लॉकडाउन का महिलाओं और बच्चों के पोषण पर बुरा असर हुआ है। फोटो- मनीष चंद्र मिश्र 
जंगल

मध्य प्रदेश में सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों पर विवादित पत्र स्थगित, जन संगठनों के विरोध का असर

हालांकि विवाद अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। 30 सितंबर के आदेश में 6 अगस्त के पत्र को “निरस्त” या “वापस” नहीं, बल्कि “स्थगित” किया गया है

Satyam Shrivastava

  • मध्य प्रदेश में सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों पर विवादित पत्र को स्थगित कर दिया गया है।

  • जन संगठनों और विशेषज्ञों के विरोध के बाद वन विभाग ने यह कदम उठाया।

  • हालांकि, पत्र को निरस्त नहीं किया गया है, जिससे भविष्य में नए निर्देशों की संभावना बनी हुई है।

सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों (सीएफएफआर) को लेकर मध्य प्रदेश वन विभाग को अपने विवादित निर्देश पर कदम पीछे खींचने पड़े हैं। राज्य के जन संगठनों, वनाधिकार कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों के चौतरफा विरोध के बीच प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख ने 30 सितंबर 2026 को  6 अगस्त 2026 के उस पत्र को स्थगित कर दिया है, जिसने प्रदेश में सामुदायिक वन संसाधनों के अधिकारों की पहले से धीमी प्रक्रिया को लेकर नई आशंकाएं पैदा कर दी थीं।

प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख शुभ रंजन सेन द्वारा जारी नए आदेश में कहा गया है कि 6 अगस्त के संदर्भित पत्र को स्थगित किया जाता है। साथ ही कहा गया है कि सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों के संबंध में भविष्य में आवश्यकतानुसार शासन द्वारा निर्देश जारी किए जाएंगे। यह आदेश प्रदेश के सभी मुख्य वन संरक्षकों, वनमंडल अधिकारियों और राष्ट्रीय उद्यानों तथा अभयारण्यों के क्षेत्र संचालकों को भेजा गया है।

छह अगस्त को तत्कालीन प्रधान मुख्य वन संरक्षक मनोज अग्रवाल द्वारा जारी पत्र सामने आने के बाद प्रदेश में इसका तीखा विरोध शुरू हो गया था।

विवाद की एक बुनियादी वजह वन विभाग का अधिकार क्षेत्र भी था। वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन की नोडल एजेंसी वन विभाग नहीं, बल्कि केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय है। कानून के तहत वन अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया ग्राम सभा से शुरू होती है और उपखंड तथा जिला स्तर की वैधानिक समितियों से गुजरती है। वन विभाग के प्रतिनिधि इस प्रक्रिया का हिस्सा जरूर हैं, लेकिन कानून ने वन विभाग को अपने स्तर पर सामुदायिक वन संसाधनों के अधिकारों की पात्रता या अधिकारों का दायरा निर्धारित करने वाली नोडल अथॉरिटी नहीं बनाया है।

इसके बावजूद मध्य प्रदेश में वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन को प्रभावित करने वाले निर्देश वन विभाग की ओर से समय-समय पर जारी होते रहे हैं। छह अगस्त का पत्र इसी पुराने संस्थागत तनाव को एक बार फिर सामने ले आया। पत्र में सामुदायिक वन संसाधनों के अधिकारों की पात्रता, ग्राम सभा की भूमिका और सामुदायिक वन संसाधनों के प्रबंधन को लेकर निर्देश दिए गए थे। ग्राम सभा द्वारा बनाई जाने वाली सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन योजना को वन विभाग की कार्य आयोजना के अनुरूप रखने और उसके साथ एकीकृत करने की बात भी कही गई थी। वनाधिकार कार्यकर्ताओं का तर्क था कि इस तरह वन अधिकार कानून के तहत ग्राम सभाओं को मिले अधिकारों को वन विभाग की प्रशासनिक व्यवस्था के अधीन नहीं किया जा सकता।

विवादित पत्र का स्थगित होना मध्य प्रदेश में वन अधिकारों के सवाल पर जन संगठनों और नागरिक समाज के हस्तक्षेप की अहमियत को भी रेखांकित करता है। करीब दो महीने तक जमीन पर काम करने वाले संगठनों, वनाधिकार कार्यकर्ताओं, विशेषज्ञों और वन अधिकार कानून व पेसा टास्क फोर्स के सदस्यों ने इसके कानूनी और व्यावहारिक प्रभावों पर लगातार सवाल उठाए। इस चौतरफा विरोध के बीच अब वन विभाग ने अपने निर्देश को स्थगित कर दिया है।

हालांकि विवाद अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। 30 सितंबर के आदेश में 6 अगस्त के पत्र को “निरस्त” या “वापस” नहीं, बल्कि “स्थगित” किया गया है। साथ ही कहा गया है कि सीएफएफआर के संबंध में भविष्य में आवश्यकतानुसार शासन द्वारा निर्देश जारी किए जाएंगे। ऐसे में अगला महत्वपूर्ण सवाल यही होगा कि राज्य सरकार के नए निर्देश क्या होंगे और उनमें वन अधिकार कानून के तहत ग्राम सभाओं की वैधानिक भूमिका और सामुदायिक वन संसाधनों पर उनके अधिकारों को किस तरह जगह मिलेगी।