वरिष्ठ पर्यावरणविद् और पर्यावरण आंदोलनों की अग्रणी शख्सियत माधव गाडगिल का 7 जनवरी की रात 11 बजे निधन हो गया। वे 83 वर्ष के थे।
डाउन टू अर्थ ने 2 जनवरी को उनसे अरावली से जुड़े मुद्दे और सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार की समिति की सिफ़ारिश पर पहाड़ियों की नई परिभाषा को स्वीकार करने के आदेश पर उनकी राय जानने के लिए बातचीत की थी।
उस समय वे अस्वस्थ थे और गिरने की वजह से उनके पैर में चोट लगी थी। उन्होंने कहा, “मैं ठीक से पढ़ नहीं पा रहा हूं, लेकिन बात कर सकता हूं।” इसके बावजूद पर्यावरण पर अपने विचार साझा करने की उनकी प्रतिबद्धता कम नहीं हुई।
वे बातचीत के दौरान छोटे-छोटे ब्रेक लेते थे और कभी 10 मिनट तो कभी 4 मिनट बाद फिर से कॉल करने को कहते थे। हर बार फोन रखते समय यही कहते- “दोबारा जरूर फोन करना।”
करीब 40 मिनट की बातचीत में उन्होंने अरावली पर अपने विचार और दशकों के दौरान सरकार के साथ अपने अनुभव साझा किए।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 29 दिसंबर को दिए गए अपने फैसले पर रोक लगा दी है।
अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार अक्सर अपनी संस्थाओं का इस्तेमाल नागरिकों को गुमराह करने या ऐसी जानकारियों को दबाने के लिए करती है, जिनसे विरोध खड़ा हो सकता है।
अरावली के संदर्भ में उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई), भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) और भारतीय मृदा सर्वेक्षण (एसओआई) जैसी संस्थाओं का इस्तेमाल ऐसी परिभाषा गढ़ने के लिए किया, जो उसके हितों के अनुकूल हो।
उन्होंने कहा, “हमारे (उनके और अन्य शोधकर्ताओं के) जमीनी अध्ययनों के नतीजे अक्सर सरकारी आंकड़ों से अलग रहे हैं। यह अंतर हमेशा जानबूझकर रखा गया और हम सोचते रहे कि समस्या कहां है। बाद में हमें समझ आया कि यह अंतर वहीं पैदा किया जाता है, जहां नतीजे सरकार को स्वीकार्य नहीं होते।”
1990 के दशक में नीलगिरि पहाड़ियों के मानचित्रण से जुड़े अपने फील्ड अध्ययन का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पहाड़ियों की माप के विस्तृत विश्लेषण में यह सामने आया कि सरकारी एजेंसियों ने जमीन के स्तर को कम दिखाया, ताकि संरक्षण के बजाय विकास को बढ़ावा दिया जा सके।
महाराष्ट्र के पश्चिमी घाटों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि कई बार एफएसआई ने इस बात की जानकारी दबाई कि क्षेत्र में विकास और संसाधनों का दोहन वहां के लोगों पर किस तरह प्रतिकूल प्रभाव डालेगा।
अपनी आखिरी किताब और आत्मकथा “ए वॉक अप द हिल: लिविंग विद पीपल एंड नेचर” (2023) का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि विकास अक्सर लोगों पर थोपा जाता है। उन्होंने कहा कि राज्य वन विभाग जिन संरक्षण मुद्दों को उठाता है, वे जमीनी लोगों की चिंताओं से मेल नहीं खाते, बल्कि ऊपर से थोपे गए ऐसे संरक्षण होते हैं, जो विभाग के हितों के अनुकूल हों।
उन्होंने जोर देकर कहा कि विकास और संरक्षण दोनों ही लोगों द्वारा और लोगों के लिए होने चाहिए तथा सरकार को पर्यावरण संरक्षण में नीचे से ऊपर (बॉटम-टू-टॉप) का दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
उन्होंने कहा, “संरक्षण की योजना बनाते समय जमीन पर रहने वाले लोगों के अनुभवों को आधार बनाना चाहिए। हमने एम.के. प्रसाद द्वारा संचालित साइलेंट वैली परियोजना में इसकी सफलता देखी है, जो आज एक अच्छी तरह संरक्षित, जैव-विविधता से भरपूर राष्ट्रीय उद्यान है।”
अरावली के मुद्दे पर लौटते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खनन खोलना सरकार के लिए देश के अन्य हिस्सों में भी यही मॉडल लागू करने का रास्ता तैयार करेगा।
उन्होंने निराशा जताते हुए कहा, “सरकार अपने हर फैसले को सही ठहराने के लिए अलग-अलग बहाने ढूंढ लेती है, और ज़्यादातर मामलों में संसाधनों की जरूरत और विकास का हवाला दिया जाता है।” उन्होंने यह भी कहा कि भारत में चट्टानों के खनन, उससे होने वाली पर्यावरणीय तबाही और उसके प्रभावों की समुचित रिपोर्टिंग नहीं हुई है।
उन्होंने कहा, “अरावली में खनन का उदाहरण देश के अन्य हिस्सों के लिए ब्लूप्रिंट बनेगा और इसके सबूत सामने आएंगे। और ज्यादा खनन क्षेत्रों को खोला जाएगा।”
गाडगिल ने कहा कि इसका सबसे ज्यादा असर आदिवासियों और जंगलों पर निर्भर लोगों पर पड़ेगा। उन्होंने महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में सूरजगढ़ खनन मामले का जिक्र करते हुए कहा, “यह गोंड आदिवासियों के लिए एक पवित्र स्थल है। लेकिन खनन के लिए इन स्थानीय लोगों को दबाया गया, उनके अधिकारों का उल्लंघन किया गया और उनके लोकतांत्रिक अधिकार छीन लिए गए।”
उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने सामुदायिक वन अधिकार (सीएफआर) क्षेत्रों की पहचान के लिए जिलों से जुड़े आंकड़ों में भी हेरफेर किया, ताकि अधिक वन आवरण वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को उनके अधिकारों से वंचित किया जा सके।
उन्होंने कहा, “उस समय यह तर्क दिया गया कि आदिवासियों ने सहमति दी थी और फैसले का समर्थन किया था, जो सच नहीं था।”
गाडगिल ने कहा कि आदिवासियों के पारिस्थितिक अधिकारों को बिना हस्तक्षेप के सुरक्षित रहने दिया जाना चाहिए।