देश में पारिस्थितिकी असंतुलन की जो तस्वीर आंखों से दिखाई दे रही है, दरअसल वह जलवायु के अधिकांश मॉडल्स में दर्ज नहीं हो पा रही है। देश में वनस्पति आवरण में हो रहे दीर्घकालिक बदलावों से यह पता चलता है कि जिन क्षेत्रों में हरित आवरण (ग्रीनिंग) बढ़ा है उन इलाकों की हरियाली में आक्रामक विदेशी प्रजातियों का प्रभाव भी हो सकता है। खासतौर से वेस्टर्न घाट में यह दिखाई दे रहा है, जिसके चलते ना सिर्फ स्थानीय जलचक्र बल्कि मिट्टी की जैवरासायनिक सरंचना भी बदल सकती है।
इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स के स्कूल ऑफ एनवायरमेंट एंड सस्टेनेबिलिटी के डीन व प्रोफेसर जगदीश कृष्णास्वामी ने 25 फरवरी, 2026 को अनिल अग्रवाल डायलॉग के एक सत्र में ‘इंडिया इन द एंथ्रोपोसीन एंड इकोलॉजिकल फ्यूचर्स’ के तहत यह बातें कहीं।
उन्होंने ग्रीनिंग एंड ब्राउनिंग एटलस ऑफ इंडिया’ दिखाते हुए कहा कि यह एटलस उपग्रह आधारित आंकड़ों के माध्यम से दिखाता है कि किन क्षेत्रों में हरित आवरण (ग्रीनिंग) बढ़ा है और किन इलाकों में वनस्पति में गिरावट (ब्राउनिंग) आई है। ग्रीनिंग का अर्थ है कि किसी क्षेत्र में वनस्पति घनत्व या हरियाली बढ़ी है। यह कुछ मामलों में वृक्षारोपण, कृषि विस्तार या झाड़ियों के प्रसार के कारण हो सकता है। वहीं ब्राउनिंग का अर्थ है वनस्पति का क्षय, सूखापन या हरित आवरण में कमी। इसके पीछे कारण भूमि उपयोग में बदलाव, शहरीकरण, खनन, जलवायु परिवर्तन या आक्रामक विदेशी प्रजातियों का प्रभाव हो सकता है ।
उन्होंने, 1982-2022 और 2000-2022 के एक तुलनात्मक एटलस मैप (ग्रीनिंग एंड ब्राउनिंग) में देश के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में राजस्थान में बढ़ती बारिश और थार की बदलती प्रकृति का जिक्र किया। प्रोफेसर कृष्णास्वामी ने कहा कि क्षेत्र में इंदिरा गांधी कैनाल के चलते नमी बढ़ी है और अधिक वर्षा भी दर्ज की जा रही है। इसी तरह देश के कई अलग हिस्सों में ब्राउनिंग यानी सूखा का प्रकोप बढ़ा है। उन्होंने कहा एटलस केवल हरित क्षेत्र का प्रतिशत नहीं बताता, बल्कि यह संकेत देता है कि किस प्रकार के पारिस्थितिक परिवर्तन हो रहे हैं और वे जल, भूमि तथा जैव विविधता से कैसे जुड़े हैं।
प्रोफेसर कृष्णास्वामी भूमि क्षरण और जलवायु परिवर्तन पर इंटरगवर्नमेंट पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की विशेष रिपोर्ट में समन्वयक प्रमुख लेखक के रूप में अपनी भूमिका निभाई है साथ ही पश्चिमी घाट को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने में उनकी वैज्ञानिक भूमिका है।
सत्र के दौरान उन्होंने बताया कि भारत में पारिस्थितिक बदलाव अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि परस्पर जुड़े हुए तंत्रों का परिणाम हैं । खास तौर पर वेस्टर्न घाट में उन्होंने बताया कि वन केवल स्थानीय वर्षा तक सीमित नहीं हैं। यह वन वाष्पोत्सर्जन के जरिए नमी को वातावरण में छोड़ते हैं, जो बाद में हवाओं के साथ पूर्व की ओर बढ़ती है और जल-अभाव वाले पूर्वी तटीय क्षेत्रों तक पहुंचती है । इसका मतलब यह है कि यदि पश्चिमी घाट के वन क्षतिग्रस्त होते हैं या उनका स्वरूप बदलता है तो उसका असर सैकड़ों किलोमीटर दूर स्थित क्षेत्रों के जल संतुलन पर भी पड़ सकता है।
प्रोफेसर कृष्णास्वामी ने सत्र के दौरान अपनी प्रस्तुति में ‘ग्लोबल वाटर क्राइसिस’ के संदर्भ में भारत के ‘वेटिंग एंड ड्राइंग एटलस’ और सतही जल रुझानों के आंकड़ों को पेश किया। ‘सरफेस वाटर ट्रेंड्स’ डाटासेट देश में झीलों, तालाबों और अन्य जल निकायों के फैलाव में समय के साथ हो रहे बदलाव को दिखाया। इस एटलस के जरिए दिखाया गया कि कुछ इलाके लगातार सूख रहे हैं, जबकि कुछ स्थानों पर असामान्य आर्द्रता बढ़ रही है। इसका अर्थ है कि जल संकट केवल कमी का प्रश्न नहीं है, बल्कि असंतुलन का भी प्रश्न है। कहीं अत्यधिक वर्षा और बाढ़, तो कहीं दीर्घकालिक सूखा, यह दोनों प्रवृत्तियां साथ-साथ दिखाई दे रही हैं ।
प्रोफेसर कृष्णास्वामी ने कहा कि अक्सर राजनीतिज्ञ और अधिकांश लोग नदियों के समुद्र तक पहुंचने को पानी की बर्बादी मानते हैं लेकिन यह जानना जरूरी है कि रेत लेकर समुद्र तक पहुंचने वाली नदियां मुहाना और तटीय पारिस्थितिक तंत्रों के लिए जरूरी हैं। यह तलछट डेल्टा क्षेत्रों को स्थिर बनाए रखने में मदद करती हैं और तटीय समुदायों की संवेदनशीलता कम करती हैं ।
उन्होंने कहा, शहरीकरण और रिवर फ्रंट विकास को लेकर कहा कि नदियों के लिए ऐसा समाधान ठीक नहीं है। इसके अलावा उन्होने मानव-वन्यजीव संपर्क को लेकर कहा कि गीदढ़, बाघ जैसे जीव का मनुष्यों के साथ सहअसत्तित्व संभव हो रहा है।
उन्होंने पानी के प्रबंधन को लेकर ब्लू वाटर और ग्रीन वाटर का कांसेप्ट समझाया। उन्होंने कहा कि ब्लू वाटर यानी वह पानी जो हम पीने के लिए इस्तेमाल करते हैं उसका बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र में चला जाता है जबकि ग्रीन वाटर जो कि वर्षा जल है और जिसे प्रबंधित करने की अत्यंत जरूरत है।