उत्तराखंड के हेमकुंड साहिब और फूलों की घाटी के बेसकैंप घांघरिया से करीब 23 किलोमीटर पैदल दूरी और करीब 7 किलोमीटर हवाई दूरी पर, गोविंदघाट रेंज में, समुद्र तल से 3,500 मीटर ऊंचाई पर नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान के भीतर लगी आग सामान्य तो कतई नहीं ही थी।
9 जनवरी को बद्रीनाथ वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी सर्वेश दुबे को इसकी सूचना मिली तो वे चौंक गए, “मेरे अनुभव में इस इलाके में पिछले 10 वर्षों में कोई आग नहीं लगी। हमने इसका हवाई सर्वेक्षण किया। करीब 70-80 डिग्री की खड़ी चढ़ाई का चट्टानी इलाका है”।
डीएफओ राहत जताते हैं कि सर्दियों की वनाग्नि ज्यादा ज्वलनशील नहीं होती, “लेकिन यही आग मई-जून के महीने में लगी होती तो क्राउन फायर का रूप ले सकती थी”। यानी जब आग जंगल की जमीन से उपर उठकर पेड़ों की चोटी तक फैल जाती है और बेहद तीव्र होती है।
समुद्रतल से करीब 3,000 मीटर ऊंचाई पर, और नदी दल से लगभग 1,500 मीटर की खड़ी ऊंचाई पर, करीब 6 दिनों तक जंगल धधकते रहे और वनाग्नि पर नियंत्रण के लिए भेजे गए दो दल विषम भौगोलिक परिस्थितियों के चलते बेबस रहे।
डीएफओ सर्वेश दुबे ने बताया कि 9 जनवरी को प्रभावित क्षेत्र के अत्यधिक चट्टानी, खड़ी ढलान और ऊपर से पत्थर गिरने की संभावना को देखते हुए टीम को वापस लौटना पड़ा। अगले दिन लक्ष्मण गंगा नदी पर अस्थायी पुल बनाकर भ्यूंडार वन बीट तक टीम पहुंची।
11 जनवरी को एक टीम यहं जमे हुए झरने के नजदीक पहुंची और दूसरी टीम ने ड्रोन से सर्वेक्षण किया। फिर 12 जनवरी को भ्यूंडार से दुर्गम रास्तों को पारकर टीम सिमरतोली तक पहुंची। 13 जनवरी को यहां स्थित पुलना गांव की महिला मंगल दल और ग्रामीणों की मदद से वन विभाग कर्मचारियों ने भ्यूंडार- द्वितीय वन बीट में प्रवेश किया। लेकिन बेहद विषम परिस्थितियां होने के कारण टीम को वापस लौटना पड़ा।
इस समय तक वनाग्नि धीरे-धीरे कम हो रही थी।
नंदादेवी बायोस्फीयर रिजर्व सर्कल के जिस जंगल में आग लगी थी, वहां से फूलों की घाटी और हेमकुंड साहिब के बीच लक्ष्मण गंगा और पुष्पावती नदियां बहती हैं। इन नदियों का जल प्रवाह अधिक है और यही फायर लाइन का काम करती हैं। जिससे आग आगे नहीं बढ़ पाती है।
डीएफओ विचार करते हैं, “जिस ऊंचाई पर आग लगी वहां पहुंचना बहुत मुश्किल है। आसपास कोई गांव भी नहीं। मेरा अनुमान है कि ये आग प्राकृतिक तौर पर लगी। इतनी ऊंचाई पर जाकर कोई आग कैसे लगाएगा”।
चमोली के पीपलकोटी में ग्रामीण विकास और आजीविका के लिए कार्य कर रहे जेपी मैठाणी आश्चर्यचकित हैं, “ऐसा पहली बार हुआ है कि जंगलों में आग उच्च हिमालयी क्षेत्र से शुरू हुई है। बल्कि निचले क्षेत्रों की तुलना में ऊंचाई पर आग ज्यादा लगी।”
“पहले जंगल की आग नीचे के क्षेत्र से ऊपर की ओर जाती थी लेकिन इस बार आग ऊपरी क्षेत्र में लगनी शुरू हुई। आजकल वनों में नमी बिलकुल नहीं है। सर्दियों में बारिश और बर्फ़बारी न होने से छोटे-बड़े गाड-गदेरे सूख गए हैं। इनमें पानी रहता है तो आग इनके पार नहीं जा पाती। दोपहर की धूप भी बेहद चटक है”, मैठाणी आगे कहते हैं।
ट्रांस-ग्लेशियल जोन में वनाग्नि
देहरादून स्थित वाडिया भू विज्ञान संस्थान के ग्लेशियोलॉजिस्ट डॉ मनीष मेहता चिंता जताते हैं, “चमोली में नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान में जहां वनाग्नि की घटनाएं हुईं वो ट्रांस-ग्लेशियल जोन (3,500 मीटर से अधिक ऊंचाई) में आता है। इसके आगे ऊंचाई के साथ वास्तविक ग्लेशियर क्षेत्र शुरू होता है। इस भौगोलिक क्षेत्र में भ्यूंडार घाटी, काकभुशुंडी ताल और हाथी-घोड़ी पर्वत से लगते उच्च हिमालयी इलाके शामिल हैं, जो ग्लेशियर के नजदीक स्थित हैं और यहां से ग्लेशियल क्षेत्र की शुरुआत मानी जाती है।”
उनके मुताबिक इससे ग्लेशियर की सतह पर ब्लैक कॉर्बन डिपॉजिट होने की संभावना बढ़ जाती है। जिसका असर इनके पिघलने की रफ्तार पर पड़ता है।
क्या ऊंचाई की ओर बढ़ रहा है वनाग्नि का दायरा?
फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया वनाग्नि की बड़ी घटनाओं की जानकारी साझा करता है। इसके मुताबिक 21 जनवरी को नंदा देवी फॉरेस्ट डिविजन में फूलों की घाटी वन रेंज में जंगल आग की चपेट में रहे। इसके अलावा भी राज्य के तकरीबन सभी पर्वतीय जिलों में वनाग्नि दर्ज की जा रही है।
उत्तराखंड वन विभाग की वनाग्नि रिपोर्ट के मुताबिक इस साल की शुरुआत से 20 जनवरी 2026 अपेक्षाकृत ऊंचाई वाले इलाकों में ही आग की घटनाएं दर्ज हुईं। दर्ज की गई वनाग्नि की 47 घटनाओं में से 27 केदारनाथ वाइल्डलाइफ सेंचुरी डिवीजन में दर्ज हुईं।
बद्रीनाथ वन प्रभाग में छह, अलकनंदा क्षेत्र में एक, देहरादून के चकराता वन प्रभाग में छह और उत्तरकाशी के टोन्स में सात वनाग्नि घटनाएं दर्ज हुई हैं। इन घटनाओं में 19 हेक्टेअर से ज्यादा जंगल आग की चपेट में आए। यानी तकरीबन 26-27 फुटबॉल मैदानों के बराबर क्षेत्र जला।
आमतौर पर उत्तराखंड में 2,000 मीटर और उससे नीचे के क्षेत्रों में वनाग्नि की घटनाएं सामान्य थीं, लेकिन इस बार 3,000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर नंदादेवी राष्ट्रीय उद्यान के वन आग की चपेट में आए।
इसके साथ ही केदारनाथ वाइल्ड लाइफ सेंचुरी के जंगल भी भीषण वनाग्नि की चपेट में आए। सेंचुरी समुद्र तल से 1,100 से 7,000 मीटर से अधिक ऊंचाई तक फैली है। सेंचुरी के उप प्रभागी अधिकारी मोहन सिंह के मुताबिक यहां 2,300 मीटर ऊंचाई पर स्थित वनों में आग लगी।
हिमालयी वनों की पारिस्थितकीय के विशेषज्ञ, शोधकर्ता और गढ़वाल विश्वविद्यालय के पूर्व वाइस चांसलर प्रोफेसर एसपी सिंह कहते हैं, “नंदादेवी राष्ट्रीय उद्यान और केदारनाथ वाइल्ड लाइफ सेंचुरी में लगी ज्यादातर आग 3,000 मीटर से उपर स्थित हिमालयी क्षेत्रों में घास के मैदानों में लगी है”। वह इसकी वजह बताते हैं।
मानसून के बाद से असामान्य सूखा पड़ा है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बर्फ़ नहीं गिरी। इसलिए नमी भी कम रहने का अनुमान है। यहां पायी जाने वाली डेंथोनिया कैश्मिरियाना जैसी तीन-चार फीट ऊंची सूखी घास आग के लिए ईधन का काम कर रही है। ये आमतौर पर सर्दियों में बर्फ़ से ढकी रहती है। इसके साथ ही ट्री लाइन से उपर पायी जाने वाली रोडोडेंड्रोन कैम्पिलेटम जैसी झाड़ी हरी होने पर भी बहुत ज्वलनशील होती है।
इन मौसमी परिस्थितियों के चलते केदारनाथ वाइल्ड लाइफ सेंचुरी और नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान में घास के सूखे मैदान ईधन के स्रोत का कार्य कर रहे हैं और वहां से शुरू होकर आग नीचे की ओर बढ़ रही है।
तापमान अधिक होने के साथ-साथ कम आर्द्रता भी मौसमी परिस्थितियों को आग के लिहाज से संवेदनशील बना रही है। नंदादेवी के पास गोविंदघाट, फूलों की घाटी रेंज में आर्द्रता का स्तर इस समय 20-25 प्रतिशत तक का है। आर्द्रता हवा में मौजूद नमी या जलवाष्प की मात्रा को कहते हैं, जो मौसम और तापमान के अनुभव को सीधे प्रभावित करती है।
सिंह कहते हैं, आमतौर पर उच्च हिमालयी क्षेत्रों में सर्दियों में आर्द्रता का स्तर 50 प्रतिशत से अधिक रहता है। ये सभी परिस्थितियां ऊंचाई वाले क्षेत्रों को वनाग्नि के लिए संवेदनशील बना रही हैं।
वह कहते हैं, “उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पहले भी इक्का-दुक्का आग की घटनाएं होती थीं। लेकिन इस वर्ष की आग जैसी तीव्रता नहीं रही कि जंगल कई दिनों तक जलते रहें और धुआं छा जाए।”
बीते 100 दिनों में कोई बारिश नहीं, अब अलर्ट
चमोली के डीएफओ सर्वेश कुमार दुबे याद करते हैं, “8 अक्टूबर को इस क्षेत्र में आखिरी बारिश दर्ज हुई थी। बारिश हुए 100 दिन से ज्यादा बीत चुके हैं”। बारिश और बर्फ़बारी न होने की वजह से उच्च हिमालयी क्षेत्र में मौसम बेहद शुष्क बना हुआ है।
मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक मानसून के बाद अक्टूबर से दिसंबर के बीच 24% कम बारिश हुई। जबकि दिसंबर में न कोई बारिश हुई, न बर्फ़ गिरी। बारिश और बर्फ़ का ये सूखा जनवरी के तीसरे हफ़्ते तक जारी है। जबकि 23 जनवरी को राज्य के पर्वतीय जिलों में भारी बारिश और बर्फबारी का औरेंज अलर्ट जारी किया गया है। 24 को भी कुछ बारिश मिलने के आसार हैं।
दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में जोखिम भरे वनों की निगरानी का संकट और स्टाफ की कमी से जूझ रहे वन विभाग के साथ, वन, वन्यजीवों और ग्रामीण सभी बेसब्री से बारिश का इंतज़ार कर रहे हैं। ताकि कुछ राहत मिले।