पल्की गांव को 2023 में सामुदायिक वन अधिकार प्रदान किए गए थे, जिसके बाद गांव वालों ने बांस की कटाई और बिक्री शुरू कर दी है, जो ओडिशा का एक महत्वपूर्ण वन उत्पाद है फोटो: निधि जमवाल
जंगल

केंदू पत्तों के व्यापार पर विवाद: ग्राम सभाओं की जीत के बाद भी सवाल बाकी

ओडिशा में केंदू पत्तों के परिवहन और व्यापार को लेकर हुआ हालिया विवाद राज्य में वन अधिकार कानूनों की अलग-अलग व्याख्याओं को उजागर करता है

Nidhi Jamwal

  • ओडिशा के कालाहांडी में केंदू पत्तों के व्यापार को लेकर ग्राम सभाओं और वन विभाग के बीच विवाद ने वन अधिकार अधिनियम की प्रासंगिकता को उजागर किया।

  • ग्राम सभाओं ने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी और ट्रांजिट परमिट के अधिकार की औपचारिक मान्यता की मांग की।

  • कालाहांडी में वन अधिकारियों द्वारा जब्त किए गए ट्रक को न्यायिक आदेश पर वापस प्राप्त करना ग्राम सभाओं के लिए एक बड़ी जीत माना जा रहा है।

  • यह मामला वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत ग्राम सभाओं के अधिकारों की पुष्टि करता है।

ओडिशा के एक आदिवासी-बहुल जिले कालाहांडी में अक्टूबर के पहले सप्ताह में जश्न का माहौल था। लगभग चार महीने बाद कोकसारा तहसील के बोरापाडर और पीपल छप्पर गांवों की ग्राम सभाओं को उनके पास से जब्त किए गए केंदू के पत्तों से लदे एक ट्रक का कब्जा वापस मिल गया।

ट्रक 24 सितंबर को कोकसारा में एक न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश पर छोड़ा गया, जो न केवल इन गांवों के लिए बल्कि अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (रिकॉग्निशन ऑफ फॉरेस्ट राइट्स) अधिनियम, 2006 (एफआरए) की भावना की रक्षा करने वालों के लिए भी एक जीत थी।

यह विवाद मई में शुरू हुआ जब धर्मगढ़ वन रेंज के अधिकारियों ने ट्रक को यह दावा करते हुए जब्त कर लिया कि बोरापाडर और पीपल छप्पर ग्राम सभाएं केंदू के पत्तों का “अवैध रूप से” परिवहन कर रही थीं।

तेंदू या डायोस्पाइरोस मेलनॉक्सिलोन के नाम से भी जाने जाने वाले केंदू पत्तों का उपयोग मुख्य रूप से बीड़ी बनाने के लिए किया जाता है और वे सरकार और स्थानीय समुदायों दोनों के लिए गैर-इमारती वन राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

ग्राम सभाओं का आरोप है कि उनके पास ट्रांजिट परमिट थे, किन्तु वन अधिकारियों ने उन्हें स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

ट्रक जब्त करने के बाद कालाहांडी ग्राम सभा महासंघ (केजीएसएम-120 ग्राम सभाओं का एक जिला-स्तरीय महासंघ है और जिनमें से 84 सभाएं केंदू का व्यापार करती हैं) की ओर से विरोध शुरू हो गया।

केजीएसएम ने यह तर्क देते हुए एक पुलिस शिकायत दर्ज की कि दोनों ग्राम सभाओं ने वन अधिकार संशोधन नियम, 2012 के तहत आने वाले सभी प्रोटोकॉल का पालन किया था।

नियम निर्दिष्ट करते हैं कि एमएफपी (लघु वन उपज) के लिए पारगमन परमिट ग्राम सभा द्वारा स्थापित सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन समिति या किसी अधिकृत व्यक्ति द्वारा जारी किए जाने चाहिए। केजीएसएम के सदस्य जतिराम नाइक कहते हैं, “हम अपने अधिकारों का प्रयोग कर रहे हैं। केंदू पत्तों को जब्त करना हमारे अधिकारों और हमारी ग्राम सभाओं की संप्रभुता का उल्लंघन था।”

केजीएसएम ने ट्रांजिट परमिट जारी करने के लिए ग्राम सभाओं के अधिकार की औपचारिक मान्यता की भी मांग की है, खासकर यह देखते हुए कि वे केंदू और अन्य एमएफपी जैसे बांस और महुआ (मधुका लौन्गिफोलिया) के फूल और बीज जैसे सामुदायिक वन संसाधनों (सीएफआर) पर स्वामित्व रखते हैं।

एफआरए के तहत सीएफआर टाइटल वन-निवासी समुदायों को उनके पारंपरिक रूप से धारित वन क्षेत्र के संसाधनों के प्रबंधन, संरक्षण और संधारणीय उपयोग का अधिकार देते हैं।

जब डाउन टू अर्थ ने जुलाई में कालाहांडी दक्षिण प्रभाग के प्रभागीय वन अधिकारी (डीएफओ) कलाईवनन आर से मुलाकात की तो उन्होंने जोर देकर कहा, “हालांकि एफआरए ग्राम सभाओं को केंदू पत्तों का व्यापार करने की अनुमति देता है, लेकिन वन विभाग द्वारा सत्यापन के बिना ऐसा नहीं किया जा सकता है। अभी जो हो रहा है वह केंदू पत्तों की तस्करी है।”

उन्होंने आगे कहा, “कालाहांडी से केंदू पत्ते छत्तीसगढ़ जाते हैं जहां से उनकी बांग्लादेश तस्करी की जाती है। हमें बहुत सारी शिकायतें मिली हैं।” केजीएसएम ने ऐसे आरोपों को “वन अधिकारियों को एफआरए की समझ न होना “ कहकर खारिज कर दिया।

संघर्ष का मुद्दा

यह मामला ऐसे कई मामलों में से एक है जो ओडिशा में वन-निवासी समुदायों और वन विभाग के बीच केंदू पत्तों के प्रबंधन और व्यापार को लेकर तनाव को उजागर करता है। यह इलाका मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के बाद देश में एमएफपी का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है।

इससे पहले 2023 में कालाहांडी की कस्तूरपादार और खासीगुडा ग्राम सभाओं ने ग्रीन इंडिया नामक एक कंपनी को केंदू पत्तों को पश्चिम बंगाल के धूलियान तक ले जाने के लिए ट्रांजिट परमिट जारी किए थे।

कंपनी का ट्रक जिसमें 400 बोरियां थीं, उसे झारखंड के सिमडेगा वन प्रभाग के डीएफओ द्वारा जब्त कर लिया गया था। इसके बाद केजीएसएम ने कानूनी कार्रवाई की मांग करते हुए राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को पत्र लिखा।

ऐसी असुविधाएं अक्सर राज्य और केंद्र के कानूनों में अंतर्विरोध से उत्पन्न होती हैं। ओडिशा वन विकास निगम लिमिटेड (ओएफडीसी) के अनुसार, केंदू पत्ता राज्य में एक राष्ट्रीयकृत उत्पाद है जिसका अर्थ यह हुआ कि इसका संग्रह और व्यापार सरकार द्वारा विनियमित होता है।

ओडिशा तेंदू पत्ता (व्यापार नियंत्रण) अधिनियम, 1961 और इसके साथ के 1962 के नियम केवल सरकार या अधिकृत एजेंटों को नामित इकाइयों के भीतर तेंदू पत्तों को खरीदने या परिवहन करने की अनुमति देते हैं। और साथ ही डिपो के माध्यम से कीमतों और बिक्री को निर्धारित करने के लिए एक प्रणाली स्थापित करते हैं। ओएफडीसी पत्तों के विपणन का प्रभारी है।

यह अधिनियम एफआरए के उन प्रावधानों के विरुद्ध प्रतीत होता है जो वन-निवासी समुदायों को इन उत्पादों के स्वामित्व, संग्रह तक पहुंच, उपयोग और निपटान का अधिकार देकर लघु वन उत्पाद (एमएफपी) व्यापार के गैर राष्ट्रीयकरण को अनिवार्य करता है।

ओडिशा के जिन वन अधिकारियों से हमने बात की उनका कहना है कि ग्राम सभाएं एमएफपी का सीधे तभी व्यापार कर सकती हैं, जब उन गांवों में केंदू पत्ता व्यापार को विनियमन-मुक्त किया गया हो। लेकिन राज्य भर में विनियमन-मुक्ति असमान रही है।

आंकड़े दिखाते हैं कि कालाहांडी में भवानिपाटना केएल डिवीजन के केवल 19 गांवों (बोरापाडर और पीपल छप्पर गांव इस वन डिवीजन का हिस्सा नहीं हैं ) में ही विनियमन मुक्ति देखी गई है। कालैवनन कहते हैं “अन्य गांवों में व्यापार अभी भी वन विभाग द्वारा विनियमित होता है।”

दूसरी ओर ग्राम सभाओं का तर्क है कि चूंकि एफआरए पूर्ववर्ती राज्य कानूनों का स्थान लेता है, इसलिए उन्हें विनियमन-मुक्ति की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए और उन्हें केंदू पत्तों के निजी खरीदारों के साथ सीधे बातचीत करने का अधिकार होना चाहिए।

विकेंद्रीकरण जारी

भले ही ग्राम सभाएं और वन विभाग कानूनी आदेशों को लेकर असहमत हैं, फिर भी केजीएसएम वन-निवासी समुदायों को सीएफआर टाइटल प्राप्त करने में मदद कर रहा है ताकि वे अपने अधिकारों पर जोर दे सकें।

यह संस्था और इसके सात ब्लॉक स्तरीय महासंघ (मदनपुर रामपुर, लांजीगढ़, भवानीपाटना, जूनागढ़, कोकसारा, गोलामुंडा और जयपाटना में) सीएफआर टाइटल के लिए आवेदन करने और प्रावधानों को समझने से लेकर विकेंद्रीकृत शासन और सहभागी प्रबंधन के लिए मॉडल लागू करने तक सभी चरणों में गांवों का समर्थन करते हैं।

जूनागढ़ ब्लॉक के मिचासोला गांव की निवासी और केजीएसएम की कोषाध्यक्ष तिलमणि बेमाल कहती हैं, “कई अन्य चीजों के अलावा महासंघ ग्राम सभाओं को केंदू और बांस की बिक्री के लिए सीधे व्यापारियों के साथ सौदा करने में मदद करते हैं।”

निजी व्यापारी प्रति 50 पत्तों के लिए 7 रुपए देते हैं, जबकि वन विभाग 3.60 रुपए देता है। इस वर्ष कालाहांडी में 84 से अधिक ग्राम सभाओं ने केंदू व्यापारियों के साथ सीधे समझौते पर हस्ताक्षर किए।

बेमाल कहती हैं कि अकेले अप्रैल और मई में जिले ने ग्राम सभाओं के माध्यम से 4 करोड़ रुपए के केंदू पत्तों का व्यापार किया। इन लाभों को दर्शाते हुए जूनागढ़ ब्लॉक के रानापुर गांव की केंदू पत्ता तोड़ने वाली पार्वती सबर डाउन टू अर्थ को बताती हैं, “इस वर्ष मैंने नौ दिनों तक केंदू के पत्ते तोड़े और 7,000 रुपए कमाए। अगर हम वन विभाग की फाड़ी (केंदू संग्रह और बांधने का केंद्र) की तुलना में ग्राम सभा की फाड़ी को अपना माल बेचते हैं तो कहीं अधिक कमाते हैं।”

पल्की जैसे गांवों में बांस के व्यापार में भी इसी तरह के लाभ देखे जाते हैं। यह दूरस्थ पहाड़ी वन गांव कालाहांडी के लांजीगढ़ ब्लॉक में है और कुटिया कोंध (एक विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह- पीवीटीजी) के 61 परिवार यहां निवास करते हैं।

इस गांव को 2023 में सीएफआर प्रदान किया गया था और इसने केजीएसएम के तहत बांस का व्यापार करने के लिए इसका लाभ उठाया है। गांव की ग्राम सभा के सचिव आलोक माझी कहते हैं, “पिछले साल हमने 26 लाख रुपए मूल्य का बांस बेचा। इस साल अब तक 13 लाख रुपए की बिक्री हो चुकी है।”

ग्राम सभा केजीएसएम के राजस्व-साझाकरण मॉडल का अनुसरण करती है। बांस की बिक्री से होने वाली कमाई का एक-तिहाई हिस्सा उन निवासियों की श्रम लागत में जाता है जो उपज की कटाई करते हैं।

शेष दो-तिहाई ग्राम सभा द्वारा वन में विकास कार्यों (50 प्रतिशत), गांव (30 प्रतिशत), रिकॉर्ड रखने वाले निवासी के वेतन (10 प्रतिशत) के रूप में और ब्लॉक तथा जिला महासंघों को योगदान (प्रत्येक को 5 प्रतिशत) के रूप में उपयोग किया जाता है। ग्राम सभा के बैंक खाते में वर्तमान में 10 लाख रुपए जमा हैं।

यह प्रणाली गांव के निवासियों को आय की गारंटी भी देती है और व्यापार में पारदर्शिता सुनिश्चित करती है। पल्की निवासी बिटी माझी कहते हैं, “हमारे जंगल से बांस की कटाई के केवल दो महीनों में मैंने 40,000 रुपए कमाए।”

वह आगे कहते हैं, “पहले गांव के अधिकांश पुरुषों को आजीविका कमाने के लिए गुजरात, तमिलनाडु या आंध्र प्रदेश पलायन करना पड़ता था। जब से हमारी ग्राम सभा ने बांस का व्यापार शुरू किया है, किसी ने भी काम के लिए गांव नहीं छोड़ा है।” आलोक माझी कहते हैं कि ग्राम सभा अब केंदू और महुआ का व्यापार करने की योजना बना रही है।

अधिकार की त्रुटियां

केजीएसएम ग्राम सभाओं को उनके सीएफआर टाइटलों में सुधार करने में भी सहायता करता है। ओडिशा के अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति विकास, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 31 मई 2025 तक कालाहांडी में लगभग 2,311 सीएफआर दावे दायर किए गए हैं, जिनमें से 491 स्वीकृत हुए हैं और 16,319 हेक्टेयर (हेक्टेयर) वन क्षेत्र के लिए 351 टाइटल वितरित किए गए हैं।

कुछ ग्राम सभाओं का तर्क है कि सीएफआर मनमाने ढंग से दिए गए हैं और एफआरए के तहत मांगे गए क्षेत्र के अनुसार आवंटित नहीं किए गए हैं। उदाहरण के लिए आलोक माझी कहते हैं कि पल्की में “हमारा पारंपरिक वन 1,100 एकड़ (445 हेक्टेयर-0.4 एकड़ 1 हेक्टेयर के बराबर है) में फैला हुआ है, लेकिन हमें जो टाइटल मिला है उसके अंतर्गत केवल 37 एकड़ (14.9 हेक्टेयर) वन आते हैं। हमारी ग्राम सभा पूरे 1,100 एकड़ का प्रबंधन करती है। हमने अपने टाइटल में सुधार करने के लिए अधिकारियों को अनुरोध भी प्रस्तुत किया है, लेकिन कुछ नहीं किया गया है।”

कालाहांडी के आदिवासी गांवों में काम करने वाली एक गैर-लाभकारी संस्था सेवा निकेतन के कार्यक्रम प्रबंधक सीतल कुमार कहते हैं, “कालाहांडी में कम से कम 250 सीएफआर टाइटलों में सुधार की आवश्यकता है क्योंकि वे ग्राम सभाओं की पारंपरिक और प्रथागत वन सीमाओं से मेल नहीं खाते हैं।” वह कहते हैं, “इनमें से कई गांवों ने तो सीएफआर दावों के लिए आवेदन भी नहीं किया था, लेकिन उन्हें गलत टाइटल दे दिए गए।” महासंघ स्वीकृत टाइटलों की समीक्षा करने और जहां आवश्यक हो वहां बदलाव के लिए आवेदन दाखिल करने में मदद करते हैं।

डीएफओ कालैवनन सीएफआर टाइटलों को लेकर फैले भ्रम को स्वीकार करते हैं, लेकिन वह कहते हैं, “ऐसे कई मामले हैं जहां ग्राम सभाओं ने सीएफआर के तहत वन भूमि के बड़े हिस्से की मांग की है, उदाहरण के लिए एक अभयारण्य के अंदर 2,000 हेक्टेयर की।” वह आगे कहते हैं, “हमें सभी सीएफआर सीमाओं का सीमांकन और उनकी मैपिंग करने की आवश्यकता है, प्रत्येक सीएफआर क्षेत्र से एमएफपी की मात्रा निर्धारित करनी होगी और उन विवरणों को सीएफआर टाइटलों में दर्ज करना होगा।” वह कहते हैं कि वन विभाग जल्द ही सीएफआर मानचित्रों का चित्रण शुरू करने की योजना बना रहा है।

सामूहिक कार्रवाई

महासंघ कालाहांडी की ग्राम सभाओं को वन उपज पर अधिकार का प्रयोग करने में मदद करते हैं

2010

ओडिशा के कालाहांडी जिले की 110 ग्राम सभाओं को वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत सामुदायिक वन अधिकार (सीएफआर) प्राप्त हुए

2013

पहली बार जामुगुड़ा ग्राम सभा ने राज्य पारगमन परमिट के साथ बांस बेचने के लिए सीएफआर का प्रयोग किया

2017

गोलामुंडा की ग्राम सभाओं ने केंदु पत्तों की कटाई और बिक्री के लिए सीएफआर का प्रयोग किया

2018

एक जिला स्तरीय महासंघ, कालाहांडी ग्राम सभा महासंघ (केजीएसएम), का गठन किया गया जिसमें 38 ग्राम सभाएं सदस्य थीं। केजीएसएम के तहत सात ब्लॉक-स्तरीय महासंघों का भी गठन किया गया

2019

केजीएसएम की सदस्यता बढ़कर 50 ग्राम सभाओं तक हो गई

2020

केजीएसएम ने निजी व्यापारियों के साथ बेहतर कीमत के लिए सौदेबाजी करने और बिचौलियों के प्रभाव को कम करने में मदद करने के लिए जिला स्तर पर केंदू पत्तों के व्यापार को सामूहिक किया

2022

केजीएसएम की सदस्यता 70 ग्राम सभाओं तक बढ़ी

2023

केजीएसएम ने निजी व्यापारियों के साथ बेहतर कीमत के लिए सौदेबाजी करने और बिचौलियों के प्रभाव को कम करने में मदद करने के लिए जिला स्तर पर बांस के व्यापार को सामूहिक किया

2025

केजीएसएम की सदस्यता 120 ग्राम सभाओं तक बढ़ी। दो ग्राम सभाओं से केंदू पत्तों से भरे एक ट्रक को जब्त किए जाने के कारण केजीएसएम की ओर से विरोध प्रदर्शन और औपचारिक शिकायत शुरू हुई। यह मामला एक न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास गया, जिसने ग्राम सभाओं के पक्ष में फैसला सुनाया