डायनासोर युग के अंत से लेकर आजतक दीमकों का धरती पर बचे रहना जीव विकास की अनूठी और रहस्यमयी कहानियों में से एक है। बहरहाल करोड़ों साल तक दीमकों के बचे रहने के हुनर की तहें वैज्ञानिक खोलने लगे हैं।
हाल ही में हजारों दीमकों के डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड (डीएनए) की जांच करके एक दिलचस्प कहानी का पता लगाया है। यह कहानी बताती है कि कैसे दुनिया में आए बड़े संकटों और तबाही ने दीमकों को आज का "सुपर पावर" बना दिया। डीएनए के अध्ययन से किसी जीव के बनावट, विकास और काम करने के तरीके का पता लगाया जाता है।
इन दीमकों के बिना हमारे उष्णकटिबंधीय इलाकों के जंगल टिक नहीं सकते। दीमक कचरे को गलाकर पौधों को खाद देते हैं, मिट्टी में सुरंगें बनाकर पानी जड़ों तक पहुंचाते हैं और पूरी खाद्य श्रृंखला को सहारा देते हैं। यहां तक कि वर्षावनों में रहने वाले कुल जीवों के वजन का 10 से 20 फीसदी हिस्सा अकेले दीमक ही होते हैं। लेकिन वह हमेशा से इतने प्रभावी नहीं थे।
ओकिनावा इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (ओआईएसटी) और उनके अंतरराष्ट्रीय साथियों ने अमेरिका में पाए जाने वाले लगभग सभी दीमकों का डीएनए टेस्ट किया है, जिसमें 206 नई प्रजातियां भी मिलीं। इससे उनकी विकास की एक समयरेखा तैयार हुई है।
इस अध्ययन से पता चला कि आधुनिक दीमकों की खास पहचान, जैसे मिट्टी खाना, अपने मल से घोंसला बनाना और फफूंद की खेती करना दरअसल धीरे-धीरे नहीं, बल्कि दो बड़े महाविनाश (3 करोड़ साल के अंतराल पर) के दौरान उभरी है।
दीमकों में यह बदलाव दुनिया में आई दो बड़ी तबाही सामूहिक विलुप्ति के बाद आए। 12 वैज्ञानिको की एक टीम ने यह अध्ययन पूरा किया है और यह रिसर्च करंट बॉयोलाजी जर्नल में प्रकाशित हुई है।
रिसर्च के मुताबिक, डायनासोरों के अंत के बाद दीमकों का उदय हुआ। दीमकों के फैलने की पहली लहर करीब 6.6 करोड़ साल पहले 'एंड-क्रिटेशियस' घटना के दौरान आई। यह वही समय था जब एक विशाल उल्कापिंड के टकराने से डायनासोर खत्म हो गए थे।
स्टडी के सह-प्रथम लेखक डॉ. साइमन हेलमैंस बताते हैं, "इस घटना ने कुछ पुराने दीमक वंशों को तो खत्म कर दिया होगा, लेकिन इसने पर्यावरण में कई ऐसी खाली जगहें बना दीं, जहां बाद में दीमकों को अपनी आबादी बढ़ाने और विविधीकरण का मौका मिला।"
वहीं, दूसरे महाविनाश में दीमकों ने सर्वाइवल के कुछ और हुनर हासिल किए। दूसरी लहर करीब 3.3 करोड़ साल पहले आई। उस वक्त ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका के अलग होने से समुद्री धाराओं में ऐसा बदलाव हुआ कि पूरी दुनिया ठंडी होने लगी। मात्र 10,000 सालों में औसत तापमान 8 डिग्री सेल्सियस गिर गया।
शोध के लेखक प्रोफेसर थॉमस बोरगिन्यॉन बताते हैं, "इस ठंड से पहले गर्म वर्षावन अलास्का से अंटार्कटिका तक थे। लेकिन ठंड के बाद ये सिमटकर केवल बीच के गर्म इलाकों तक रह गए। बाकी जगह वर्षावन सवाना और घास के मैदानों में बदल गए।"
जहां इस ठंड ने ढेरों जीवों को मार डाला, वहीं दीमकों के एक खास परिवार टरमिटिडी ने एक कमाल का 'नवाचार' किया। दरअसल उसने मिट्टी खाने की क्षमता पैदा कर ली थी। प्रोफेसर बोरगिन्यॉन आगे कहते हैं, "मिट्टी को पचाने की क्षमता ने इन दीमकों के लिए एक नया रास्ता खोल दिया। तबाही से जो जगहें खाली हुई थीं, उनमें मिट्टी खाने वाले दीमक अब विशेषज्ञ बन गए।" आज दुनिया के आधे से ज्यादा दीमक इसी श्रेणी में आते हैं।
शोध में कहा गया है कि यह पहेली आज भी अनसुलझी है कि मिट्टी खाने वाले ये दीमक अफ्रीका से पूरी दुनिया में कैसे फैले। लकड़ी खाने वाले दीमक तो तैरती लकड़ियों पर जा सकते हैं, पर मिट्टी खाने वालों को जिंदा रहने के लिए मिट्टी चाहिए। डॉ. हेलमैंस का कहना है, "यह रहस्यमयी है। शायद वे उखड़े हुए पेड़ों की जड़ों में फंसी मिट्टी या ऊंचे पौधों के झुरमुटों में बैठकर समुद्र पार कर गए होंगे, हालांकि अभी इसका सबूत मिलना बाकी है।"
इस रिसर्च के लिए वैज्ञानिकों ने 1,756 नए सैंपल्स का विश्लेषण किया, जिससे माइटोकॉन्ड्रियल जीनोम का डेटा दोगुना हो गया। यह डेटा ब्राजील की यूनिवर्सिटी ऑफ साउ पाउलो, अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा और बेल्जियम की यूनिवर्सिटी लिब्रे डे ब्रुसेल्स के सहयोग से जुटाया गया।
प्रोफेसर बोरगिन्यॉन कहते हैं कि दीमकों ने हमेशा बड़े संकटों का डटकर मुकाबला किया है। आज जब इंसान वनों की कटाई और ग्लोबल वार्मिंग से धरती का रूप बदल रहा है तो दीमकों की यह सहनशीलता ही उन्हें बचाए रखेगी, हालांकि कई प्रजातियां हमारे कारण पहले ही खत्म हो रही हैं।