भानियावाला–जॉलीग्रांट–ऋषिकेश रोड प्रोजेक्ट के लिए पेड़ों को काटा जा रहा है, जिसके खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। फोटो : राजेश डोबरियाल 
जंगल

उत्तराखंड में ‘सात मोड़’ पर 4369 पेड़ों की बलि: चिपको की विरासत वाले राज्य में 'विकास' की भेंट चढ़ रहे हर दिन 5 हेक्टेयर जंगल

देहरादून-ऋषिकेश हाईवे चौड़ीकरण के नाम पर 46 हजार हेक्टेयर से ज्यादा वन भूमि हस्तांतरण, असफल ट्रांसप्लांटेशन और सूखे ‘पेड़ कब्रिस्तान’ पर उठ रहे सवाल

Rajesh Dobriyal

  • उत्तराखंड में देहरादून-ऋषिकेश हाईवे के सात मोड़ क्षेत्र में फोर/सिक्स लेन परियोजना के लिए 4369 पेड़ हटाए जा रहे हैं, जिनमें 3605 की सीधी कटाई और 754 के ट्रांसप्लांट की योजना है।

  • स्थानीय नागरिक ‘काला हरेला’ मनाकर विरोध कर रहे हैं, जबकि एनएचएआई परियोजना को जायज ठहरा रहे हैं।

  • राज्य गठन के बाद से उत्तराखंड में 46,203 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि विकास परियोजनाओं के लिए दी जा चुकी है, यानी रोज़ लगभग 5 हेक्टेयर जंगल खत्म हो रहे हैं।

  • एनएचएआई सुरक्षा, ट्रैफिक और वन्यजीव शमन उपायों का हवाला दे रहा है, पर पिछले असफल ट्रांसप्लांटेशन और सूख चुके पेड़ों के ‘कब्रिस्तान’ से पर्यावरणविद सशंकित हैं।

उत्तराखंड में एक बार फिर वही कहानी दोहराई जा रही है जो 70 के दशक से बार-बार सामने आ जाती है। सरकारें पेड़ और जंगल काटने पर आमादा हैं और स्थानीय लोग पेड़ों को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक राज्य बनने के बाद से उत्तराखंड में हज़ारों पेड़ काटे जा चुके हैं। 9 नवंबर 2000 को राज्य गठन से लेकर जून 2026 तक उत्तराखंड में कुल 46,203.76 हेक्टेयर वन भूमि विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए हस्तांतरित की गई है यानी कि लगभग 5 हेक्टेयर जंगल रोज किसी न किसी परियोजना के नाम हो जा रहा है।

चमोली के चिपको आंदोलन से बार-बार हो रहे इस घटनाक्रम का केंद्र इस बार देहरादून-ऋषिकेश हाईवे पर सात मोड़ नाम की जगह है। यहां सड़क को चौड़ी करने के लिए करीब 4400 पेड़ों की बलि दी जानी है। पर्यावरणविद और स्थानीय जागरूक नागरिक इसका विरोध कर रहे हैं लेकिन राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने कोर्ट से हरी झंडी मिलने के बाद पेड़ों को काटना शुरू कर दिया है।

बता दें कि भानियावाला–जॉलीग्रांट–ऋषिकेश फोर/सिक्स लेन परियोजना के तहत ऋषिकेश के सात मोड़ क्षेत्र में 4369 पेड़ों को हटाया जाना है। इनमें से 754 पेड़ों को ट्रांस्प्लांट किया जाना है जबकि 3605 पेड़ों को काटा जाएगा।

राष्ट्रीय राजमार्ग 07 पर  भानियावाला–जॉलीग्रांट–ऋषिकेश फोर/सिक्स लेनिंग प्रोजेक्ट कर करीब 20 किलोमीटर लंबा है। हाइब्रिड एन्युइटी मोड (एतएएम) के तहत बनाए जा रहे इस प्रोजेक्ट पर करीब 743 करोड़ रुपए की लागत आएगी। एनएचएआई ने इस प्रोजेक्ट की जरूरत बताते हुए कहा है, "जंगल के बीच से गुजरने वाली मौजूदा दो-लेन वाली सड़क पर हर दिन लगभग 18,456 वाहन चलते हैं। यह करीब 15,088 पैसेंजर कार यूनिट्स (पीसीयू) के बराबर है। पर्यटन, एयरपोर्ट कनेक्टिविटी और चारधाम यात्रा के चलते ट्रैफिक और बढ़ने वाला है, इसलिए इस सड़क को चौड़ा करना जरूरी हो गया है।"

"अभी की दो-लेन वाली सड़क पर तीखे मोड़ हैं, जंगल का इलाका है और बसों, ट्रकों व भारी गाड़ियों की लगातार आवाजाही होती है। इन वजहों से जाम और हादसे होते हैं। चार-लेन बनने से सड़क की ज्योमेट्री सुधरेगी, सफर आरामदायक होगा और आधुनिक सुरक्षा फीचर्स से स्थानीय लोगों और पर्यटकों दोनों के लिए यात्रा सुरक्षित बनेगी।"

पर्यावरण प्रेमियों ने इसके खिलाफ कोर्ट में भी अपील की थी, लेकिन इसी साल जनवरी में नैनीताल हाईकोर्ट ने उसे ख़ारिज कर दिया था। इसके बाद मार्च में दायर एक स्पष्टीकरण याचिका दायर की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने साफ़ किया कि पेड़ों की कटाई पर पूर्व में लगाई गई अंतरिम रोक की अवधि को कभी आगे नहीं बढ़ाया गया था। इसका अर्थ यह हुआ कि परियोजना को रोकने के लिए कोई कानूनी आदेश अस्तित्व में नहीं था।

देहरादून के पर्यावरण कार्यकर्ता और पेशे से सिविल इंजीनियर आशीष गर्ग ने एनएचएआई को इस रास्ते को चौड़ा करने का एक वैकल्पिक प्रस्ताव भी दिया था। एनएचएआई के इसे ख़ारिज करने के बाद वह इस मामले को कोर्ट में लेकर गए थे। आशीष गर्ग कहते हैं कि कोर्ट ने उनके प्रस्ताव को सराहा था और कहा था कि इस पर विस्तृत प्लान बनाकर जमा करें। वह कहते हैं कि डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट तो सरकार ही बनवा सकती है क्योंकि इसमें कई एजेंसियां शामिल होंगी और यह एक महंगा काम भी है।

बहरहाल सरकार से अदालत से हरी झंडी मिलने के बाद सात मोड़ पर राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने पेड़ों की कटाई शुरू कर दी। पर्यावरण कार्यकर्ता और स्थानीय नागरिक बड़ी संख्या में इसका विरोध करने के लिए वहां पहुंच रहे हैं। बुधवार को लोगों ने सात मोड़ पर विरोध स्वरूप ‘काला हरेला’ या ‘ब्लैक हरेला’ मनाया। बता दें कि शिव-पार्वती की आराधना का प्रतीक माना जाने वाला हरेला’ हरियाली,  कृषि, पर्यावरण संरक्षण को समर्पित पर्व है।

स्थानीय लोगों के विरोध के बावजूद साल के पेड़ों का कटान जारी है। फोटो: राजेश डोबरियाल

प्रदर्शन में शामिल बबीता अपनी ढाई साल की बेटी के साथ आई थीं। गिरदा के साहित्य पर रिसर्च कर रहीं बबीता ने कहा कि साल के पेड़ों को इतना बड़ा होने में सौ-दो सौ साल तक लगते हैं लेकिन काटने में आधा घंटा भी नहीं लगता। उन्होंने कहा कि वह अपनी ढाई साल की बेटी को इसलिए लेकर आई हैं क्योंकि वह चाहती हैं कि वह भी अपने अधिकारों के लिए लड़ना सीखे।

उधर एनएचएआई ने 10 जुलाई को एक प्रेस रिलीज में ‘भानियावाला–जॉलीग्रांट–ऋषिकेश फोर/सिक्स लेन परियोजना में पर्यावरण एवं वन संरक्षण संबंधी भ्रामक दावों पर स्पष्टीकरण’ दिया था। प्रेस रिलीज में पीआईयू देहरादून, एनएचएआई के परियोजना निदेशक सौरभ सिंह के हवाले से कहा गया, "उत्तराखंड वन विभाग, डब्ल्यू-डब्ल्यूएफ़-इंडिया और भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून के तकनीकी परामर्श के आधार पर हाथियों एवं अन्य वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए एलीफेंट अंडरपास, बॉक्स कल्वर्ट, पाइप कल्वर्ट तथा अन्य वैज्ञानिक वन्यजीव शमन उपायों को परियोजना की डिजाइन का अभिन्न हिस्सा बनाया गया है। इन उपायों से वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन को सुरक्षित बनाए रखने के साथ-साथ वर्तमान सड़क पर वाहनों की टक्कर से होने वाली वन्यजीव मृत्यु की घटनाओं में भी उल्लेखनीय कमी आने की उम्मीद है।"

इसके अतिरिक्त, प्रतिपूरक वनीकरण एवं राज्य में हरित क्षेत्र बढ़ाने के उद्देश्य से 40 हेक्टेयर गैर-वन भूमि राज्य सरकार द्वारा वन विभाग को हस्तांतरित की गई है, जिससे भविष्य में व्यापक स्तर पर नए वन विकसित किए जा सकें। एनएचएआई ने यह भी दावा किया है कि परियोजना से प्रभावित होने वाले 4,369 वृक्षों में से 754 वृक्षों को फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक आकलन के आधार पर प्रत्यारोपित किया जाएगा, जबकि शेष वृक्षों का नियमानुसार प्रबंधन किया जाएगा।

किस हाल में हैं ट्रांसप्लांट किए गए पेड़

लेकिन उत्तराखंड में पेड़ों के प्रत्यारोपण या ट्रांसप्लांट किए जाने का उदाहरण अच्छा नहीं है। 2022 में सहस्रधारा रोड को चौड़ा करने के लिए 2200 से ज्यादा पेड़ काटे गए थे। 900 से ज्यादा ट्रांसप्लांट भी किया था, लेकिन इनमें से अधिकतर पेड़ों का ट्रांसप्लांटेशन सफल नहीं हो पाया।

2022 में ट्रांसप्लांट करके लगाए पेड़ों की यह हालात हो गई है। फोटो: राजेश डोबरियाल

देहरादून के रायपुर में राजीव गांधी क्रिकेट स्टेडियम के ठीक सामने जहां इनमें से कई पेड़ ट्रांसप्लांट किए गए थे उसे अब लोग पेड़ों का कब्रिस्तान कहने लगे हैं क्योंकि वहां ट्रांसप्लांट किए गए लगभग सभी पेड़ सूखे हुए ठूंठ बने गड़े हुए हैं।

उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखंड में हरियाली को कितना नुक़सान हुआ है यह देहरादून में रहने वाले एक्टिविस्ट अनूप नौटियाल की डाली एक आरटीआई के जवाब से पता चलता है।

नौटियाल बताते हैं कि पिछले 25 सालों में उत्तराखंड में सड़कों, खनन और अन्य विकास गतिविधियों के लिए 46,000 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र दिया गया है, यानी औसतन हर दिन 5 हेक्टेयर। इनमें से सबसे अधिक ‘विकास के लिए वन हस्तांतरण’ देहरादून जिले में हुआ है। क्षेत्रफल की दृष्टि से देहरादून राज्य के कुल भू-भाग का लगभग 6% है लेकिन इस अवधि में कुल वन हस्तांतरण का 47% केवल देहरादून जिले में हुआ है। ऋषिकेश का सात मोड़ क्षेत्र भी देहरादून जिले में ही है।