साल बोरर कीटों को नष्ट करते हुए वन अधिकारी, फोटो : वर्षा सिंह 
जंगल

दून घाटी में साल बोरर से प्रभावित 25 हजार पेड़ काटने की कार्रवाई

पारिस्थितिकी के जानकारों ने कहा 20 हजार से अधिक पेड़ों की कटाई के फैसले को जल्दबाजी में लिया गया फैसला

Varsha Singh

साल के कीमती पेड़ों को खत्म कर देने वाले कीटों का हमला बढ़ता ही जा रहा है। अब उत्तराखंड के देहरादून में इसका असर दिख रहा है।

देहरादून वन प्रभाग के प्रभागीय वन अधिकारी वैभव सिंह डाउन टू अर्थ ने बताया, “अब तक 3.6 लाख से अधिक साल बोरर कीट हम पकड़ चुके हैं। देहरादून वन प्रभाग में उनके संक्रमण से प्रभावित करीब 20 हजार साल के वृक्षों को काटने का फैसला लिया गया है। ये सारे वृक्ष सूख चुके हैं। एफआरआई ने इन पेड़ों की कटाई का सुझाव दिया है। नहीं तो ये आसपास के स्वस्थ पेड़ों को भी प्रभावित कर सकते हैं।”

सिंह ने आगे कहा, अभी तक दो हजार से अधिक संक्रमित साल वृक्ष काटे जा चुके हैं। ताजा स्थिति पर उन्होंने बताया कि एफआरआई के सुझाव पर ट्री ट्रैप ऑपरेशन चलाया जा रहा है। हालांकि अभी कोई व्यापक सर्वे नहीं किया गया कि ये संक्रमण अभी फैल रहा है या नहीं। शुरुआती तौर पर हमें संक्रमण में कमी दिखाई दे रही है। साल बोरर के संक्रमण के रोकथाम की प्रक्रिया अभी चलती रहेगी। संभव है अगले वर्ष में इसका असर दिखाई दे।”

वहीं, कालसी वन प्रभाग की डीएफओ संदीपा शर्मा के मुताबिक उनके डिविजन में 4,397 संक्रमित साल के वृक्ष काटने के लिए चिन्हित किए गए हैं। इनमें से 600 वृक्ष काटे जा चुके हैं।वह बताती हैं, “हम ट्री ट्रैप तरीके से हर वर्ष इस कीट को पकड़ने की कार्रवाई करते हैं। पिछले साल करीब 20 हजार वयस्क कीट पकड़े थे उसकी तुलना में इस साल कालसी में 77 हजार कीट अब तक नष्ट किए जा चुके हैं।”

डीएफओ संदीपा के मुताबिक  “साल बोरर से बचाव को लेकर कोई उल्लेखनीय शोध अब तक नहीं हुआ। वन विभाग अब एफआरआई के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर इस पर काम कर रहा है ताकि एक ऐसा तरीका विकसित किया जाए जिससे इस कीट को फैलने और पेड़ों को संक्रमित करने से रोका जा सके। फिलहाल संक्रमित पेड़ को जंगल से हटाना ही एक मात्र तरीका है।”

इस साल की शुरुआत से ही दून घाटी के साल के जंगलों में साल बोरर के हमले का तीव्र असर दिखना शुरू हो गया था। वन विभाग की पड़ताल में देहरादून के झाझरा, मल्हान, आशारोड़ी, लच्छीवाला और कालसी में हालात बेकाबू दिखे।

देहरादून और कालसी वन प्रभाग में पेड़ों को संक्रमण की गंभीरता के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया। श्रेणी-एक यानी पेड़ पूरी तरह सूख चुका है। देहरादून डीएफओ बताते हैं कि फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट की सिफारिश के आधार पर केंद्र सरकार ने प्रभावित पेड़ों को काटने की अनुमति दी।

देहरादून के डीएफओ ने कहा, “हमें ठीक-ठीक नहीं पता कि अचानक साल बोरर का संक्रमण क्यों फैला। वनों में बहुत अधिक उमस रही होगी। हमने वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून को इसके अध्ययन के लिए प्रस्ताव भेजने को कहा है।”  

उत्तराखंड वन विभाग इसे एक प्राकृतिक महामारी के तौर पर देख रहा है। देश के कई हिस्सों में इस साल इस कीट के हमले देखने को मिले। दून घाटी में पिछले 100 वर्षों में 6-7 बार साल बोरर के संक्रमण की घातक स्थिति  दर्ज की जा चुकी है।

साल बोरर कीट, फोटो - वर्षा सिंह

 दून घाटी के साल के जंगल बने हॉटस्पॉट

देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) के वैज्ञानिक डॉ. अरुण प्रताप सिंह के एक अध्ययन के मुताबिक, दून घाटी में साल बोरर का प्रकोप नया नहीं है। उनके शोध के अनुसार, 1916 से 1924 के बीच थानो रेंज में हुए एक बड़े प्रकोप में करीब 80 हजार साल के पेड़ नष्ट हुए थे। इसके बाद 1952-53, 1958-60, 1961, 1965, 1976-78 और फिर 2000-02 में दून घाटी के विभिन्न हिस्सों में साल बोरर का संक्रमण दर्ज किया जा चुका है।

 भारतीय उपमहाद्वीप में साल के जंगल करीब 1.1 करोड़ हेक्टेयर में फैले हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान यानी इसरो ने वर्ष 2015 से 2022 के बीच उपग्रह के जरिये किए अपने एक अध्ययन में उत्तर-पश्चिम हिमालय के साल जंगलों में 6,501 मृत पेड़ों की पहचान की थी। दून घाटी इसका हॉटस्पॉट थी। अध्ययन के अनुसार, इस दौरान हर साल औसतन 1,084 पेड़ों की मृत्यु हुई। इससे करीब 8,057 टन बायोमास और 71 करोड़ रुपये के लकड़ी के मूल्य का नुकसान होने का अनुमान लगाया गया।

हालांकि, इस अध्ययन की अपनी सीमा भी रही। जमीनी निरीक्षण में शोधकर्ताओं ने पाया कि उपग्रह से पहचाने गए मृत पेड़ वास्तव में संक्रमित पेड़ों का केवल 10–15 प्रतिशत हो सकते हैं। यानी जमीनी स्तर पर साल बोरर का असर उपग्रह से दिखाई देने वाले नुकसान से कहीं ज्यादा हो सकता है।

 कैसे बचेंगे साल के जंगल

साल बोरर के कई हमले झेलने के बावजूद दून घाटी में साल वनों की सुरक्षा और प्रबंधन को लेकर कोई व्यापक अध्ययन नहीं हुआ। वन अधिकारी संजीव चतुर्वेदी बताते हैं, “देहरादून वन प्रभाग के वर्किंग प्लान में साल बोरर के संक्रमण का जिक्र किया गया है। ये अचानक एक महामारी की तरह फैलता है और अगर शुरुआत में नियंत्रित नहीं किया गया तो इसका दायरा बढ़ता चला जाता है। साल बोरर कीट पहले सूख रहे पेड़ों पर हमला करते हैं, फिर स्वस्थ वृक्षों को भी शिकार बनाते हैं।”

आईएफएस चतुर्वेदी मानते हैं कि इतने बड़े पैमाने पर साल के वृक्षों के काटने का असर वहां की मिट्टी, भूजल समेत समूचे स्थानीय पारिस्थितकी तंत्र पर पड़ेगा। वह कहते हैं, “साल को दोबारा उगाना एक कठिन प्रक्रिया होती है। इसके बीज महज 15 दिन जिंदा रहते हैं, इसलिए इसका पौधा किसी नर्सरी में नहीं उगाया जा सकता। प्राकृतिक तौर पर ही साल को उगाने के प्रयास करना ही एक मात्र प्रभावी तरीका है।”

क्या संक्रमित पेड़ों को काटना जरूरी है?

साल बोरर को खाने वाले कठफोड़वा पक्षियों पर अध्ययन करने वाले इकोलॉजिस्ट डॉ. रमन कुमार 20 हजार से अधिक पेड़ों की कटाई के फैसले को जल्दबाजी में लिया गया कदम मानते हैं। उनके मुताबिक, “यह जरूरी नहीं है कि जिस पेड़ में साल बोरर का संक्रमण हुआ हो, वह मृत हो जाए। प्रकृति में नियंत्रण का अपना प्राकृतिक तरीका होता है। अगर पेड़ पूरी तरह सूख भी गए हैं तो वे जंगल में दूसरे काम आते हैं और एक प्राकृतिक चक्र बना रहता है। इसलिए पेड़ों को काटने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।”

वहीं, पूर्व आईएफएस अधिकारी मनोज चंद्रन प्रभावित पेड़ों की कटाई को जरूरी मानते हैं। उनके मुताबिक, “जो पेड़ सूख गया है, उसके अंदर साल बोरर के लार्वा या प्यूपा हो सकते हैं, जो अगले साल फिर संक्रमण फैला सकते हैं। पेड़ काटने से इनके जीवित रहने की संभावना कम हो जाती है।”