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जंगल

जन जन में वन चेतना: सिर साठे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण

बिश्नोई, आदिवासी और पहाड़ी समुदायों की सदियों पुरानी पर्यावरणीय समझ आज जलवायु संकट और आधुनिक विकास मॉडल को चुनौती देती हुई बताती है कि प्रकृति की रक्षा कानून से नहीं, जन-जन की चेतना से होती है

Kushagra Rajendra, Vineeta Parmar

11 सितंबर 1730 को ‘खेजड़ली’ में अमृता देवी बिश्नोई ने जब जोधपुर के महाराजा अभय सिंह के सैनिकों  की कुल्हाड़ियों के सामने खड़े होकर कहा कि "सिर साठे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण" (अगर सिर कटवाकर भी एक पेड़ बचता है, तो इसे सस्ता सौदा ही समझो), तो वह सिर्फ एक जज्बाती बयान नहीं था। वह मरूभूमि की उस गहरी पारिस्थितिक समझ की हुंकार थी, जिसे खेजड़ली नरसंहार के रूप में याद किया जाता है। इस ऐतिहासिक घटना में 363 बिश्नोई स्त्री-पुरुषों ने राजा के महल के लिए लकड़ी काटने आए सैनिकों के सामने पेड़ों से लिपटकर अपनी जान दे दी थी।

इसी अभूतपूर्व बलिदान की स्मृति में भारत में 2013 से हर वर्ष 11 सितंबर को राष्ट्रीय वन शहीद दिवस मनाया जाता है। यह केवल एक ऐतिहासिक स्मरण नहीं बल्कि खेजड़ली के सामुदायिक बलिदान को आज जंगलों और वन्यजीवों की रक्षा करते हुए शहीद होने वाले वनकर्मियों से जोड़ने वाली कड़ी है। आज वन-सुरक्षा केवल पेड़ों की रक्षा नहीं रही; अवैध कटाई, वन्यजीव तस्करी, खनन और वनाग्नि के बीच यह कई जगह जीवन-मरण का संघर्ष बन चुकी है। दूसरी ओर, स्थानीय समुदाय भी विकास के नाम पर बदलते जंगल और अपनी आजीविका के संकट के बीच खड़े हैं। 

दरअसल पश्चिम में पर्यावरणवाद एक आधुनिक अकादमिक विमर्श के रूप में उभरा, उससे बहुत पहले भारतीय समाज में प्रकृति जीवन-पद्धति का हिस्सा थी। गुरु जम्भेश्वर की बिश्नोई (बीस और नोई) परम्परा के उन्नतीस नियमों में प्रकृति, हरे पेड़ों और जीवों की रक्षा को सर्वोच्च आध्यात्मिक कर्तव्य माना गया। यह चेतना केवल राजस्थान तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे उपमहाद्वीप में जब भी सत्ता या व्यावसायिक ताकतों ने जंगलों को 'संसाधन' मानकर उन पर कब्ज़ा करने की कोशिश की, वहा के मूल निवासियों ने अपनी लोक-संस्कृति, गीतों और नारों को ढाल बनाकर विद्रोह की नई इबारत लिख दी। भारतीय उपमहाद्वीप में जंगलों का संरक्षण कभी भी कागजी कानूनों के भरोसे नहीं था। यहाँ के समाज ने प्रकृति को 'सहोदर' या 'पूर्वज' माना। जब इस रिश्ते पर प्रहार हुआ, तो इसके खिलाफ प्रतिरोध की रणनीतियाँ भी अनूठी थीं।

संथाली पुरखों के लिए संघर्ष  

1780 का दशक में ईस्ट इंडिया कंपनी ने जब छोटानागपुर और राजमहल की पहाड़ियों में जंगलों पर टैक्स लगाना और व्यावसायिक कटाई शुरू की तब संथाल आदिवासी नेता तिलका मांझी ने विद्रोह का बिगुल फूंका। संथालों के लिए जंगल का कटना उनके पुरखों की स्मृतियों का नष्ट होना था। इस दुख और गुस्से को तत्कालीन संथाल लोकगीत में पिरोया गया, जिसे आज भी वहाँ की वादियों में गाया जाता है:

"डिंगा डिगा साहेब कुइला ते हेच एयना, सखुआ कटी कटी सेना, महुआ कटी कटी सेना... पुरखारे आत्मा रे रेमुद को रागा, बाबा तिलका साजे सांगा।" (संथाली)

"गोरे साहब लोहे की कुल्हाड़ी लेकर आ गए हैं, वे सखुआ (साल) काट रहे हैं, महुआ काट रहे हैं। हमारे पुरखों की आत्मा जड़ों से रो रही है, लेकिन बाबा तिलका ने प्रतिशोध का तीर-कमान उठा लिया है।"

इस गीत में आदिवासियों के लिए पेड़ का कटना सिर्फ लकड़ी का जाना नहीं था, बल्कि अपनी पहचान और इतिहास का कत्ल था।

बस्तर का भूमकाल 

बीसवी सदी की शुरुवात में जब ब्रिटिश हुकूमत बस्तर के जंगलों के दो-तिहाई हिस्से को 'आरक्षित' घोषित कर दिया, जिससे आदिवासियों का महुआ बीनना और मवेशी चराना अपराध बन गया, तब गुंडा धुर के नेतृत्व में भूमकाल आंदोलन हुआ। इस विद्रोह में संदेश भेजने का तरीका बेहद प्राकृतिक और प्रतीकात्मक था! गाँवों में लाल मिर्च, आम की टहनियाँ और तीर भेजे जाते थे जो इस बात का संकेत थे कि जंगल की रक्षा के लिए लामबंद होना है।

इस दौरान गोंडी और हल्बी बोलियों में गाया जाने वाला यह गीत सीधे तौर पर औपनिवेशिक सत्ता की वैधता पर सवाल उठाता था:

"पोरड़ो पोरय तोल पोत्तेन, एरुम तोल मीनतेन... तेर बाद इदुम नाड लन्दन राजा तोल आंदेन? महुआ मत छुओ ईनतेन, छेरी मत चराओ ईनतेन, मावा नाड मावा माटी कय्या उंदेन।" (हल्बी/गोंडी)

"आकाश उड़ते पंछी का है, नदी बहती मछली की है... फिर ये जंगल सात समुन्दर पार बैठे लंदन के राजा का कैसे हो गया? वे कहते हैं महुआ मत छुओ, वे कहते हैं बकरियां मत चराओ, लेकिन हमारी मिट्टी हमारे पैर पहचानती है, और ये पेड़ हमारे नाम जानते हैं।"

चिपको: कुल्हाड़ियों के सामने पहाड़ की छाती

उत्तराखंड के चमोली जिले से शुरू हुआ चिपको आंदोलन, खेजड़ली बलिदान का आधुनिक भारत में सबसे सशक्त और सीधा विस्तार था, जब एक खेलकूद का सामान बनाने वाली व्यावसायिक कंपनी को रेणी गाँव के जंगलों को काटने का ठेका मिला, तो पुरुषों की अनुपस्थिति में अमृता देवी के जैसे ही गौरा देवी के नेतृत्व में गाँव की महिलाओं ने पेड़ों को अपनी बाहों में भर लिया। यह आंदोलन केवल पेड़ों को बचाने का नहीं, बल्कि पहाड़ों के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने की लड़ाई थी। स्थानीय लोक-कवि घनश्याम रतूड़ी ने इस आंदोलन को एक नारा दिया, जिसने तत्कालीन सरकार को हिलाकर रख दिया:

"क्या छन जंगला का उपकार? लीसा, लकड़ी अर व्यापार। माटू, पाणी अर बयार, ज्यूँदा रहणा का आधार।" (गढ़वाली)

"जंगल के उपकार क्या हैं? लीसा (गोंद), लकड़ी और व्यापार? नहीं! मिट्टी, पानी और शुद्ध हवा ही हमारे ज़िंदा रहने के असली आधार हैं।"

सुंदरलाल बहुगुणा और चंडी प्रसाद भट्ट के नेतृत्व में इस आंदोलन की गूँज इतनी गहरी थी कि यह पूरे हिमालयी क्षेत्र में फैल गया और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को 1980 के वन संरक्षण अधिनियम की पृष्ठभूमि तैयार करनी पड़ी।

'सागवान है लालच, साल है जीवन' 

अस्सी के दशक में बिहार और ओडिशा के सिंहभूम इलाके में जब सरकार ने प्राकृतिक रूप से उगे जैविक विविधता से भरपूर साल (सखुआ) के जंगलों को काटकर व्यावसायिक सागवान (टीक) लगाने की योजना बनाई, तो आदिवासियों ने इसे 'प्राकृतिक हिंसा' माना। साल का पेड़ आदिवासियों को भोजन, दवा, छांव और दातून देता था जो उनके जीवन का आधार था, जबकि सागवान सिर्फ लकड़ी के व्यापारियों के मुनाफे का जरिया था। इस आंदोलन ने भारतीय पर्यावरण इतिहास को एक बेहद सटीक और वैज्ञानिक नारा दिया:

"सगन गछहा लोप, सरजोम गछहा जिबोन!" (संथाली/हो)

"सागवान (टीक) लालच है, साल ही हमारा जीवन है!"

आदिवासियों ने नर्सरियों में जाकर सागवान के पौधों को उखाड़ फेंका और उनकी जगह वापस साल के बीज बोए। यह इस बात का जीवंत प्रमाण था कि स्थानीय समुदाय पर्यावरण के 'मोनोकल्चर' के खतरों को आधुनिक वैज्ञानिकों से पहले समझते थे और व्यापक स्तर पर किये गए मोनोकल्चर के दुष्परिणाम अब जा जाकर भुगत रहे है।

अप्पिको: दक्षिण भारत का चिपको 

हिमालय से उठी चिपको की धमक कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ (उत्तरा कन्नड़) के सलकानी जंगलों तक भी पहुँची। जब राज्य के वन विभाग ने पश्चिमी घाट के सदाबहार वनों में व्यावसायिक ठेकेदारों को पेड़ काटने की खुली छूट दी, तो स्थानीय युवाओं और महिलाओं ने पांडुरंग हेगड़े के नेतृत्व में जंगल को गले लगा लिया.जिसे स्थानीय कन्नड़ भाषा में 'अप्पिको' कहा गया। इस आंदोलन ने दक्षिण भारत के जन-जन में तीन स्पष्ट वैज्ञानिक आयामों को एक त्रिपदीय नारे के रूप में स्थापित किया!

"उबिसु, बेलिसु, बलसु!" (कन्नड़)

"बचाओ (प्राकृतिक जंगलों को), उगाओ (खाली जमीनों पर नए पेड़), और उपयोग करो (वन संपदा का विवेकपूर्ण ढंग से)!"

अप्पिको आंदोलन ने यह साबित कर दिया कि भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर से लेकर दक्षिण तक, पर्यावरण की रक्षा का मूल सिद्धांत एक ही है, प्रकृति का सम्मान, न कि उसका आर्थिक शोषण।

जंगल बचाने की लोक परंपरा 

भारत के स्थानीय समुदाय जिसका आधार ही प्रकृति और जंगल रहा है, बिश्नोई आंदोलन की ही तरह, पूरे उपमहाद्वीप में प्रकृति और जंगल को बचाने के लिएअपने अपने सामाजिक नियम तय किए।

मध्य हिमालयी क्षेत्रों (गढ़वाल और कुमाऊ) में वैज्ञानिक वन प्रबंधन को सामाजिक-धार्मिक अनुशासन से जोड़ने का एक बेजोड़ उदाहरण है। जब ग्रामीणों को लगता था कि किसी वन क्षेत्र का अत्यधिक दोहन हो चुका है और उसे फिर से हरा-भरा करने की आवश्यकता है, तब गाँव की पंचायत और बुजुर्ग अपने लोक-देवता (भूमिया देवता या लाटू देवता) के सामने एक हरी टहनी को बीच से मरोड़कर तोड़ देते थे। इसी आनुष्ठानिक क्रिया को 'लाटा तोड़ना' कहा जाता है। टहनी टूटने का अर्थ होता था कि उस वन क्षेत्र पर अब इंसानी हक़ समाप्त हो गया है और वह सीधे देवता के संरक्षण में चला गया है। इसके बाद एक निश्चित अवधि (आमतौर पर 3 से 5 वर्ष) के लिए उस पूरे हिस्से से हरी लकड़ी काटना या मवेशियों को चराना सामाजिक और धार्मिक रूप से पूरी तरह वर्जित हो जाता था। यदि कोई इस नियम को गुपचुप तोड़ता भी था, तो उसे 'देव-दोष' और पूर्ण सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता था। बिना किसी सरकारी वन रक्षक या कटीले तारों के, सिर्फ एक टहनी तोड़कर पूरा समाज सदियों से पहाड़ों को हरा-भरा रखता आया है।

पूर्वोत्तर भारत में मेघालय की खासी और जयंतिया पहाड़ियों में सदियों से 'लॉ क्यंतंग' या ‘लॉ लिंगदोह’ की परंपरा चली है, जिसका मूल खासी भाषा में अर्थ 'पवित्र उपवन' है। यहाँ की मान्यता है कि इन घने जंगलों में उनके रक्षक देवता ‘उ ब्लीलांग’ का वास है। इस परम्परा में जंगल के भीतर से कोई भी मनुष्य एक सूखी पत्ती, गिरा हुआ फल या टूटी हुई टहनी तक भी बाहर नहीं ले जा सकता। यहाँ तक कि इन जंगलों के भीतर जूते पहनकर प्रवेश करना या ज़ोर से चिल्लाना भी वर्जित है। यदि कोई बीमार इन जंगलों की औषधीय का उपयोग करना चाहता है, तब भी उसे वहीं जंगल के भीतर ही उस औषधि का सेवन करना होगा, उसे घर ले जाने की अनुमति नहीं होती। 'लॉ क्यंतंग आज भी महज़ धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं हैं, बल्कि ये उपमहाद्वीप के सबसे समृद्ध 'जीन बैंक' हैं। सदियों पुराने इस कड़े सामाजिक निषेध के कारण इन जंगलों में आज भी ऐसी दुर्लभ आर्किड, औषधीय पौधे और वृक्ष बचे हैं, जो बाकी जंगलों से पूरी तरह विलुप्त हो चुके हैं।

मध्य हिमालय की निचली पहाड़ियों और तराई क्षेत्रों में 'रानी बन' की परंपरा सामुदायिक वन संरक्षण का सबसे पुराना और व्यावहारिक स्वरूप है। पहाड़ी भूगोल में ढलानें बेहद संवेदनशील होती हैं; जरा सी लापरवाही से पूरा पहाड़ दरक जाता है और नीचे बसे गाँव मलबे में दफन हो जाते हैं। इस भूगोल को समझने वाले पुरखों ने जल-स्रोतों (धारों और नौलों) के उद्गम स्थल और अति-संवेदनशील ढलानों वाले पूरे के पूरे जंगल को किसी देवी या पूजनीय रानी के नाम पर 'रानी बन' घोषित कर दिया। पारंपरिक ज्ञान यह सिखाता था कि इन ढलानों के पेड़ों की जड़ें ही पहाड़ की मिट्टी को आपस में बांधकर रखती हैं और मानसून के पानी को सोखकर भूजल को रिचार्ज करती हैं। रानी वन से व्यावसायिक रूप से लकड़ी काटने पर पूर्ण प्रतिबंध होता था। समुदाय केवल सूखी लकड़ियों या पत्तों को एक नियंत्रित व्यवस्था के तहत ही उठा सकता था। पारिस्थितिक तंत्र के प्रति संवेदनशीलता और वाटरशेड मैनेजमेंट की जो बातें आज के आधुनिक पर्यावरणविद कर रहे हैं, उसे उपमहाद्वीप के ग्रामीण समाजों ने सदियों पहले अपनी जीवन पद्धति और आस्था का अटूट हिस्सा बना लिया था।

'रिसोर्स' बनाम 'रिश्ता'

आज जब दुनिया 2026 में जलवायु परिवर्तन, अनियंत्रित मौसमी परिस्थितियां के संकट से जूझ रही है, तब संयुक्त राष्ट्र की बड़ी-बड़ी कॉप पर्यावरण बैठकों और कार्बन-क्रेडिट जैसे तकनीकी शब्दों के बीच भारत की यह पारंपरिक प्रकृति सम्मत स्थानीय समझ एक वास्तविक और व्यावहारिक मार्ग दिखाती है। आधुनिक विकासवाद प्रकृति को एक 'संसाधन' के रूप में देखता है। एक ऐसी वस्तु जिसे आज बचाना है ताकि कल उसका दोहन किया जा सके। इसके विपरीत भारत की स्वदेशी चेतना और बिश्नोई जैसी परंपराएं प्रकृति को एक 'रिश्ता' मानती हैं, जिसके प्रति मनुष्य के कुछ नैतिक और पारिवारिक कर्तव्य हैं।अभी कुछ दिनों पहले पीपल के एक पेड़ के कटने के बाद छतीसगढ़ की एक महिला को फूट-फूटकर रोते देखा गया; उस स्त्री के लिए उस पेड़ का कटना उसके किसी अपने के मरने के समान पीड़ा दे रहा था। 

भारत जैसे देश में पेड़ घर के एक सदस्य के समान रहा है; ‘खेजड़ली के 363 शहीदों से शुरू हुआ यह सफर आज काजीरंगा से लेकर बस्तर के घने जंगलों में शिकारियों और तस्करों की गोलियों के सामने सीना तानकर खड़े होने वाले उस आखिरी छोर के फारेस्ट गार्ड तक पहुँचता है, जो अनाम रहकर हर दिन प्रकृति के लिए शहीद हो रहा है। आज के 'विकास मॉडल' को यह समझना होगा कि जब तक कॉरपोरेट मुनाफे के लिए हज़ारों एकड़ घने जंगलों को काटना और स्थानीय समुदायों को बेदखल करना जारी रहेगा, तब तक नेट-जीरो के लक्ष्य महज़ कागजी छलावा बने रहेंगे। 'राष्ट्रीय वन शहीद दिवस' का वास्तविक सम्मान इसी में है कि हम जंगलों को बचाने का अधिकार और सम्मान वापस उन हाथों को सौंपें जो पेड़ों को इमारती लकड़ी का कुंदा नहीं, बल्कि पृथ्वी की धड़कन और अपने पुरखों का घर मानते हैं।