हसदेव अरण्य की परसा ईस्ट केते बासेन यानी पीईकेबी कोयला खदान । फोटो साभार: आलोक शुक्ला  
जंगल

जलवायु संकट के बीच हसदेव अरण्य में नई कोयला खदान की तैयारी: वन सलाहकार समिति की बैठक आज

हसदेव अरण्य में लगभग 7 लाख पेड़ काटने की तैयारी है, जबकि पहले से ही दो खदानों के कारण 10,630 एकड़ जंगल और करीब 6 लाख पेड़ नष्ट हो चुके हैं

Anil Ashwani Sharma

हसदेव अरण्य में 7 लाख और पेड़ काटें जाएंगे। कल यानी आठ मई को केंदीय पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार समिति ( एफएसी ) की बैठक होने जा रही है जिसमें राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को आवंटित और अदानी के एमडीओ वाली केते एक्सटेंसन कोल ब्लॉक की वन स्वीकृति देने पर निर्णय लिया जाएगा। ध्यान रहे कि इस संबंध में छत्तीसगढ़ सरकार ने पूर्व में ही अपनी वन स्वीकृति केंद्र सरकार को भेज चुकी है। 

नए कोल खदान में लगभग 7 लाख पेड़ काटे जाएंगे, जिससे न सिर्फ समृद्ध जंगल-जमीन, जैव विविधता, हसदेव नदी और बांगो जलाशय का विनाश होगा बल्कि छत्तीसगढ़ रेगिस्तान में तब्दील हो जाएगा। पूर्व में ही हसदेव अरण्य में राजस्थान की दो खदाने परसा ईस्ट केते बासेन ( पीईकेबी ) एवं परसा संचालित हैं जिनमे 10,630 एकड़ जंगल – जमीन का विनाश कर लगभग 6 लाख पेड़ काटे जा चुके हैं। 

इस संबंध में छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के समन्वयक आलोक शुक्ला ने डाउन टू अर्थ को बताया कि सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (सीईए) ने राजस्थान की बिजली जरूरत के संशोधित आकंडे जारी किए हैं जिसके अनुसार राजस्थान में वर्ष 2025- 2026 से 2035-2036 तक 16561 मेगावाट बिजली की जरूरत है जो पूर्व 20532 मेगावाट बताई गई थी।

यहां तक कि कालीसिंध और छाबड़ा पॉवर प्लांट के विस्तार से राजस्थान में 830 मेगावाट बिजली अतिरिक्त रहेगी। इसके अतिरिक्त राजस्थान में 32000 मेगावाट की सोलर परियोजनाएं स्थापित की जा रही हैं जिससे कोयला आधारित बिजली की जरूरत ही नहीं रहेगी।

शुक्ला ने बताया कि राजस्थान के वर्तमान और विस्तारित पॉवर प्लांटों को मात्र 21 मिलियन टन कोयले की जरूरत है जिसे हसदेव अरण्य की सिर्फ पीईकेबी खदान से पूरा किया जा रहा है। राजस्थान को न तो परसा कोल ब्लॉक की जरूरत थी और केते एक्सटेंसन की।

इस संबंध में भारतीय वन्य जीव संस्थान ने हसदेव की जैव विविधता अध्ययन रिपोर्ट में लिखा है की खनन से हसदेव नदी और बांगो जलाशय का विनाश होगा। बांगो जलाशय छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा जलाशय है जिससे लगभग 6 लाख हेक्टेयर जंगल में सिंचाई होती है। जंगल के काटने से मानव और हाथियों का संघर्ष इतना व्यापक होगा कि भविष्य में इसे सम्हाला नहीं जा सकेगा। 

यह सर्वविदित है कि वर्ष 2026 में दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों में भारत 95 शहर शामिल हैं। बढ़ते जलवायु परिवर्तन के करण अल नीनो जैसी आपदा के दुष्प्रभाव और अधिक गंभीर होते जा रहे हैं। तापमान में अत्यधिक वृद्धि, असमय मानसून और अत्यधिक बाढ़ और तूफान में लगातार वृद्धि हो रही है। जलवायु परिवर्तन के स्थानीय प्रभाव सीधे रूप से यहां दिख रहे हैं, अत्यधिक गर्मी के आंकड़ों में छत्तीसगढ़ पूर्व के मुकाबले अधिक गर्म हो चुका है। ऐसी स्थिति में हसदेव जैसे समृद्ध प्राकृतिक साल के जंगलों का विनाश राज्य के लिए आत्मघाटी कदम होगा।

 हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति का कहना है कि खदान की वन स्वीकृति देने के लिए वन विभाग और जिला प्रशासन ने लगातार गलत और झूठे दस्तावेज जमा किए है। ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के रामगढ़ पहाड़ जिसकी दूरी 9 किलोमीटर है उसे जानबूझकर11 किलोमीटर दिखाया गया। वर्तमान में खनन संचालित खदान के कारण रामगढ़ में बड़ी बड़ी दरारें आ चुकि हैं। समिति का कहना है कि इस खदान के खुलने से सम्पूर्ण रामगढ़ पहाड़ का विनाश होगा।

शुक्ला ने बताया कि हसदेव में खनन की स्वीकृति विधानसभा प्रस्ताव की अवमानना है। वह कहते हैं कि छत्तीसगढ़ विधानसभा में 26 जुलाई 2022 को सर्व सम्मति से यह संकल्प प्रस्ताव पारित किया गया था कि हसदेव अरण्य के सभी कोल ब्लॉक को निरस्त किया जाए, वर्तमान राज्य सरकार विधानसभा के उस संकल्प के विरोध में जाकर इस खदान को अनुमति जारी कर रही है।

समिति का कहना है कि पूर्व कांग्रेस सरकार ने केंते एक्सटेंसन कॉल ब्लॉक की वन स्वीकृति और भूमि अधिग्रहण का विरोध करते हुए वन स्वीकृति के प्रस्ताव को निरस्त कर दिया था। यहां तक कि पर्यावरणीय जनसुनवाई निरस्त करते हुए परियोजना की भूमि अधिग्रहण के विरोध में कोयला मंत्रालय को आपत्ति प्रेषित की थी परंतु वर्तमान वर्तमान राज्य सरकार ने पूर्व सरकार के फैसले को पलट दिया।

यही नहीं इस प्रस्तावित खनन से आदिवासियों की आजीविका, अस्मिता और संस्कृति पर भी संकट मंडरा रहा है। ध्यान रहे कि प्रस्तावित परियोजना का 98 प्रतिशन क्षेत्र घना वन है जिस पर आसपास के गांव के हजारों परिवारों का निस्तार और लघु वनोपज का संग्रहण होता है। भारतीय वन्य जीव संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार हसदेव में ग्रामीणों की आय का 70 प्रतिशत हिस्सा जंगलों से आता है। पूर्व में संचालित खदानों से पहले से ही जंगल में भारी कमी आ चुकी है यहां तक कि आदिवासियों के देव स्थल का भी विनाश किया जा चुका है। वनाधिकार मान्यता कानून के तहत वन अधिकारों की प्रक्रिया भी पूर्ण नहीं की गई है।

ध्यान रह कि हसदेव अरण्य के 1995 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को हाथी रिजर्व के लिए अधिसूचित किया गया है ताकि छत्तीसगढ़ में हाथियों के प्राकृतिक रहवास, माइग्रेटरी कॉरिडोर को सुरक्षित करते हुए मानव हाथी द्वंद को कम किया जाए। प्रस्तावित केंते एक्स्टेसन हाथी रिजर्व की सीमा से नजदीक 10 किलोमीटर की परिधि के अंदर है। यदि इस क्षेत्र में भी खनन की अनुमति दी जाती है तो हथियों के आवाजाही का रास्ता पूर्ण रूप से बंद हो जाएगा जिससे लेमरू रिजर्व का कोई अयोचित्य नहीं रह जाएगा। वर्तमान संचालित खदानों के आसपास लगातार हाथियों की मौजूदगी बनी रही है।