आंध्र प्रदेश में जब्त किए गए लाल चंदन के लट्ठे। फोटो: आंध्र प्रदेश वन विभाग 
जंगल

तिरुपति तीर्थ मार्ग पर भीड़भाड़ की वजह से 'आसान' हुई लाल चंदन की तस्करी

यह बहुमूल्य लकड़ी मुख्य रूप से चीन और अन्य एशियाई देशों में निर्यात की जाती है

Deepanwita Gita Niyogi

  • आंध्र प्रदेश के शेषाचलम रिजर्व में लाल चंदन की तस्करी तीर्थयात्रियों की भीड़ के कारण बढ़ी है

  • तस्कर वाहनों की जांच से बचकर लकड़ी को समुद्री मार्ग से बाहर भेजते हैं

  • वन विभाग ने तस्करों से निपटने के लिए सुरक्षा बढ़ाई है

  • स्थानीय लोगों की मिलीभगत से तस्कर पहचान से बचते हैं, जिससे यह एक संगठित रैकेट बन गया है

  • यह बहुमूल्य लकड़ी मुख्य रूप से चीन और अन्य एशियाई देशों में निर्यात की जाती है

  • वन विभाग और पुलिस ने तस्करी रोकने के लिए संयुक्त टास्कफोर्स का गठन किया ह।

तीर्थ नगरी तिरुपति के पास होने के कारण आंध्र प्रदेश के संरक्षित क्षेत्र में स्थित लाल चंदन का सबसे बड़ा भंडार तस्करों के लिए आसान निशाना बन गया है। आधिकारिक सूत्रों ने डाउन टू अर्थ को यह जानकारी दी।

यह बहुमूल्य वृक्ष प्रजाति दक्षिणी आंध्र प्रदेश के तीन जिलों चित्तूर, नेल्लोर और वाईएसआर कडपा की स्थानिक (एंडेमिक) प्रजाति है। इसका सबसे बड़ा भंडार शेषाचलम बायोस्फीयर रिजर्व में पाया जाता है, जो एक संरक्षित क्षेत्र है और पूर्वी घाट के परिदृश्य का हिस्सा है। यह रिजर्व 4,755 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है।

शेषाचलम चित्तूर और वाईएसआर कडपा जिलों में फैला है और तिरुपति के काफी निकट स्थित है (मंदिर शेषाचलम पहाड़ियों से लगभग 35 किलोमीटर दूर है)।

दक्षिणी आंध्र प्रदेश के कौंडिन्य वन्यजीव अभयारण्य में हाथी प्रबंधन से जुड़े एक सूत्र ने डाउन टू अर्थ को बताया, “चूंकि यह एक तीर्थ क्षेत्र है, यातायात की भीड़ के कारण वाहनों की अक्सर ठीक से जांच नहीं हो पाती। तस्कर इस स्थिति का फायदा उठाते हैं। लकड़ी को मुख्य रूप से समुद्री मार्ग से भारत के बाहर निर्यात किया जाता है।”

लाल चंदन एक धीमी गति से बढ़ने वाली प्रजाति है, जिसे परिपक्व होने में 25–40 वर्ष लगते हैं। 1972 के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत संरक्षित यह प्रजाति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तस्करी की जाती है, मुख्य रूप से चीन और अन्य एशियाई देशों में।

वन क्षेत्र में केवल संवेदनशील स्थानों पर ही चेक पोस्ट मौजूद हैं और जंगल में प्रवेश के कई रास्ते हैं।

अवैध लकड़ी जब्त करने के लिए समय-समय पर छापेमारी होती रहती है। 9 जनवरी 2026 को आंध्र प्रदेश वन विभाग को एक सूचना मिली, जिसके आधार पर 75 लाल चंदन की लकड़ियां जब्त की गईं। इन्हें बाद में तिरुपति स्थित लाल चंदन गोदाम में जमा कराया गया, जहां इन्हें सुरक्षित रखा जाता है। कडपा वन प्रभाग में तैनात वन क्षेत्राधिकारी नईम अली ने यह जानकारी दी।

अधिकारी ने बताया कि पुलिस और वन विभाग ने वर्ष 2014 में ही एक संयुक्त टास्कफोर्स का गठन किया था। तस्करों द्वारा दो वन अधिकारियों की हत्या के बाद वन विभाग के कर्मचारियों को सुरक्षा के लिए हथियार भी जारी किए गए।

पहले स्थानीय जनजाति यनाडी के लोग इस तस्करी रैकेट में अधिकतर शामिल थे। लेकिन अब अधिकतर तस्कर तमिलनाडु से आते हैं और सीमा पार कर आंध्र प्रदेश में प्रवेश करते हैं। सूत्रों के अनुसार, तस्कर कभी-कभी स्थानीय लोगों की मिलीभगत से दिहाड़ी मजदूर या तीर्थयात्री का वेश धारण कर लेते हैं, जिससे उनकी पहचान करना कठिन हो जाता है। तमिलनाडु से सटे दक्षिणी मार्ग पर भारी यातायात होने के कारण कई बार वे जांच से बच निकलते हैं।

शेषाचलम दक्षिणी आंध्र प्रदेश के रायालसीमा क्षेत्र में स्थित है, जिसकी सीमा तमिलनाडु से लगती है। तिरुपति के एक वन अधिकारी, जिन्होंने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बात की, ने बताया कि तस्कर स्थानीय लोगों से सूचना मिलने पर बड़ी संख्या में जंगल में प्रवेश करते हैं और कई दिनों तक वहीं डेरा डाले रहते हैं।

उन्होंने कहा, “लाल चंदन की लकड़ी अन्य इमारती लकड़ी जैसे सागौन की तुलना में कुछ भंगुर होती है, लेकिन विदेशों में इसकी भारी मांग है। पहले तस्कर जंगल में घुसकर पेड़ काटते हैं, फिर दूसरा दल लकड़ी को बाहर ले जाने का काम करता है। यह एक संगठित रैकेट है और कभी-कभी एक घंटे के भीतर कई पेड़ काट दिए जाते हैं।”

अवैध कटाई

भारत वन क्षेत्रफल के लिहाज से दुनिया के शीर्ष 10 वन-समृद्ध देशों में शामिल है और जैव विविधता की दृष्टि से एक विविधता भरा देश है। वन कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते हैं और जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके बावजूद, देश में वनों की कटाई चिंताजनक गति से हो रही है। इसके प्रमुख कारणों में से एक अवैध लकड़ी कटाई है। विशेष रूप से लाल चंदन जैसी बहुमूल्य प्रजातियां, जो साइट्स के तहत विनियमित हैं, तस्करों के निशाने पर रहती हैं।

शेषाचलम के भीतर लाल चंदन का क्षेत्र मध्य आंध्र प्रदेश से लेकर दक्षिण में कौंडिन्य वन्यजीव अभयारण्य तक फैला है, जो एशियाई हाथियों के लिए जाना जाता है। राज्य के मध्य भाग में पर्णपाती वन पाए जाते हैं और लाल चंदन एक उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वृक्ष है। जब वन अधिकारी लकड़ी माफिया को रोकने की कोशिश करते हैं, तो अक्सर गोलीबारी की घटनाएं भी होती हैं।

पूरे भारत में लकड़ी का अवैध व्यापार माफिया के माध्यम से संचालित होता है। कोविड-19 महामारी के दौरान लॉकडाउन के कारण निगरानी की कमी से ऐसे नेटवर्कों को पनपने का अवसर मिला। वन कर्मचारियों की कमी भी आपराधिक गतिविधियों पर नजर रखने में बाधा बनती है।

कभी-कभी तस्करों से निपटने के लिए अंतरराज्यीय सहयोग भी किया जाता है। वर्ष 2022 में मध्य प्रदेश के सेंधवा वन प्रभाग ने पड़ोसी महाराष्ट्र के साथ मिलकर लकड़ी काटने की मशीनें, लट्ठे और अवैध फर्नीचर जब्त किए थे। हालांकि, अत्यधिक अतिक्रमण के कारण सेंधवा में घना वन क्षेत्र नहीं है, फिर भी यह सीमा पार अवैध लकड़ी आपूर्ति का एक ट्रांजिट हब बन गया था।

मध्य भारत के सेंधवा और दक्षिण के शेषाचलम, दोनों ही मामलों में अंतरराज्यीय सीमाएं अवैध लकड़ी नेटवर्क को फलने-फूलने में मदद करती हैं। सेंधवा के मामले में अवैध सागौन की लकड़ी मुख्य सड़कों से बचते हुए मोटरसाइकिलों के जरिए वन मार्गों से पहुंचाई जाती है, ताकि गिरफ्तारी से बचा जा सके। वहीं, लाल चंदन के मामले में तस्कर लकड़ी को सिर पर ढोते हैं, उसे जंगल के भीतर या कभी-कभी पानी के नीचे एक-दो दिन तक छिपाकर रखते हैं और चेक पोस्ट से बचने के लिए लंबा रास्ता अपनाते हैं।

उक्त सूत्र ने बताया, “तस्करी के अलग-अलग रास्ते हैं और तिरुपति का तीर्थ मार्ग अधिक पसंद किया जाता है, क्योंकि यह जंगल के पास है। छोटे वाहनों का इस्तेमाल करके खेप को प्रमुख बंदरगाहों तक पहुंचाया जाता है। पहाड़ी क्षेत्र भी तस्करों के लिए फायदेमंद है। जांच में चूक हो जाती है और कभी-कभी लकड़ी को दूध के कंटेनरों के भीतर अच्छी तरह छिपा दिया जाता है।”

जलवायु संबंधी चिंताएं

अवैध लकड़ी कटाई वनों की कटाई और संघर्षों को बढ़ावा देती है, खासकर ऐसे समय में जब बदलती जलवायु के दौर में कार्बन अवशोषण को एक महत्वपूर्ण शमन उपाय के रूप में विभिन्न मंचों पर रेखांकित किया जा रहा है।

यह स्थिति विशेष रूप से इंडोनेशिया में देखने को मिलती है, जहां दुनिया में वनों की कटाई की दर सबसे अधिक है। रिपोर्टों के अनुसार, देश के मूल वन आवरण का अब आधे से भी कम हिस्सा शेष रह गया है। हालांकि आकलन अलग-अलग हैं, लेकिन रूढ़िवादी अध्ययनों के मुताबिक हर वर्ष इंडोनेशिया में 10 लाख हेक्टेयर (24 लाख एकड़) से अधिक वर्षावन साफ कर दिए जाते हैं। इसमें लगभग 70 प्रतिशत कटाई खनिज मिट्टी वाले वनों में और 30 प्रतिशत कार्बन-समृद्ध पीटलैंड वनों में होती है।

यूनाइटेड किंगडम स्थित रेनर टेगटमेयर ने कहा, “लकड़ी को तभी कानूनी माना जाना चाहिए जब उसका उत्पादन संबंधित देश के कानूनों और नियमों के अनुसार हुआ हो। लेकिन यदि किसी क्षेत्र की कटाई की अनुमति उस जमीन पर दी गई हो जिसे पारंपरिक या आदिवासी समुदायों से छीना गया हो, तो भले ही वह देश के संविधान के अनुरूप हो, वह कानूनी तो है, पर नैतिक नहीं है। क्योंकि यह अनुमति आदिवासी समुदायों के पारंपरिक और मानवाधिकारों का उल्लंघन करके दी गई है। इसलिए ‘वैधता’ की परिभाषा उस भूमि के वास्तविक अधिकारधारकों के अधिकारों तक नहीं पहुंचती, जहां से लकड़ी ली गई है।”

टेगटमेयर कई वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन ग्लोबल विटनेस के साथ काम कर चुके हैं और वानिकी संघर्षों पर जांच कर चुके हैं।

भारत के संदर्भ में 1980 के बाद से देश ने विकास गतिविधियों के लिए 15 लाख हेक्टेयर वन भूमि का रूपांतरण किया है और इसका अधिकांश नुकसान वर्ष 2000 के बाद हुआ है। यह जानकारी ग्लोबल फॉरेस्ट वाच की रिपोर्ट में दी गई है, जो विश्व के वनों की निगरानी करने वाला एक ओपन-सोर्स वेब अनुप्रयोग है।

भारत में लकड़ी की उच्च घरेलू मांग अक्सर अवैध लकड़ी बाजार को बढ़ावा देती है। भारत दुनिया के सबसे बड़े लकड़ी आयातकों में भी शामिल है। सागौन जैसी टिकाऊ लकड़ी की दिल्ली, राजस्थान और उत्तराखंड में भारी मांग है। जब सेंधवा में कई छापेमारी हुई थीं, तब वहां पहले से ही बड़ी मात्रा में लकड़ी के लट्ठे जमा किए जा चुके थे।

संरक्षित वन क्षेत्र के भीतर लाल चंदन की कटाई और दोहन की अनुमति नहीं है। हालांकि, आरक्षित वन क्षेत्र के बाहर वन विभाग द्वारा नियंत्रित पौधारोपण क्षेत्र हैं, जहां वैध व्यापार की व्यवस्था है। जब्त की गई लकड़ी की बिक्री साइट्स के प्रावधानों के तहत विशेष और नियंत्रित निर्यात के माध्यम से की जा सकती है।

पिछले वर्ष राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने आंध्र प्रदेश राज्य जैव विविधता बोर्ड को लाल चंदन संरक्षण के लिए 82 लाख रुपए की स्वीकृति दी। इस पहल का उद्देश्य 1 लाख पौधे तैयार करना है, जिन्हें किसानों को उपलब्ध कराया जाएगा।