अगर आप कुछ सादा और जल्दी से बनने वाला नाश्ता करना चाहते हैं तो लोबिया एक बहुत अच्छा विकल्प है। इसे उबालने से पहले भिगोने की जरूरत नहीं होती, बस करना ये है कि उसके बीजों को थोड़े से नमक के साथ उबाल लें। इससे प्रोटीन से भरपूर नाश्ता झटपट तैयार हो जाएगा। उबले हुए दानों में आप कटे टमाटर, प्याज, खीरे के साथ चाट मसाला मिलाएं और उस पर एक नीबू निचोड़ दें। आपका जायकेदार खाना तैयार है (रेसिपी देखें)।
कुछ महीने पहले मुझे लोबिया से बनी एक स्वादिष्ट सब्जी चखने का मौका मिला। यह व्यंजन कर्नाटक के धारवाड़ जिले के तिम्मापुर गांव की नीलम्मा केम्मन्नावर ने अल्लूरी सॉप्पू (सेन्ना अलेक्जेंड्रिना) की पत्तियां डालकर बनाया था।
लोबिया अन्य राज्यों में भी खाया जाता है। उदाहरण के लिए केरल में यह पारंपरिक सदया व्यंजन “ओलन” का अभिन्न हिस्सा है। तमिलनाडु में इसे उबालते व भूनते हैं। फिर मसालों व ताजे नारियल के साथ “सुंडल” बनाया जाता है। पश्चिम बंगाल में इसे कद्दू के साथ पकाया जाता है। हालांकि, शहरी क्षेत्रों में यह पौष्टिक लोबिया अब भी कम उपयोग में है और संभव है कि आपको यह रेस्तरां के मेनू में न मिले।
हिंदी में इसे बरबटी, मराठी में चवली, तमिल में करमणि, आंध्र प्रदेश में बोब्बरलू, कर्नाटक में अलसंदी और मणिपुरी में हवाई असंगबी कहा जाता है। इसके बीज, हरी फलियां और पत्तियां तीनों खाए जाते हैं और यह ग्रामीण इलाकों में इंसानों के साथ पशुओं की पोषण सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसके साथ यह हरी खाद और कवर क्रॉप के रूप में भी उपयोगी है।
बाजार में लोबिया के बीज मुख्यतः दो प्रकार के मिलते हैं। एक है सफेद जो उबालकर मुलायम और मक्खन जैसे नरम हो जाता हैं और दूसरा है लाल, जिसका स्वाद सौंधा सा होता है। सूखे दानों के 100 ग्राम में लगभग 25 ग्राम प्रोटीन के साथ कई विटामिन और खनिज पाए जाते हैं।
लोबिया बेल वैज्ञानिक रूप से विग्ना अनगुईकुलाटा कहलाती है और अंग्रेजी में काउ पी के नाम से जानी जाती है। यह एक प्राचीन दलहन है, जिसका जिक्र साहित्य और पुरातात्विक स्थलों में मिलता है।
खेती योग्य लोबिया की उपप्रजाति अनगुईकुलाटा है। पर इसके साथ ही इसकी पांच जंगली उपप्रजातियां- डेकिंडटियाना, प्रोट्रेक्टा, पबसेंस, स्टेनोफाइला और टेनुअस भी हैं। लोबिया का मूल अफ्रीका माना जाता है, क्योंकि यहां इसकी अधिकतम जंगली प्रजातियां पाई जाती हैं। विग्ना अनगुईकुलाटा की उप प्रजाति डेकिंडटियाना और स्पॉन्टेनिया किस्म उप-सहारा अफ्रीका में व्यापक रूप से पाई जाती है और इसे लोबिया का पूर्वज माना जाता है। लोबिया का सबसे पुराना ज्ञात प्रमाण मध्य घाना से मिला है, जिसकी तिथि 1830 से 1595 ईसा-पूर्व के बीच की मानी गई है।
आनुवंशिक आंकड़े बताते हैं कि लोबिया का घरेलूकरण 2500 ईसा-पूर्व से पहले अफ्रीका में हुआ और 400 ईसा-पूर्व तक यह विश्व के प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों में स्थापित हो चुका था।
भारतीय उपमहाद्वीप में लोबिया का सबसे प्रारंभिक ठोस प्रमाण 1500 से 1200 ईसा-पूर्व के बीच का है जो महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के दैमाबाद पुरातात्विक स्थल से मिला है और जिसका संबंध उत्तर-हड़प्पा संस्कृति से है।
मिस्र में पांचवीं वंशावली के शाही मकबरों में भी लोबिया के बीज मिले हैं। माना जाता है कि ये मिस्र से ईरान होते हुए उत्तर-पश्चिम भारत पहुंचे। भारत तक आने के अन्य मार्ग आधुनिक यमन के माध्यम से या पूर्वी अफ्रीका से समुद्री मार्ग द्वारा भी हो सकते हैं। इसका प्रसार इस दलहन की उपयोगिता का संकेत देता है। यह पौधा सूखा सहन करता है, विभिन्न प्रकार की जमीन में भी आराम से उग जाता है और साथ ही मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ाता है। इसे मुख्यतः छोटे किसान की उगाते हैं और इसे अक्सर अन्य फसलों के साथ बीच में बोया जाता है, क्योंकि यह छाया भी सहन कर लेता है। यह तेजी से बढ़कर जमीन को ढक लेता है और मिट्टी को बांधकर रोकने का काम करता है।
जलवायु परिवर्तन से बढ़ी उलझनों से बचने में भी यह दलहन महत्वपूर्ण है। लोबिया में अन्य दलहनों की तुलना में सूखा सहन करने की क्षमता अधिक होती है। साथ ही इसकी बहुत सारी स्थानीय किस्में भी हैं जो विशिष्ट जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल होती हैं। यह भारत के लिए अच्छी खबर है, जहां सामुदायिक बीज बैंकों में इसकी अनेक किस्में उपलब्ध हैं। सीएसई द्वारा किए गए एक अध्ययन में विभिन्न सामुदायिक बीज बैंकों में जलवायु-सहिष्णु बीजों की उपलब्धता का दस्तावेजीकरण किया गया जिससे ऐसी गई पांरपरिक किस्मों को पता चला। जैसे कर्नाटक में जनधान्य सीड नेटवर्क ऐसी लोबिया उगाता है जो कीट-प्रतिरोधी है। तेलंगाना में डेक्कन डेवलपमेंट सोसाइटी द्वारा समर्थित संगम सीड बैंक इसी कारण स्थानीय लोबिया के बीजों को बचाकर रखता है।
लोबिया के भविष्य का भोजन होने की पुष्टि नए शोध से भी होती है। 30 मई 2025 को इटली और मोजाम्बिक के शोधकर्ताओं के एक समूह ने पत्रिका कम्यूनिकेशंस बायोलॉजी में एक अध्ययन प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने 389 प्रकार की लोबिया का अध्ययन किया। इसमें अधिकांश दक्षिणी अफ्रीका की पारंपरिक किस्में थीं। आधुनिक डीएनए तकनीकों से उन्होंने यह जांचा कि ये बीज उन क्षेत्रों की जलवायु परिस्थितियों (जैसे तापमान और वर्षा) से कैसे जुड़े हैं। शोधकर्ताओं ने 36 ऐसे आनुवंशिक क्षेत्र पहचाने जो उच्च तापमान, अनियमित या कम वर्षा और बंजर मिट्टी में जीवित रहने में मदद करते हैं। उन्होंने कंप्यूटर मॉडलों के जरिए भविष्य (2041–2060 के बीच) की जलवायु में इन बीजों के प्रदर्शन का आकलन भी किया और पाया कि जिम्बाब्वे और तंजानिया जैसे कुछ क्षेत्रों में लोबिया की कुछ किस्में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाएंगी।
शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया कि इन क्षेत्रों में अधिक सहिष्णु किस्में लाई जानी चाहिए।
उच्च प्रोटीन, विभिन्न प्रकार की मिट्टियों और अंतर-फसल प्रणालियों के प्रति अनुकूलता, सूखा-प्रतिरोध, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और कटाव रोकने की क्षमता जैसे गुण लोबिया को अनेक विकासशील क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण आर्थिक फसल बनाते हैं। पर सबसे ज्यादा महत्वपूर्व है कि यह सचमुच भविष्य का एक स्वादिष्ट भोजन हो सकता है।
सामग्री
सफेद लोबिया: 1 कप
कटे टमाटर: 1/2 कप
कटी प्याज: 1/2 कप
कटी हरी मिर्च: 2–3
नीबू: 1
इमली: नींबू के आकार जितना
मिर्च पाउडर: 1 छोटा चम्मच
चाट मसाला: 1 छोटा चम्मच
पुदीना-धनिया चटनी: 2–3 बड़े चम्मच
नमक: स्वादानुसार
विधि: लोबिया को धोकर इतना उबाल लें कि वह नरम हो जाए लेकिन उनका आकार बना रहे। एक बड़े बाउल में उबला लोबिया डालें। टमाटर, प्याज, हरी मिर्च और सूखे मसाले मिलाएं। हरी चटनी और नीबू डालें। स्वास्थ्यवर्धक और भरपूर चाट तैयार है।
पुस्तक: किताब में लेखक ने युद्ध से इतर कारगिल की एक और पहचान उजागर की है जिसका वास्ता भोजन से है। वर्षों की यात्राओं में उन्होंने पर्वतीय रसोइयों के अलावा चरवाहों, भिक्षुओं, किसानों और मांओं से बात कर भोजन के राज खोले हैं।