके वनों पर निर्भर करती है। उत्तराखंड के लगभग 2.6 लाख प्राकृतिक जलस्रोत (धारे एवं नौले) ग्रामीण पेयजल का प्रमुख आधार हैं, किंतु विभिन्न अध्ययनों के अनुसार लगभग 30 प्रतिशत सूख चुके हैं और लगभग 45 प्रतिशत सूखने के कगार पर हैं। इसलिए जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केवल जलस्रोतों का नहीं, बल्कि उन्हें पोषित करने वाले वनों का संरक्षण भी अनिवार्य है।

वन केवल लकड़ी, चारा और ईंधन के स्रोत नहीं हैं। वे स्वच्छ जल, मृदा संरक्षण, कार्बन अवशोषण, जैव विविधता संरक्षण और प्रकृति-आधारित पर्यटन जैसी अनेक पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ प्रदान करते हैं। इन सेवाओं का लाभ पूरा समाज उठाता है, किंतु उनकी रक्षा करने वाले स्थानीय समुदायों को प्रायः प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ नहीं मिलता। सहस्राब्दी पारितंत्र मूल्यांकन (एमईए, 2005) के बाद इसी सोच से पीईएस की अवधारणा को वैश्विक मान्यता मिली, जो समुदाय प्रकृति का संरक्षण कर समाज को पारिस्थितिकी सेवाएँ उपलब्ध कराता है, उसे उसके बदले आर्थिक प्रतिफल मिलना चाहिए।

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भालूगाड़ क्यों महत्वपूर्ण है?

भालूगाड़ इस अवधारणा का एक व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करता है। यहाँ पर्यटन और संरक्षण को परस्पर पूरक बनाया गया तथा पर्यटन से प्राप्त आय का एक हिस्सा पुनः वन संरक्षण, जलागम प्रबंधन और सामुदायिक विकास में निवेश किया जाने लगा। तीन वन पंचायतों के संरक्षित बाँज–बुरांश–काफल मिश्रित वनों से पोषित यह जलागम दर्शाता है कि स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी, पारदर्शी प्रबंधन और प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग मिलकर एक प्रभावी प्रकृति आधारित समाधान मॉडल विकसित कर सकते हैं। यही अनुभव भविष्य में ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम, भारतीय कार्बन बाजार तथा अन्य पारिस्थितिकी-आधारित नीतियों के लिए भी उपयोगी आधार बन सकता है।

समुदाय ने संभाली कमान

उत्तराखंड सरकार द्वारा वर्ष 2014–15 में पर्यटन को उद्योग का दर्जा दिए जाने के बाद भालूगाड़ क्षेत्र में पर्यटकों की संख्या तेजी से बढ़ी। इसके साथ भूमि उपयोग परिवर्तन, प्लास्टिक कचरा, जल प्रदूषण और वनों पर बढ़ते दबाव जैसी समस्याएँ भी सामने आईं। स्थानीय लोगों, विशेषकर महिलाओं, ने महसूस किया कि यदि पर्यटन को सुव्यवस्थित नहीं किया गया तो इसका प्रतिकूल प्रभाव जंगलों, जलधारा और आजीविका—तीनों पर पड़ेगा। इसलिए उन्होंने बाहरी हस्तक्षेप की प्रतीक्षा करने के बजाय स्वयं संरक्षण और सामुदायिक इको-टूरिज्म की पहल की।

वर्ष 2017 में भालूगाड़ जलागम की लगभग 250 हेक्टेयर  क्षेत्र में फैली तीन वन पंचायतों—चौखुटा, गजार और बुरांसी के वरिष्ठ नागरिकों और प्रकृति प्रेमियों ने एक समूह बनाकर पर्यटकों के व्यवहार को नियंत्रित करने तथा जलागम की पारिस्थितिक अखंडता बनाए रखने का अभियान शुरू किया। जिला प्रशासन और पर्यटन विभाग के सहयोग से इस पहल को आगे बढ़ाया गया और शीघ्र ही इसे संस्थागत स्वरूप मिला।

एक छोटी समिति से सामुदायिक आंदोलन तक

18 जुलाई 2018 को "भालूगाड़ जलप्रपात (छिण) सहकारी समिति" का विधिवत गठन और पंजीकरण किया गया। प्रारम्भ में दो वन पंचायतों के 11 संस्थापक सदस्यों ने अंशदान देकर इसकी नींव रखी। बेहतर प्रबंधन के लिए समिति ने केम्प्टी फॉल्स (मसूरी) और ढोकाने जलप्रपात (नैनीताल) जैसे स्थापित इको-टूरिज्म स्थलों का अध्ययन भी किया। प्राप्त अनुभवों के आधार पर पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय भागीदारी और वित्तीय अनुशासन पर आधारित एक सामुदायिक प्रबंधन मॉडल विकसित किया गया।

आज समिति में 32 सदस्य हैं। छह सदस्यीय कार्यकारिणी का चुनाव प्रत्येक तीन वर्ष में होता है तथा नियमित मासिक बैठकों और स्पष्ट नियमों के माध्यम से समिति अपने कार्यों का संचालन करती है। यह व्यवस्था दर्शाती है कि स्पष्ट संस्थागत ढाँचे और सामुदायिक उत्तरदायित्व के साथ स्थानीय पहलें दीर्घकालीन संरक्षण और सतत विकास का प्रभावी आधार बन सकती हैं।

लेखकों की आंखों से भालूगाड़

मार्च 2026 में लेखकों ने भालूगाड़ का भ्रमण कर समिति के अध्यक्ष श्री राजेंद्र सिंह, पदाधिकारियों, वन पंचायत प्रतिनिधियों तथा स्थानीय युवाओं से विस्तृत चर्चा की। बातचीत से स्पष्ट हुआ कि प्रारम्भ में लोगों को विश्वास नहीं था कि एक छोटा-सा प्राकृतिक जलप्रपात स्थानीय विकास का आधार बन सकता है। धीरे-धीरे यह समझ विकसित हुई कि जंगल सुरक्षित रहेंगे तो जलधारा बचेगी, जलधारा बचेगी तो पर्यटन टिकेगा और पर्यटन टिकेगा तो स्थानीय रोजगार भी बढ़ेगा। यही सोच आगे चलकर एक सुदृढ़ सामुदायिक व्यवस्था में परिवर्तित हुई।

संरक्षण से समृद्धि तक

समिति ने पर्यटन को केवल आय का माध्यम नहीं, बल्कि संरक्षण का साधन बनाया। प्रवेश द्वार पर शुल्क काउंटर एवं समिति कार्यालय स्थापित किया गया, जहाँ स्थानीय युवा पर्यटकों का मार्गदर्शन और निगरानी करते हैं। वर्षा ऋतु में सुरक्षा की दृष्टि से जलकुंड में प्रवेश प्रतिबंधित रहता है तथा आवश्यक सुरक्षा व्यवस्थाएँ उपलब्ध कराई गई हैं। पर्यटन विभाग के सहयोग से ट्रेकिंग मार्ग, फुटब्रिज, रेलिंग, विश्राम स्थल, सौर प्रकाश, शौचालय और अन्य आधारभूत सुविधाएँ विकसित की गईं। आज स्थानीय युवाओं द्वारा संचालित नौ छोटे रेस्टोरेंट भी पर्यटकों को सेवाएँ प्रदान कर रहे हैं। इन रेस्टोरेंटों का आवंटन भी समिति द्वारा प्रतिवर्ष पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से स्थानीय युवाओं को निर्धारित शुल्क पर किया जाता है। आवंटियों के लिए जल प्रदूषण, स्वच्छता, अपशिष्ट प्रबंधन तथा पर्यावरण संरक्षण संबंधी समिति द्वारा निर्धारित सभी शर्तों का पालन अनिवार्य है। साथ ही, तीनों वन पंचायतों में प्रतिवर्ष स्थानीय चौड़ी पत्ती वाले वृक्षों का रोपण, चाल-खाल एवं कंटूर ट्रेंच निर्माण तथा वनों की निगरानी जैसे संरक्षण कार्य नियमित रूप से किए जाते हैं।

वर्ष 2018 में प्रवेश शुल्क मात्र ₹10 था। लगभग 3,500 पर्यटकों से समिति की कुल आय लगभग 35,000 रुपए हुई। बेहतर प्रबंधन और बढ़ती लोकप्रियता के कारण आज प्रवेश शुल्क 60 रुपए है तथा वर्ष 2025 में पर्यटक शुल्क एवं अन्य गतिविधियों से समिति की वार्षिक आय लगभग 50 लाख रुपए तक पहुंच गई। पर्यटकों की संख्या भी बढ़कर लगभग एक लाख प्रतिवर्ष हो गई है। उल्लेखनीय है कि स्थानीय निवासियों से आज भी कोई प्रवेश शुल्क नहीं लिया जाता।

भालूगाड़ मॉडल की सबसे बड़ी विशेषता इसकी आय का पारदर्शी उपयोग है। कुल आय का 40 प्रतिशत जिला पर्यटन विकास परिषद को, 15 प्रतिशत संबंधित वन पंचायतों को वृक्षारोपण, जल संरक्षण एवं स्थानीय विकास के लिए तथा शेष 45 प्रतिशत रखरखाव, सफाई, सुरक्षा, स्थानीय कर्मचारियों के मानदेय और अन्य सामुदायिक कार्यों पर व्यय किया जाता है। इस प्रकार पर्यटन से प्राप्त आर्थिक लाभ का एक हिस्सा पुनः प्राकृतिक संसाधनों और स्थानीय समुदाय में निवेश होता है, जो पीईएस की भावना का व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करता है।

प्रकृति की सेवाएँ: क्या उनका भी मूल्य है?

भालूगाड़ की कहानी एक मूलभूत प्रश्न उठाती है—क्या प्रकृति द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं का आर्थिक मूल्य होना चाहिए? स्वच्छ जल, कार्बन अवशोषण, मृदा संरक्षण, जैव विविधता, परागण तथा सांस्कृतिक एवं पर्यटन सेवाएँ प्राकृतिक पूँजी की अमूल्य देन हैं, किंतु इनके संरक्षण का दायित्व निभाने वाले समुदायों को प्रायः प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ नहीं मिलता। यही कारण है कि विश्वभर में PES की अवधारणा तेजी से विकसित हुई है।

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में इसका महत्व और भी अधिक है। राज्य का लगभग आधा भाग वनाच्छादित है तथा 11 हजार से अधिक वन पंचायतें सामुदायिक वन प्रबंधन की समृद्ध परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये वन केवल स्थानीय समुदायों को जल, चारा और लघु वनोपज ही नहीं देते, बल्कि गंगा बेसिन की जल सुरक्षा, कार्बन संचयन और जैव विविधता संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। इसी कारण संयुक्त राष्ट्र ने नेचर बेस्ड सॉल्यूशन को जलवायु परिवर्तन और जल संकट के प्रभावी समाधानों में स्थान दिया है।

विश्व के अनेक देशों में PES के अंतर्गत जल संरक्षण, कार्बन भुगतान, जैव विविधता संरक्षण और पर्यटन राजस्व साझाकरण जैसी व्यवस्थाएँ विकसित की जा रही हैं। भारत में हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित ऊच–कूहन जलागम (डाउन टू अर्थ, 29 जुलाई 2019) का उदाहरण बताता है कि जलागम संरक्षण से लाभान्वित समुदाय संरक्षण कार्यों में आर्थिक योगदान दे सकते हैं। भालूगाड़ में भी पर्यटन से प्राप्त आय का एक भाग वन पंचायतों और संरक्षण कार्यों में पुनर्निवेश कर इसी दिशा में एक व्यावहारिक आधार तैयार किया गया है।

भारत की हरित अर्थव्यवस्था और हिमालय

भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन तथा अतिरिक्त कार्बन सिंक विकसित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसी दिशा में ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम और भारतीय कार्बन बाजार जैसी पहलें प्रारम्भ हुई हैं। किंतु हिमालयी राज्यों के लिए यह आवश्यक है कि केवल नए वृक्षारोपण ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक वनों, झरनों, जलागम क्षेत्रों और वन पंचायतों द्वारा प्रदान की जा रही पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को भी समान महत्व मिले। यदि भविष्य की नीतियों में इन सेवाओं का वैज्ञानिक मूल्यांकन और आर्थिक प्रोत्साहन सुनिश्चित किया जाए, तो भालूगाड़ जैसा मॉडल संरक्षण, आजीविका और हरित अर्थव्यवस्था को एक साथ आगे बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन सकता है।

भालूगाड़ की सबसे बड़ी सीख यही है कि जंगलों को विकास में बाधा नहीं, बल्कि प्राकृतिक पूँजी के रूप में देखा जाए। जब पर्यटन से प्राप्त आय पुनः जंगलों, जलस्रोतों और स्थानीय समुदाय में निवेश होती है, तब संरक्षण स्वयं स्थानीय अर्थव्यवस्था की आधारशिला बन जाता है।

भालूगाड़ से सीखता हिमालय: संरक्षण से समृद्धि की ओर

भालूगाड़ की कहानी केवल एक जलप्रपात या सफल पर्यटन स्थल की नहीं, बल्कि ऐसे विकास मॉडल की है जिसमें प्रकृति, समाज और अर्थव्यवस्था एक-दूसरे के पूरक हैं। आज हिमालय जलवायु परिवर्तन, सूखते झरनों, वनाग्नि, भूस्खलन और बढ़ते पर्यटन दबाव जैसी अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। इन परिस्थितियों में संरक्षण को केवल सरकारी कार्यक्रम न मानकर स्थानीय समुदायों की भागीदारी और आजीविका से जोड़ना होगा। भालूगाड़ ने यही करके दिखाया है। स्थानीय लोगों ने समझा कि जलप्रपात का अस्तित्व उसके जलागम क्षेत्र और ऊपर फैले वनों पर निर्भर है। इसलिए संरक्षण उनके लिए केवल पर्यावरणीय दायित्व नहीं, बल्कि आर्थिक आवश्यकता भी बन गया। यही सोच इस मॉडल की सबसे बड़ी शक्ति है।

वन पंचायतें: उत्तराखंड की सबसे बड़ी संस्थागत पूंजी

उत्तराखंड की वन पंचायतें सामुदायिक वन प्रबंधन की एक अद्वितीय व्यवस्था हैं। आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों, भू-स्थानिक सूचना प्रणाली (जीआईएस), ड्रोन निगरानी, जलागम प्रबंधन, कार्बन आकलन तथा जैव विविधता मॉनिटरिंग के साथ इन्हें सशक्त बनाकर स्थानीय स्तर पर नेचर बेस्ड सॉल्यूशन के प्रभावी क्रियान्वयन का आधार बनाया जा सकता है। साथ ही, उनकी सफलता का मूल्यांकन केवल वृक्षारोपण से नहीं, बल्कि झरनों के पुनर्जीवन, वनाग्नि में कमी, प्राकृतिक पुनर्जनन, जैव विविधता संरक्षण, हरित रोजगार तथा संरक्षण में पुनर्निवेश जैसे परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए। ऐसी व्यवस्था भविष्य में पीईएस को व्यवहारिक आधार प्रदान कर सकती है।

हिमालयी समाज में महिलाएं जल, वन और लघु वनोपज प्रबंधन की प्रमुख आधारशिला हैं। वहीं युवाओं के लिए प्रकृति गाइड, जैव विविधता मॉनिटर, स्प्रिंग-शेड प्रबंधक, कार्बन आकलन सहयोगी, ड्रोन ऑपरेटर और स्थानीय हरित उद्यमी जैसे नए अवसर विकसित किए जा सकते हैं। इससे संरक्षण और आजीविका का संबंध और मजबूत होगा।

नीतिगत स्तर पर आवश्यकता है कि ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम, भारतीय कार्बन बाजार तथा मिशन लाइफ जैसी पहलों को हिमालयी परिस्थितियों के अनुरूप प्राकृतिक वनों, वन पंचायतों, जलागम संरक्षण और समुदाय-आधारित इको-टूरिज्म से जोड़ा जाए। इससे उत्तराखंड जैसे राज्यों में संरक्षण और हरित विकास को नई गति मिल सकती है।

निष्कर्ष

भालूगाड़ यह संदेश देता है कि संरक्षण और विकास परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। जब प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन स्थानीय समुदायों की भागीदारी, वैज्ञानिक ज्ञान और पारदर्शी संस्थागत व्यवस्था के साथ किया जाता है, तब जंगल केवल संरक्षित नहीं रहते, बल्कि जल सुरक्षा, स्थानीय अर्थव्यवस्था और जलवायु अनुकूल विकास की आधारशिला बन जाते हैं।

भारत हरित विकास और जलवायु प्रतिबद्धताओं की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में उत्तराखंड की वन पंचायतें, जैव विविधता प्रबंधन समितियाँ, महिला समूह, युवा संगठन और वैज्ञानिक संस्थान मिलकर एक ऐसा हिमालयी मॉडल विकसित कर सकते हैं, जो संरक्षण को आर्थिक समृद्धि से जोड़ते हुए अन्य पर्वतीय राज्यों के लिए भी प्रेरक उदाहरण बने।

आभार: लेखक भालूगाड़ जलप्रपात समिति का बैठक हेतु समय प्रदान करने तथा आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने के लिए हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं।