छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र में स्थित होरादी गांव के घने जंगलों में इन दिनों रौनक दिख रही है।
अवसर है प्रत्येक सात साल पर मनाए जाने वाला दो दिवसीय नेतुरगुंडे पेन करसाड़ (आदिवासियों महोत्सव)। इस महोत्सव में हजारों की संख्या में आदिवासी जुटे हुए हैं। इस अवसर पर मड़िया-गोंड और मुड़िया आदिवासी संस्कृति के विभिन्न रूप सामने आए।
नेतुरगुंडे पेन करसाड़ आदिवासियों का एक महत्वपूर्ण सामाजिक महोत्सव है। करसाड़ आदिवासियों का एक पवित्र उत्सव के रूप में हर सात साल में मनाया जाता है और इसमें महाराष्ट्र के गढ़चरौली से भी बड़ी संख्या में आदिवासी शामिल हुए हैं।
इस महोत्सव के संबंध में गांव के सरपंच सन्नु धुर्वा ने बताया कि आप आदिवासियों के जीवन और मृत्यु के बीच के उस पुल के रूप में समझ सकते हैं जहां प्रकृति, परंपरा और पुरखें आपस में मिलते हैं।
अबूझमाडृ छात्र संगठन के सदस्य मनकु नेताम ने डाउन टू अर्थ को बताया कि करसाड़ शब्द का अर्थ ही खेलना होता है। दोनों रुपों में आत्माएं ही खेलती हैं और पूर्वजों को ही पेन कहा जाता है। उनके अनुसार करसाड़ की तैयारी करीब दो महीने पहले से शुरु हो जाती है। इसमें सबसे पहला कदम नेवता होता है। नेवता का अर्थ होता है कि सभी पेन को औचपारिक रूप से आमंत्रित करना।
महोत्सव में शामिल हो रहे युवा आदिवासी गणेश पद्दा ने बताया कि यह पर्व हर क्षेत्र में अलग-अलग समय पर सामूहिक सहमति से एक तिथि निश्चित करके मनाया जाता है। कहीं करसाड़ हर साल मनाया जाता है, कहीं हर पांच साल में तो कहीं हर सात साल में यह महोत्सव मनाया जाता है। यह पर्व छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाकों में, झारखंड़ के लोहरदग्गा व गुमला के अलावा महाराष्ट्र के गढ़चरौली और उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश के कुछ आदिवासी इलाकों में भी मनाया जाता है।
ध्यान रहे कि यह पेन करसाड़ में हर उम्र वर्ग के लोग शामिल होते हैं। हालांकि इस बार आदिवासी युवक-युवतियां बड़ी संख्या में शामिल हुए हैं। इस दो दिवसीय महोत्सव में नारायणपुर के विभिन्न गांवों से आए जनजातीय समुदाय के लोगों ने भाग लिया। महोत्सव स्थल पर सभी आदिवासी अपने पारंपरिक वेशभूषा में सज कर ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच नृत्य कर रहे थे।