जंगल

साल बोरर का जीवन चक्र

अन्य कीड़ों की भांति इनके जीवन चक्र में मुख्य रूप से 4 अवस्थाएं - अंडा, लार्वा, प्यूपा और वयस्क होती हैं

Bhagirath

साल बोरर गहरे भूरे रंग का लंबे एंटीने वाला बीटल है जिसकी लंबाई 3 सेंमी. से 7 सेंटी. तक होती है। इसका जीवन चक्र इस प्रकार है

प्यूपा

दिसंबर से फरवरी माह तक ये इल्लियां करीब 90 मिलीमीटर तक बढ़ जाती हैं और मध्य काष्ठ तक पहुंच जाती हैं। प्रत्येक इल्ली एक सीधी निर्गम सुरंग बनाकर उसे लकड़ी के छोटे टुकड़ों में बंद करके प्यूपल कक्ष में आ जाती है। इस कक्ष को प्रत्येक इल्ली ऊपर की सुरंग को सफेद रंग के कलकेरियस पदार्थ से सुरक्षा कवच बनाकर बंद कर देती है और प्यूपा में बदल जाती है। अप्रैल माह तक ज्यादातर इल्लियां प्यूपा बन जाती हैं। इल्ली दिसंबर माह के अंतिम सप्ताह के बाद प्यूपा अवस्था में परिवर्तितत होने लगती हैं। इस अवस्था में यह सुसुप्तावस्था में रहती हैं और वृक्षों को कोई हानि नहीं पहुंचातीं। कुछ सप्ताह के प्यूपल काल के दौरान प्यूपा अल्प विकसित वयस्क में बदल जाता है और वृक्षों के भीतर बनी निर्गम सुरंग में रहने लग जाता है जहां इसका पूर्ण विकास होता है। अक्सर देखा गया है कि प्यूपा से वयस्क कीट निकल जाता है परंतु अनुकूल वातावरण न होने के कारण यह तने के अंदर ही रहता है और जैसे ही जून माह में जब मॉनसून की तेज वर्षा शुरू होती है, तब उचित आर्द्रता और तापमान पर वयस्क कीट निर्गम छिद्र से होता हुआ बाहर आ जाता है और पुन: अपना जीवन चक्र प्रारंभ करता है।

वयस्क

मॉनसून शुरू होते ही जून माह के दूसरे-तीसरे सप्ताह में कीट पूर्व ग्रसित वृक्षों से निकलना शुरू हो जाते हैं और प्रत्येक वर्षा के साथ जून से सितंबर तक निकलते रहते हैं। नर वयस्कों की संख्या जून में अधिक होती है लेकिन जुलाई-अगस्त में नर व मादा की संख्या का अनुपात लगभग बराकर होता है। सितंबर माह में जो वयस्क निकलते हैं उनमें अधिकतर मादा होती हैं। ये कीट साल की छाल को काटकर इसके रिसने वाले रस को खाते हैं। वातावरण अनुकूल रहने पर नर वयस्क 49 दिनों तक और मादा वयस्क 38 दिनों तक जीवित रह सकते हैं। नर कीट मादा कीट से छोटे होते हैं।

अंडा

मादा वयस्क सफेद क्रीम रंग के अंडे साल की छाल पर बने छिद्रों, गहरी दरारों या गिरे साल के वृक्षों की शाखाओं पर देती है। सामान्यत: एक मादा 100 से 300 अंडे देती है। विशेष परिस्थितियों में जब तापमान और आर्द्रता अनुकूल होती है तो मादा अपने 38 दिनों के जीवनकाल में अधिकतम 468 अंडे तक दे सकती है। कम आर्द्रता पर अंडे देने की प्रक्रिया लगभग बंद हो जाती है। 3 से 7 दिनों के बाद 64 प्रतिशत से अधिक आर्द्रता और 28 डिग्री सेल्सियस के आसपास के तापमान में 80 से 90 प्रतिशत अंडों से इल्ली निकल आती है लेकिन अधिक शुष्क मौसम में अंडे वाष्पोत्सर्जन से सिकुड़कर नष्ट हो जाते हैं।

इल्ली

3 से 7 दिनों के उपरांत अंडों से बाहर निकलते ही साल बोरर की इल्ली साल वृक्ष की छाल में छेदकर अंदर प्रविष्ट होने लगती है। साल के अंदर घुसने के बाद जब इल्ली बाहरी काष्ठ में पहुंचती है तो ग्रसित वृक्ष के बाहरी काष्ठ से एक द्रव्य निकलने लगता है जिसे राल कहते हैं। शुरू में राल लाल रंग की होती है लेकिन कुछ समय बाद यह हल्के पीले या भूरे रंग में बदल जाती है। वृक्ष से निकलने वाली राल की मात्रा साल वृक्ष की वृद्धि पर निर्भर करती है। जब वृक्ष से राल अधिक मात्रा में निकलती है तो साल बोरर की छोटी इल्लियां राल में डूबकर मर जाती हैं। ऐसे वृक्षों में अक्सर इल्लियों की कम मात्रा रहती है। जिन वृक्षों में राल कम मात्रा में निकलती है, उनमें ये इल्लियां आसानी से वृक्ष की बाह्य काष्ठ में पहुंचकर उसे खाना शुरू कर देती हैं। बाह्य काष्ठ में ये इल्लियां जुलाई से सितंबर माह तक प्रवेश करती हैं और अधिकतर इल्लियां इल्लियां अक्टूबर-नवंबर में बाह्य काष्ठ को गंभीर रूप से खा जाती हैं, जिससे वृक्ष सूखकर मरने लगता है।