दुनिया में लगभग 30 करोड़ लोग गंभीर भूख से जूझ रहे हैं, जलवायु परिवर्तन, संघर्ष व महंगाई प्रमुख कारण हैं
भारत में भूख और कुपोषण बड़ी चुनौती है, करोड़ों लोग प्रभावित, बच्चों में ठिगनापन और एनीमिया गंभीर समस्या बनी हुई
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम और सरकारी योजनाओं से करोड़ों लोगों को सस्ती दरों पर अनाज उपलब्ध कराया जा रहा है
पीएम पोषण और आईसीडीएस योजनाएं बच्चों और महिलाओं में पोषण सुधारने और स्कूल उपस्थिति बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही
तकनीक और सामाजिक संस्थाएं बचा हुआ भोजन जरूरतमंदों तक पहुंचाकर भूख कम करने में नई महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं
हर साल 28 मई को विश्व भूख दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य दुनिया में बढ़ती भूख और कुपोषण की समस्या की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करना है। साथ ही यह दिन सरकारों और समाज को यह याद दिलाता है कि हर व्यक्ति को पर्याप्त और पौष्टिक भोजन मिलना उसका अधिकार है।
दुनिया भर में लगभग 30 करोड़ लोग अत्यधिक भूख का सामना कर रहे हैं, लेकिन कई मानवीय संकट लगातार बढ़ते जा रहे हैं। इससे यह चिंता भी बढ़ रही है कि भूख और कुपोषण की इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान और मदद पर्याप्त नहीं है या उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही, जितनी जरूरत है।
हाल ही में जारी ग्लोबल रिपोर्ट ऑन फूड क्राइसिस 2026 के अनुसार, साल 2025 में करीब 3.55 करोड़ बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार थे। इनमें लगभग 97 लाख बच्चे अत्यंत गंभीर स्थिति में थे। युद्ध, जलवायु परिवर्तन, महंगाई और आर्थिक संकट को इसके मुख्य कारण माना गया है। कई देशों में मानवीय सहायता में कमी आने से गरीब समुदायों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।
भारत में भूख की चुनौती
भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्य उत्पादक देशों में शामिल है। इसके बावजूद देश में भूख और कुपोषण एक बड़ी समस्या बनी हुई है। गरीबी, बेरोजगारी और आय में असमानता के कारण बड़ी संख्या में लोग पर्याप्त भोजन नहीं हासिल कर पाते।
ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2024 में भारत 123 देशों में 102वें स्थान पर है। रिपोर्ट के अनुसार, देश में लगभग 19.5 करोड़ लोग कुपोषण का शिकार हैं। बच्चों और महिलाओं में पोषण की कमी सबसे अधिक देखी जाती है।
विश्व खाद्य कार्यक्रम यानी डब्ल्यूएफपी के आंकड़ों के अनुसार, भारत में पांच साल से कम उम्र के लगभग 35 प्रतिशत बच्चे ठिगनेपन का शिकार हैं। वहीं 19 प्रतिशत से अधिक बच्चे कमजोर शरीर वाले हैं। महिलाओं और बच्चों में एनीमिया की समस्या भी गंभीर बनी हुई है।
सरकारी योजनाओं से राहत
भूख और कुपोषण को कम करने के लिए भारत सरकार कई बड़े स्तर की योजनाएं चला रही है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम यानी एनएफएसए के तहत देश के 80 करोड़ से अधिक लोगों को सस्ती दरों पर अनाज उपलब्ध कराया जाता है। सरकार गेहूं, चावल और अन्य खाद्यान्न का बड़ा भंडार रखती है ताकि जरूरतमंदों तक समय पर भोजन पहुंच सके।
इसके अलावा पीएम पोषण योजना के तहत सरकारी स्कूलों में बच्चों को दोपहर का भोजन दिया जाता है। इससे बच्चों को पौष्टिक आहार मिलने के साथ स्कूलों में उनकी उपस्थिति भी बढ़ी है।
एकीकृत बाल विकास सेवा यानी आईसीडीएस योजना के माध्यम से गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों को पोषण सहायता दी जाती है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली भी गरीब परिवारों तक खाद्यान्न पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
तकनीक से बदल रही है तस्वीर
भारत में अब भूख से लड़ाई में तकनीक की भी बड़ी भूमिका दिखाई दे रही है। कई शहरों में बड़े स्वचालित रसोईघर बनाए गए हैं, जहां हजारों लोगों के लिए रोजाना साफ और पौष्टिक भोजन तैयार किया जाता है। ये रसोईघर कम समय में बड़ी संख्या में भोजन तैयार करने में सक्षम हैं।
इसके साथ ही कई सामाजिक संस्थाएं और डिजिटल प्लेटफॉर्म बचा हुआ भोजन जरूरतमंदों तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं। होटल, रेस्तरां और आयोजनों में बचने वाले खाने को अब फेंकने के बजाय गरीब लोगों तक पहुंचाया जा रहा है। मोबाइल ऐप और ऑनलाइन नेटवर्क के जरिए यह काम तेजी से हो रहा है।
गांवों में बढ़ रही जागरूकता
ग्रामीण क्षेत्रों में भी कई प्रयास किए जा रहे हैं। छोटे किसानों को नई खेती तकनीकों, सिंचाई सुविधाओं और आर्थिक सहायता से जोड़ा जा रहा है। महिला स्वयं सहायता समूह भी गांवों में पोषण और खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने का काम कर रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन के कारण खेती पर बढ़ते खतरे को देखते हुए किसानों को टिकाऊ खेती के तरीके सिखाए जा रहे हैं। इससे उत्पादन बढ़ाने के साथ किसानों की आय में भी सुधार हो रहा है।
मिलकर लड़नी होगी भूख की लड़ाई
विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल ज्यादा अनाज पैदा करना ही समस्या का समाधान नहीं है। जरूरी यह है कि हर व्यक्ति तक पौष्टिक भोजन सही समय पर पहुंचे। इसके लिए सरकार, सामाजिक संस्थाओं और आम लोगों को मिलकर काम करना होगा।
विश्व भूख दिवस हमें यह संदेश देता है कि भूख केवल आर्थिक समस्या नहीं बल्कि सामाजिक और नैतिक चुनौती भी है। जब तक हर बच्चे और हर परिवार को पर्याप्त भोजन नहीं मिलेगा, तब तक विकास अधूरा रहेगा।