देश में लगभग 70 से 90 प्रतिशत डेयरी कार्य महिलाएं करती हैं, फिर भी उनकी औपचारिक पहचान सीमित है। फोटो साभार: आईस्टॉक
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दुग्ध क्रांति की रीढ़ महिलाएं, फिर भी पशुओं पर मालिकाना हक से वंचित: भारत की डेयरी सफलता की अधूरी कहानी

विश्व दुग्ध दिवस: महिला किसानों के सम्मान का दिन है आज, 70 से 90 प्रतिशत डेयरी कार्य महिलाएं करती हैं, देश में सालाना 24.787 करोड़ टन दूध का उत्पादन होता है।

Dayanidhi

  • भारत में 2024-25 में दूध उत्पादन 24.787 करोड़ टन पहुंचा, विश्व में भारत पहले स्थान पर मजबूत बना रहा।

  • देश में लगभग 70 से 90 प्रतिशत डेयरी कार्य महिलाएं करती हैं, फिर भी उनकी औपचारिक पहचान सीमित है।

  • प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता 485 ग्राम प्रतिदिन तक बढ़ी, जो राष्ट्रीय पोषण सुरक्षा में महत्वपूर्ण सुधार दिखाती है।

  • डेयरी क्षेत्र में आठ करोड़ से अधिक किसान जुड़े हैं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार का बड़ा आधार बना हुआ है।

  • व्हाइट रिवोल्यूशन 2.0 के तहत नई सहकारी समितियां बन रही हैं, महिलाओं को आर्थिक सशक्तिकरण पर विशेष जोर दिया गया।

भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है। साल 2024-25 में देश में लगभग 24.787 करोड़ टन दूध का उत्पादन हुआ। पिछले दस सालों में दूध उत्पादन में बहुत तेज बढ़ोतरी हुई है। भारत में प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता भी बढ़कर लगभग 485 ग्राम प्रतिदिन हो गई है, जो एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। यह केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि ग्रामीण भारत की मेहनत का परिणाम हैं।

दूध उत्पादन में महिलाओं की अहम भूमिका

भारत के डेयरी क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। अनुमान के अनुसार, देश में डेयरी काम का 70 से 90 प्रतिशत काम महिलाएं करती हैं। सुबह जल्दी उठकर गाय-भैंस को चारा देना, दूध निकालना, पशुओं की देखभाल करना, गोबर की सफाई करना और दूध को संग्रह केंद्र तक पहुंचाना, ये सभी काम महिलाएं रोज करती हैं। इसके बावजूद अक्सर उन्हें “किसान” के रूप में औपचारिक पहचान नहीं मिलती। कई बार पशु और आय पर पुरुषों का नाम दर्ज होता है, जबकि असली मेहनत महिलाएं करती हैं।

गांव की सुबह और महिला किसान का जीवन

भारत के गांवों में सुबह चार बजे से ही काम शुरू हो जाता है। महिलाएं सबसे पहले पशुओं की देखभाल करती हैं। उसके बाद दूध निकालकर उसे डेयरी या सहकारी केंद्र तक पहुंचाती हैं। यह काम वे रोज सुबह और शाम करती हैं।

यह जीवन आसान नहीं है, लेकिन इसमें मेहनत, अनुशासन और अनुभव की बड़ी भूमिका होती है। कई महिलाएं इसे केवल काम नहीं, बल्कि परिवार की आय का मजबूत आधार मानती हैं।

श्वेत क्रांति और सहकारी आंदोलन

भारत में दूध उत्पादन की सफलता का बड़ा कारण “श्वेत क्रांति” है। इसका श्रेय डॉ. वर्गीज कुरियन और सहकारी आंदोलन को जाता है। “अमूल” जैसी सहकारी संस्थाओं ने गांव के किसानों को बाजार से जोड़ा।

इस व्यवस्था में महिलाएं शुरू से ही जुड़ी रहीं, लेकिन उन्हें सही पहचान और अधिकार धीरे-धीरे मिले। सहकारी समितियों ने किसानों को सही दाम और स्थिर आय देने में मदद की।

नई योजनाएं और सरकार के प्रयास

सरकार ने डेयरी क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। “व्हाइट रिवोल्यूशन 2.0” के तहत नई सहकारी समितियां बनाने का लक्ष्य रखा गया है। पशुओं की नस्ल सुधारने और दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए भी योजनाएं चलाई जा रही हैं।

कुछ जगहों पर महिला डेयरी समितियां बनाई गई हैं, ताकि महिलाएं सीधे दूध बेच सकें और अपनी आय खुद नियंत्रित कर सकें। यह कदम महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

चुनौतियां और आगे का रास्ता

हालांकि प्रगति हुई है, लेकिन अभी भी कई चुनौतियां हैं। महिलाओं को अक्सर पशुओं का मालिकाना हक नहीं मिलता। बैंक लोन और सरकारी सुविधाएं भी कई बार पुरुषों के नाम पर होती हैं।

जरूरत इस बात की है कि महिलाओं को केवल काम करने वाली नहीं, बल्कि असली किसान के रूप में पहचान दी जाए। अगर महिलाओं को सही अधिकार, प्रशिक्षण और तकनीकी मदद मिले, तो दूध उत्पादन और भी बढ़ सकता है।

महिलाओं का योगदान सबसे बड़ा आधार

विश्व दुग्ध दिवस 2026 की थीम “महिला किसानों का सम्मान” है। यह हमें यह याद दिलाता है कि भारत की दूध क्रांति की असली शक्ति महिलाएं हैं। उन्होंने सुबह-शाम मेहनत करके देश को दूध उत्पादन में विश्व में सबसे आगे पहुंचाया है।

अब समय है कि उनकी मेहनत को केवल सराहा ही नहीं जाए, बल्कि उन्हें पूरा अधिकार, पहचान और सम्मान भी दिया जाए। भारत की डेयरी सफलता की अगली कहानी महिलाओं के सशक्तिकरण के बिना पूरी नहीं हो सकती।