आषाढ़ का महीना आते ही 'आषाढ़ी बीज' के दिन से पुरी की बड़दांडा लाखों श्रद्धालुओं की आस्था से भर उठती है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विशाल रथों को खींचने के लिए उमड़ता जनसैलाब, गूंजते जयघोष और सदियों से चली आ रही परंपरा, यही रथयात्रा की वह छवि है, जिसे दुनिया देखती है। लेकिन इस भव्य उत्सव की एक शुरुआत ऐसी भी है, जो अधिकांश लोगों की नजर से ओझल रहती है।
रथ बनाने से महीनों पहले ओडिशा के जंगलों में उनकी तैयारी शुरू हो चुकी होती है। वन विभाग के अधिकारी, श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रशासन और पारंपरिक महाराणा कारीगर उन परिपक्व वृक्षों की पहचान करते हैं, जिनकी लकड़ी कुछ महीनों बाद नंदीघोष, तालध्वज और दर्पदलन रथों का हिस्सा बनेगी।
दरअसल, जगन्नाथ रथयात्रा का पहला पड़ाव मंदिर नहीं, जंगल है। वहां न श्रद्धालुओं की भीड़ होती है, न उत्सव का शोर; केवल देशज वनों, पारंपरिक शिल्प और सदियों पुरानी व्यवस्था के बीच एक शांत तैयारी चल रही होती है।
लेकिन जंगल से यह रिश्ता केवल हर वर्ष बनने वाले रथों तक सीमित नहीं है। कुछ विशेष वर्षों में जब दो आषाढ़ का महीना होता है,तब यही जंगल एक और, कहीं अधिक गहरे अनुष्ठान का केंद्र बनता है। बनजागा यात्रा के दौरान इन्हीं वनों में उन पवित्र दारु वृक्षों की खोज की जाती है, जिनसे ‘नवकलेवर’ के अवसर पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन के नए विग्रह निर्मित होते हैं।
शायद विश्व की बहुत कम जीवित परंपराएं ऐसी हैं, जहां जंगल केवल निर्माण सामग्री का स्रोत नहीं, बल्कि स्वयं आस्था और अनुष्ठान का अभिन्न हिस्सा हों
रथयात्रा के लिए हर वर्ष तीनों रथ नए सिरे से बनाए जाते हैं। अक्षय तृतीया से इसकी औपचारिक शुरुआत होती है, जब पारंपरिक महाराणा और भोई समुदाय रथ निर्माण का कार्य संभालते हैं। इसके लिए ओडिशा के विभिन्न वन प्रभागों से चयनित लगभग 1130 खास पेड़ों के लट्ठे लाए जाते हैं जो दशकों तक स्वस्थ और बिना क्षति के परिपक्व हुए हो।
ढौरा, फासी, आसन और सिमिली जैसी देशज प्रजातियों की लकड़ी रथ के अलग-अलग हिस्सों के लिए निर्धारित होती है। रथ के प्रत्येक हिस्से के लिए लकड़ी का चयन उसके भौतिक गुणों जैसे घनत्व, लचक, भार वहन क्षमता और लंबे सीधे तने को ध्यान में रखकर किया जाता है। यही कारण है कि फासी से पहिया, ढौरा से रथ की धुरी, आसन से पूरा ढांचा और सिमली से कम भर वाला हिस्सा बनता है।
इसके अलावा अर्जुन, गंभारी, महानिम्ब, चकौंडा, शीशम, और मई के लकड़ी भी रथ और विभिन्न अनुष्ठान में उपयोग होता है। यह केवल निर्माण का काम नहीं, बल्कि पीढ़ियों से संचित तकनीकी ज्ञान, पीढ़ियों से विकसित स्थानीय वनों की गहरी समझ, अनुष्ठानिक परंपरा, और सामाजिक समन्वय का परिणाम है।
इसके विपरीत, नवकलेवर हर वर्ष नहीं होता। यह केवल उन विशेष वर्षों में आयोजित किया जाता है, जब पंचांग की गणना के अनुसार साल में एक अतिरिक्त आषाढ़ मास पड़ता है। इसी अवसर पर बनजागा यात्रा निकाली जाती है। दैतापति सेवक, राजगुरु और अन्य पारंपरिक प्रतिनिधि काकटपुर की माँ मंगला से आशीर्वाद लेकर उन पवित्र खास नीम यानि दारु ब्रह्म वृक्षों की खोज में निकलते हैं। वृक्ष केवल नीम का होना पर्याप्त नहीं होता। वह परिपक्व, स्वस्थ, सीधा और विशाल होना चाहिए। उसके आसपास शिव मंदिर, जलस्रोत और दीमक की बांबी जैसी विशेषताओं का उल्लेख शास्त्रीय परंपरा में मिलता है। वृक्ष पर प्राकृतिक रूप से शंख, चक्र, गदा या पद्म जैसे चिह्नों की भी खोज की जाती है। दूसरे शब्दों में, यहाँ केवल वृक्ष नहीं चुना जाता; पूरा पारिस्थितिक परिदृश्य चयन का हिस्सा बनता है। जिनसे भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन के नए विग्रह निर्मित किए जाते हैं। दोनों प्रक्रियाएँ अलग हैं, एक हर वर्ष होने वाला रथ निर्माण, दूसरी दशको में कभी-कभार होने वाला नवकलेवर।
यह ज्ञान किसी आधुनिक प्रयोगशाला में नहीं, बल्कि महाराणा कारीगरों के अनुभव, और सदियों से चली आ रही शिल्प परंपरा से विकसित हुई जहाँ प्रकृति के गुणों को समझकर उन्हें सांस्कृतिक आवश्यकता के अनुरूप रूपांतरित किया गया है।
रथ निर्माण की पूरी परंपरा इस बात पर निर्भर करती है कि देशज वनों में दशकों तक विकसित हुए परिपक्व वृक्ष उपलब्ध रहें। यहीं से पर्यावरण का असली प्रश्न शुरू होता है। इसलिए चुनौती लकड़ी की आपूर्ति भर की नहीं, बल्कि उन प्राकृतिक वनों की है जहा ऐसे पेड़ मिलते हैं। रथ निर्माण में प्रयुक्त फासी को उपयुक्त आकार तक पहुँचने में लगभग 50 वर्ष लगते हैं। ढौरा जैसी प्रजाति पहले लगभग 80 वर्षों में आवश्यक घेर प्राप्त कर लेती थी। पिछले कुछ दशक में ओडिशा के वन क्षेत्र में खनन, सड़क और अन्य आधारभूत परियोजनाओं के विस्तार, बार-बार लगने वाली जंगल की आग और जलवायु परिवर्तन के कारण तेजी से बदलाव आया हैं। वन अधिकारियों के अनुसार बदलती जलवायु और धीमी वृद्धि के कारण अब इसमें 100 वर्ष तक लग सकते हैं। अर्थात् आज जो वृक्ष रथ निर्माण के लिए चुना जा रहा है, उसकी कहानी आधी सदी या उससे भी पहले शुरू हुई थी। यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है।
रथयात्रा किसी तात्कालिक लकड़ी पर नहीं, बल्कि उन जंगलों पर आधारित है जिन्हें तैयार होने में कई पीढ़ियाँ लगती हैं और यह चिंता केवल सैद्धांतिक नहीं है। रथयात्रा के लिए उपयुक्त पेड़ आज भी उपलब्ध कराई जा रही है, लेकिन उपयुक्त आकार और गुणवत्ता वाले परिपक्व इन पेड़ों वृक्षों की खोज पहले की तुलना में अधिक कठिन होती जा रही है। 2022 में पहली बार रथ निर्माण के लिए प्रयुक्त ‘फासी’ की पूरी आपूर्ति नयागढ़ और खुर्दा के किसानो ने दान स्वरुप उपलब्ध करायी गयी क्योंकि नयागढ़ के दसपल्ला और बौध के प्राकृतिक वनों में पर्याप्त परिपक्व वृक्ष उपलब्ध नहीं थे। हालाकिं जंगलों में फासी के पेड़ पूरी तरह समाप्त नहीं हुए थे, लेकिन उपलब्ध अभी पर्याप्त परिपक्व नहीं हुए थे और जो परिपक्व थे उन्हें "मदर ट्री" के रूप में जानबूझकर नहीं काटा गया ताकि प्राकृतिक पुनर्जनन बना रहे। इसके बाद कई बार लकड़ी अपेक्षाकृत दूरस्थ वन क्षेत्रों से जुटानी पड़ी। वन विभाग और श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रशासन ने इस चुनौती को देखते हुए साल 2000 में शुरू हुए ‘जगन्नाथ बन प्रकल्प’, ‘ग्रीन महानदी मिशन’ जैसे प्रकल्पो के आलोक में देशज प्रजातियों के दीर्घकालिक रोपण, वैज्ञानिक सूचीकरण और जीपीएस आधारित वृक्ष पहचान जैसी पहलें तेज़ की गयी। फिर भी यह आसान प्रक्रिया नहीं है। फानी और यास जैसे भीषण चक्रवातों से लेकर बार-बार लगने वाली जंगली आग और बदलती जलवायु के कारण आशातीत सफलता नहीं मिली, खास कर ढौरा पेड़ के लिए। यही कारण है कि आज चुनौती रथयात्रा के लिए लकड़ी जुटाने की नहीं, बल्कि आने वाले दशकों के लिए उन परिपक्व देशज वनों को सुरक्षित रखने की है, जिन पर यह पूरी परंपरा टिकी हुई है।
शायद इसी कारण जगन्नाथ की रथयात्रा का पहला पड़ाव आज भी मंदिर नहीं, जंगल है। यह केवल रथ बनाने के लिए लकड़ी लेने की यात्रा नहीं, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच एक पुराने अनुबंध को हर वर्ष फिर से याद करने की प्रक्रिया है। ऐसे समय में, जब दुनिया टिकाऊ विकास और प्रकृति के साथ संतुलन की नई भाषा खोज रही है, जगन्नाथ परंपरा एक सरल लेकिन गहरा संदेश छोड़ जाती है, प्रकृति का संरक्षण उसके साथ संबंध निभाने में है। यही संबंध जंगल को संसाधन से विरासत, और संरक्षण को सरकारी कार्यक्रम से आगे बढ़ाकर सामाजिक-सांस्कृतिक उत्तरदायित्व में बदल देता है। संभवतः यही वह दृष्टि है जिसकी आज भारत ही नहीं, पूरी दुनिया को आवश्यकता है।
अधिकांश संरक्षण योजनाएँ वन और संस्कृति को अलग-अलग विषय मानकर चलती हैं, जबकि रथयात्रा परंपरा दोनों को एक ही ताने-बाने में रखती है। यही सोच आज वन प्रबंधन की दिशा भी बदल सकती है। स्थानीय प्रजातियों पर जोर, दीर्घकालिक वानिकी, सांस्कृतिक रूप से महत्त्वपूर्ण वनों की विशेष संरक्षण श्रेणी, पारंपरिक कारीगरों और स्थानीय समुदायों के ज्ञान का दस्तावेजीकरण तथा जलवायु परिवर्तन के अनुरूप वन प्रबंधन, ये केवल पर्यावरणीय नीतियाँ तो होनी ही चाहिए, क्युकी ये सांस्कृतिक निरंतरता की शर्तें भी हैं। यदि भारत अपनी जैव विविधता और सांस्कृतिक विविधता दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ना चाहता है, तो रथयात्रा परम्परा की अवधारणा पर गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है, जहाँ जंगलों का मूल्य केवल उनके आर्थिक उपयोग से नहीं, बल्कि उनके सांस्कृतिक और पारिस्थितिक योगदान से भी आँका जाए।