खान-पान

जीआई टैग वाले इलाकों से बिहार पहुंची हल्दी में सीसे का जहर, कुछ नमूनों में तय सीमा से 600 गुना ज्यादा

इरोड, सांगली और निजामाबाद जैसे प्रमुख हल्दी उत्पादक क्षेत्रों से आने वाली सामान्य व्यापारिक हल्दी में लेड क्रोमेट की मिलावट के संकेत, बिहार के सभी जांचे गए शहरों में नमूने दूषित मिले

Vivek Mishra

देश में अपनी खास गुणवत्ता वाली हल्दी के लिए पहचाने जाने वाले जीआई टैग वाले इलाकों से बिहार पहुंचने वाली सामान्य व्यापारिक हल्दी में सीसे की खतरनाक मिलावट का मामला सामने आया है। स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय और सिग्मा रिसर्च के वैज्ञानिकों के एक ताजा अध्ययन में बिहार समेत पांच राज्यों से लिए गए हल्दी के करीब 30 प्रतिशत नमूनों में सीसे की मात्रा तय सीमा से अधिक पाई गई। बिहार में स्थिति सबसे गंभीर रही, जहां अध्ययन में शामिल हर शहर के नमूने में सीसा मिला और कुछ नमूनों में इसकी मात्रा तय सीमा से करीब 600 गुना तक ज्यादा थी।

यह अध्ययन छह मई 2026 को खाद्य विज्ञान से जुड़ी शोध पत्रिका ‘एनपीजे साइंस ऑफ फूड’ में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन के प्रमुख लेखक जेना ई. फॉरसिथ, मनु सिन्हा, अमोघ बांदेकर, दिनशॉ मिस्त्री, मनोज परिडा, एमिली नैश, लावण्या नांबियार, क्रिस्टली एल्मेरा और स्टीफन पी. लूबी हैं।

503 नमूनों में 153 में तय सीमा से ज्यादा सीसा

शोधकर्ताओं ने 2021 से 2023 के बीच बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ के 34 शहरों से हल्दी के कुल 503 नमूने जुटाए। इसके अलावा हल्दी की आपूर्ति और बिक्री से जुड़े 128 लोगों से बातचीत की गई।

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने हल्दी में सीसे की अधिकतम स्वीकार्य मात्रा 10 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम तय कर रखी है। अध्ययन में 153 नमूने यानी करीब 30 प्रतिशत इस सीमा से ऊपर पाए गए।

बिहार में नमूनों में सीसे की ज्यामितीय औसत मात्रा 48 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम रही। सबसे अधिक दूषित नमूने में यह मात्रा 6,416 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम तक पहुंच गई। यानी यह निर्धारित सीमा से सैकड़ों गुना अधिक थी।

सीसे की मिलावट के मामले में बिहार के बाद झारखंड, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ रहे, जबकि पश्चिम बंगाल में इसकी मात्रा सबसे कम पाई गई। अध्ययन में ओडिशा को शामिल नहीं किया गया था।

तुलना के लिए, यूरोपीय संघ में जमीन के नीचे उगने वाले मसालों, जैसे हल्दी और अदरक, के लिए सीसे की अधिकतम सीमा 1.5 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम है। बांग्लादेश में यह सीमा 2.5 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम है।

जीआई टैग वाले इलाकों से आने वाली हल्दी भी आपूर्ति श्रृंखला में हो रही दूषित

बिहार में बिकने वाली 85 प्रतिशत से अधिक हल्दी दूसरे राज्यों से आती है। इसका बड़ा हिस्सा उन इलाकों से आता है जो अपनी खास हल्दी के लिए देशभर में पहचाने जाते हैं। इनमें तमिलनाडु का इरोड, महाराष्ट्र का सांगली और तेलंगाना का निजामाबाद प्रमुख हैं। इन क्षेत्रों की कुछ हल्दी किस्मों को जीआई टैग प्राप्त है। हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।

अध्ययन यह नहीं कहता कि इन क्षेत्रों की आधिकारिक रूप से जीआई टैग वाली प्रमाणित उपज ही दूषित पाई गई। शोधकर्ताओं ने इन जिलों से आने वाली सामान्य व्यापारिक हल्दी के नमूनों की जांच की थी। इसलिए अध्ययन के निष्कर्ष को जीआई टैग वाले प्रमाणित उत्पाद की गुणवत्ता पर सीधे लागू करना सही नहीं होगा।

शोधकर्ताओं ने बाजार में पहुंचने वाले ट्रकों से हल्दी की गांठों के 139 नमूने जुटाए। ये नमूने इरोड, मैसूर, सांगली और निजामाबाद जैसे चार प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों से आए थे। इनमें से 62 से 90 प्रतिशत तक नमूनों में लेड क्रोमेट यानी सीसे के एक यौगिक से मिलावट के संकेत मिले।

यह निष्कर्ष इस ओर इशारा करता है कि इन प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों से निकलने वाली हल्दी बाजार तक पहुंचने के दौरान आपूर्ति श्रृंखला के किसी चरण में दूषित हो सकती है।

चमक बढ़ाने और खराब गांठ छिपाने के लिए हो रही मिलावट

आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े लोगों से बातचीत में शोधकर्ताओं को पता चला कि लेड क्रोमेट का इस्तेमाल मुख्य रूप से हल्दी की गांठों को चमकदार बनाने के लिए किया जाता है। कई मामलों में बिक्री केंद्र के आसपास हल्दी को दोबारा चमकाया जाता है।

मिलावट के पीछे दो प्रमुख कारण सामने आए। पहला, हल्दी को चमकीला और आकर्षक बनाना, ताकि वह ग्राहकों को बेहतर दिखाई दे। दूसरा, भंडारण के दौरान कीड़ों से खराब हुई गांठों के नुकसान को छिपाना और उन्हें अधिक समय तक रखने लायक बनाना।

शोधकर्ताओं के मुताबिक जनवरी से मार्च के बीच मिलावट का जोखिम ज्यादा रहता है। इस अवधि तक हल्दी लंबे समय तक भंडारित रह चुकी होती है और बाजार में भेजने से पहले उसे दोबारा चमकाने की प्रक्रिया की जा सकती है।

अध्ययन के दौरान लेड क्रोमेट का चूर्ण हार्डवेयर की दुकानों पर 120 से 400 रुपये प्रति किलोग्राम की कीमत में आसानी से उपलब्ध मिला। दुकानदारों ने इसके इस्तेमाल की वजह लकड़ी और प्लास्टिक की रंगाई बताई, न कि खाद्य पदार्थों में मिलावट।

एक ही स्रोत से आई हल्दी, लेकिन अलग बाजारों में अलग तस्वीर

शोधकर्ताओं ने झारखंड के धनबाद और उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से भी हल्दी के नमूने जुटाए। इन शहरों में उन्हीं स्रोत क्षेत्रों से आई हल्दी में सीसे का कोई निशान नहीं मिला।

यह अंतर इस ओर इशारा करता है कि मिलावट खेत या मूल प्रसंस्करण केंद्र पर होने के बजाय स्थानीय बाजारों के आसपास आपूर्ति श्रृंखला के किसी चरण में की जा रही है।

यानी हल्दी जिस इलाके में पैदा हुई, वहां उसकी गुणवत्ता एक जैसी होने के बावजूद अलग-अलग बाजारों तक पहुंचने के दौरान उसमें मिलावट हो सकती है।

सीसा शरीर के लिए बेहद हानिकारक धातु है। बचपन में इसके संपर्क में आने से मस्तिष्क के विकास और बौद्धिक क्षमता पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है। वयस्कों में सीसे का संपर्क उच्च रक्तचाप और हृदय संबंधी बीमारियों से जुड़ा है।

शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया है कि बिहार में हल्दी में लेड क्रोमेट की मिलावट पूरी तरह रोक दी जाए तो बच्चों के बौद्धिक स्तर में 0.3 से 2.3 अंक तक की वृद्धि हो सकती है। इससे राज्य में भविष्य की आय के रूप में हर साल करीब 23.9 करोड़ से 160 करोड़ डॉलर तक का आर्थिक लाभ हो सकता है।

यदि हृदय संबंधी बीमारियों से होने वाली मौतों में संभावित कमी को भी इसमें शामिल किया जाए तो अनुमानित आर्थिक लाभ 43 करोड़ से 280 करोड़ डॉलर प्रतिवर्ष तक बढ़ सकता है।

अध्ययन में यह भी बताया गया है कि बिहार में 60 प्रतिशत से अधिक बच्चे पहले से ही आयरन की कमी से होने वाले रक्ताल्पता से प्रभावित हैं। आयरन की कमी की स्थिति में शरीर सीसे को अधिक मात्रा में सोख सकता है, जिससे बच्चों पर इसका असर और गंभीर हो सकता है।

शोधकर्ताओं के अनुमान के मुताबिक अध्ययन में शामिल 34 शहरों में करीब 16 करोड़ लोग रोजाना इस जोखिम के संपर्क में हो सकते हैं।

नियम हैं, लेकिन जांच व्यवस्था पर क्षमता का दबाव

भारत में हल्दी में सीसे के इस्तेमाल पर रोक है, लेकिन इसके बावजूद नियमों का पालन सुनिश्चित करना चुनौती बना हुआ है। शोधकर्ताओं ने खाद्य सुरक्षा अधिकारियों से बातचीत में पाया कि उन्हें हल्दी में लेड क्रोमेट की मिलावट की जानकारी थी, लेकिन जांच और कार्रवाई की क्षमता सीमित है। अधिकारियों के मुताबिक खाद्य सुरक्षा से जुड़े अधिक तात्कालिक या आसानी से दिखाई देने वाले मामलों को अक्सर प्राथमिकता मिलती है।

अध्ययन के अनुसार खाद्य सुरक्षा अधिकारी बाजारों और पिसाई केंद्रों में जांच करते हैं, लेकिन हल्दी की गांठों की पॉलिशिंग वाली जगहों पर नियमित निगरानी नहीं हो पाती। हल्दी में लेड क्रोमेट की पुष्टि के लिए प्रयोगशाला जांच जरूरी होती है, जिसमें खर्च के साथ करीब दो सप्ताह का समय लग सकता है। अधिकारियों ने इसे कार्रवाई में बड़ी बाधा बताया।

खाद्य मिलावट के मामलों में अपराध की प्रकृति और गंभीरता के आधार पर जुर्माना, कारोबार बंद कराने और जेल तक की सजा का प्रावधान है। अधिकारियों ने अधिकतम एक लाख रुपये तक के जुर्माने और कई महीने की कैद का उल्लेख किया। इसके बावजूद अध्ययन के मुताबिक नियमों का प्रभावी क्रियान्वयन अभी चुनौती बना हुआ है।

बांग्लादेश के अनुभव से मिल सकती है सीख

अध्ययन में बांग्लादेश का उदाहरण दिया गया है। वहां करीब चार दशक से हल्दी में लेड क्रोमेट मिलाए जाने की समस्या थी। वर्ष 2019 में यह सामने आने के बाद राष्ट्रव्यापी स्तर पर हस्तक्षेप किया गया। जागरूकता बढ़ाने, जांच और निगरानी मजबूत करने के बाद कुछ ही महीनों में सीसा मिली हल्दी की मौजूदगी में करीब 90 प्रतिशत कमी आई। शोधकर्ताओं के अनुसार यह सुधार कई वर्षों तक कायम रहा।

शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत में भी इस समस्या से निपटने के लिए लेड क्रोमेट वाली हल्दी को खाद्य सुरक्षा की उच्च प्राथमिकता में शामिल करना, लोगों और कारोबारियों में जागरूकता बढ़ाना तथा जांच और निगरानी की क्षमता मजबूत करना जरूरी है।

अध्ययन में हल्दी में सीसे की मिलावट की पहचान के लिए पोर्टेबल एक्स-रे फ्लोरोसेंस जांच तकनीक के इस्तेमाल का भी उल्लेख है। ऐसी तकनीक से मौके पर ही तेजी से जांच की जा सकती है, जिससे संदिग्ध हल्दी की पहचान और आगे की कार्रवाई आसान हो सकती है।

हल्दी जैसी रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली खाद्य वस्तु में सीसे की मिलावट का मामला केवल खाद्य सुरक्षा तक सीमित नहीं है। अध्ययन के अनुसार इसका संबंध बच्चों के विकास, सार्वजनिक स्वास्थ्य और लंबे समय में होने वाले आर्थिक नुकसान से भी है।